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सोमवार, जुलाई 4

अनजानी राहों से आकर


अनजानी राहों से आकर 

एक बात भूली बिसरी सी 
एक स्वपन चिर काल पुराना,
एक तंतु जो जोड़े तुझ से 
मधुरिम स्मृति की बहती धारा !

कोई  है जो छिपा हुआ भी 
जैसे चारों ओर बिछा है, 
शब्दों  की गहराई में जो 
मीलों मधुर मौन फैला है !

सुरभि लिए पवन  का झोंका
ज्यों उसका संदेशा लाये, 
कोयल की मधु कूजन जैसे 
सुमिरन की माला सी गाये !

कोई तार जुड़ा है जैसे 
मन क्यों उसकी राह ताकता,
अनजानी राहों से आकर 
सुधिया अपनी फिर भर जाता !

जीवन कोई बंद द्वार ज्यों 
अपनी ओर बुलाता सबको, 
ज्यों उज्ज्वल उपहार प्रीत का 
सहज बँट रहा पालो इसको !