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नील
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नील
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शुक्रवार, मार्च 7
इतना ही तो कृत्य शेष है
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इतना ही तो कृत्य शेष है ‘मैं’ बनकर जो मुझमें बसता ‘तू’ बनकर तुझमें वह सजता, मेघा बन नभ में रहता जो, धारा बन नदिया में बहता ! चुन शब्दों क...
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शुक्रवार, अप्रैल 15
निरभ्र गगन खुलता जाता
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निरभ्र गगन खुलता जाता नील वितान धरा को थामे मन मेघ देख क्यों कँप जाता, पल भर में छँट जाते बादल नीरव अंबर खुलता जाता ! काले धूसर घनघोर ...
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