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रविवार, सितंबर 18
जैसे कोई घर लौटा हो
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जैसे कोई घर लौटा हो जगत पराया सा लगता था जब थी तुझसे पहचान नहीं, तेरी आँखों को पहचाना सबमें झांक रहा था तू ही ! अब कहाँ कोई है दूसरा ज...
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