मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

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शुक्रवार, मार्च 7

इतना ही तो कृत्य शेष है

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इतना ही तो कृत्य शेष है ‘मैं’ बनकर जो मुझमें बसता  ‘तू’ बनकर तुझमें वह सजता,  मेघा बन नभ में रहता जो,  धारा बन नदिया में बहता ! चुन शब्दों क...
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शुक्रवार, अप्रैल 15

निरभ्र गगन खुलता जाता

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निरभ्र गगन खुलता जाता  नील वितान धरा को थामे  मन मेघ देख क्यों कँप जाता,  पल भर में छँट जाते बादल  नीरव अंबर खुलता जाता !   काले धूसर घनघोर ...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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