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मंगलवार, अक्टूबर 6

मन और वह

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मन और वह  मन  हिरण सा दौड़ता है  धरती से आकाश तक  अनभिज्ञ.... कि कोई है ज्योति शिखा सा  भीतर जलता है, अकंप  जो उसमें प्राण फूँकता है  मन बादल...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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