चाह -अचाह
‘वह’ क्या चाहता है
‘वह’ चाहता भी है क्या ?
जब तक चाह शेष है भीतर
तब तक ‘वह’ है नहीं
‘वह’ सन्तुष्ट है अपने होने मात्र से
जैसे कोई फूल क्या चाहता है
वह बस होता है
शेष सब घटता है उसके आसपास
न भी घटे तो होता नहीं उसकी तरफ से
थोड़ा सा भी प्रयास
लोग ठिठकते हैं पल भर को उसे निहार
भँवरे गीत सुनाते हैं
तितलियाँ तृप्त होती हैं पराग से
वह किसी घड़ी चुपचाप झर जाता है !
