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शुक्रवार, मई 29

चाह -अचाह

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चाह -अचाह  ‘वह’ क्या चाहता है  ‘वह’ चाहता भी है क्या ? जब तक चाह शेष है भीतर  तब तक ‘वह’ है नहीं  ‘वह’ सन्तुष्ट है अपने होने...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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