मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

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शुक्रवार, जुलाई 11

‘को’ नहीं ‘की’

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‘को’ नहीं ‘की’  हम भगवान ‘को’ मानते हैं  भगवान ‘की’ नहीं मानते ! भगवान ‘को’ मानते हैं   पर हम चलाते अपनी हैं   भगवान ‘की’ मानने से  निष्काम ...
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सोमवार, जून 6

उसी आकाश को लाके ओढ़ाया है

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उसी आकाश को लाके ओढ़ाया है  चाहने वालों ने ही कर के दिखाया है  पत्थरों में भी भगवान जगाया है  यूँ तो हर जगह समायी है नमी, लेकिन  बादलों ने ह...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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