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सुमिरन
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सोमवार, जुलाई 4
अनजानी राहों से आकर
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अनजानी राहों से आकर एक बात भूली बिसरी सी एक स्वपन चिर काल पुराना, एक तंतु जो जोड़े तुझ से मधुरिम स्मृति की बहती धारा ! कोई है जो छिपा हुआ...
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