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शुक्रवार, जुलाई 11

‘को’ नहीं ‘की’

‘को’ नहीं ‘की’ 


हम भगवान ‘को’ मानते हैं 

भगवान ‘की’ नहीं मानते !

भगवान ‘को’ मानते हैं  

पर हम चलाते अपनी हैं  

भगवान ‘की’ मानने से 

निष्काम कर्म करना है 

उनके कर्म में हाथ बँटाकर 

इस जगत में सुंदर रंग भरना है 

जगत जो अभी हो रहा है 

परमात्मा ही जगत के रूप में 

नये-नये रूप धर रहा है 

उसकी मानें तो हम उसी के रूप हैं 

उसी के गुण हमें धारने हैं 

स्वयं को संवरते हुए, देखना है 

प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों में 

 उसकी ही छवि को 

धरा पर पुष्प और 

गगन पर रवि को 

तब वही हमारे द्वारा कर्म करता है 

यह सब भगवान ‘की’ मानने से घटता है !


सोमवार, जून 6

उसी आकाश को लाके ओढ़ाया है


उसी आकाश को लाके ओढ़ाया है 

चाहने वालों ने ही कर के दिखाया है 

पत्थरों में भी भगवान जगाया है 


यूँ तो हर जगह समायी है नमी, लेकिन 

बादलों ने ही उसे भू पर बहाया है 


कण-कण में उसकी हाज़िरी होगी मगर 

किसी राम किसी कृष्ण में नज़र आया है 


भूल गया था यह ज़माना जब-जब हक़ीक़त 

ज्ञान गीता का फिर-फिर पढ़ाया है 


हम वह आकाश हैं जो कभी मिटता नहीं 

उसी आकाश को लाके ओढ़ाया है 


आग जलती रहे भीतर इश्क़ की सदा 

रुलाया लाख पर इसने ही हँसाया है 


निरंजन डोलता रहा हवा की मानिंद

किसी ने धूप चंदन का जलाया है