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गुरुवार, अक्टूबर 29

स्वधर्म – परधर्म

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स्वधर्म – परधर्म स्वधर्म – परधर्म यह सारी कायनात भिन्न नहीं है हमसे झींगुर बोलता बाहर है पर हम भीतर सुनते हैं पेड़ पर गाती कोकिल की गूंज भी...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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