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गुरुवार, अक्टूबर 29

स्वधर्म – परधर्म

स्वधर्म – परधर्म

स्वधर्म – परधर्म

यह सारी कायनात भिन्न नहीं है हमसे
झींगुर बोलता बाहर है पर हम भीतर सुनते हैं
पेड़ पर गाती कोकिल की गूंज भीतर कुछ स्पंदन जगा जाती है
सूरज बाहर है या भीतर ? हमारी आँखें उसी से नहीं देखती क्या  
 बाहर बहती हवा प्राण भीतर भरती  है
भीतर व बाहर का भेद वृथा है
जो भीतर है वही बाहर है !
जो लेन-देन पर चलता है वह संसार है
जो स्वभाव से चलता है
वह अस्तित्व है
जिसका स्वभाव है बंटना
नहीं उसे कोई अभाव है !
वह जुड़ा है अनंत से, स्वधर्म निभाना जानता है
अन्यथा भयावह परधर्म ही निभता जाता है
जहाँ विरोध है, द्वेष है, चाह है, द्वन्द्व है  
जहाँ चुभन है, कुंठा है, अपमान है, भय है, पराजय का भाव है
वहाँ संसार है !
जहाँ प्रेम है, आनंद है, शांति है
सुख का अजस्र प्रवाह है, वहाँ अस्तित्व है जो निर्बाध बहता रहता है
अपनी गरिमा में !