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हिरण
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हिरण
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मंगलवार, अक्टूबर 6
मन और वह
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मन और वह मन हिरण सा दौड़ता है धरती से आकाश तक अनभिज्ञ.... कि कोई है ज्योति शिखा सा भीतर जलता है, अकंप जो उसमें प्राण फूँकता है मन बादल...
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