सुदूर कहीं ज्योति की नगरी
झांक रहा कोई भीतर से
भारी पर्दे क्यों लटकाए,
बाहर अबद्ध गगन बुलाता
पिंजरे में विहग घबराए !
विमुक्त करो मानस शक्ति को
जो अनंत बन खिलना चाहे,
संकरे पथ सीली धरा को
तज भूमा से मिलना चाहे !
वक्त बीतता जाता है अब
पल भर भी की ना देर करो,
रस्ता दो उर की नदिया को
अब सिंधु मिलन की टेर भरो !
पलकों में सुख स्वपन क़ैद हैं
हृदय कमल भी सुप्त हैं अभी,
सुदूर कहीं ज्योति की नगरी
गहन तिमिर में पड़े हैं सभी !
अब राहों को खुद गढ़ना है
नियति स्वयं हाथों में लेकर,
सोए-सोए युग बीते हैं
स्वर्णिम पथ पर जाना जगकर !
