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निर्मल
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निर्मल
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शुक्रवार, दिसंबर 7
अपने जैसा मीत खोजता
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अपने जैसा मीत खोजता ओस कणों से प्यास बुझाते , जगती के दीवाने देखे , चकाचौंध पर मिटने वाले बस नादां परवाने देखे ! जो ह...
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मंगलवार, नवंबर 27
स्वर्ण रश्मियों सा छू लेता
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स्वर्ण रश्मियों सा छू लेता माँ शिशु को आँचल में छुपाती आपद मुक्त बनाती राहें , या समर्थ हथेलियाँ पिता की थामें उसकी नन...
15 टिप्पणियां:
सोमवार, मार्च 31
बन जाये मन स्वयं उजास
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बन जाये मन स्वयं उजास झर जाता है कुम्हलाया पुष्प धरा पर आहिस्ता से जैसे बिखर जाती है पाँखुरी-पाँखुरी सहजता से विलग हो डा...
11 टिप्पणियां:
मंगलवार, मार्च 4
आना वसंत का
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आना वसंत का जब नहीं रह जाती शेष कोई आशा निराशा के भी पंख कट जाते हैं तत्क्ष्ण ! जब नहीं रह जाती ‘मैं’ की धूमिल सी छाया भी उसक...
7 टिप्पणियां:
गुरुवार, मार्च 14
पांखुरी-पांखुरी मन खिलता है
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पांखुरी-पांखुरी मन खिलता है एक निर्झरी सी भावों की जाने कहाँ से फूटी भीतर, हटा पत्थरों की सीमा को उमड़े ज्यों जलधार निरंतर ...
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