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मंगलवार, दिसंबर 6

सुदूर कहीं ज्योति की नगरी

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सुदूर कहीं ज्योति की नगरी  झांक रहा कोई भीतर से  भारी पर्दे क्यों लटकाए,  बाहर अबद्ध  गगन बुलाता    पिंजरे में विहग घबराए ! विमुक्त करो मान...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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