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गुरुवार, मार्च 14
पांखुरी-पांखुरी मन खिलता है
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पांखुरी-पांखुरी मन खिलता है एक निर्झरी सी भावों की जाने कहाँ से फूटी भीतर, हटा पत्थरों की सीमा को उमड़े ज्यों जलधार निरंतर ...
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