मन पाए विश्राम जहाँ
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नसीब
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शनिवार, मई 3
बस ! अब और नहीं
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बस ! अब और नहीं उलझ गई थी आज़ादी के वक्त समस्या वह सुलझाने वाली है एक मुल्क जो झूठ की बुनियाद पर खड़ा हुआ चूलें उसकी हिलने वाली हैं...
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शनिवार, अगस्त 25
कैसी थी वह दूरी
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कैसी थी वह दूरी तुमसे दूरी क्या हुई गाज़ हम पे गिर गयी जाने किस बेसुध क्षण में आग दिल में लग गयी वह तो अच्छा हुआ जाना घर तु...
10 टिप्पणियां:
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