अनजानी राहों से आकर
एक स्वपन चिर काल पुराना,
एक तंतु जो जोड़े तुझ से
मधुरिम स्मृति की बहती धारा !
कोई है जो छिपा हुआ भी
जैसे चारों ओर बिछा है,
शब्दों की गहराई में जो
मीलों मधुर मौन फैला है !
सुरभि लिए पवन का झोंका
ज्यों उसका संदेशा लाये,
कोयल की मधु कूजन जैसे
सुमिरन की माला सी गाये !
कोई तार जुड़ा है जैसे
मन क्यों उसकी राह ताकता,
अनजानी राहों से आकर
सुधिया अपनी फिर भर जाता !
जीवन कोई बंद द्वार ज्यों
अपनी ओर बुलाता सबको,
ज्यों उज्ज्वल उपहार प्रीत का
सहज बँट रहा पालो इसको !
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