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मंगलवार, अक्टूबर 6

मन और वह

मन और वह 

मन  हिरण सा दौड़ता है 

धरती से आकाश तक 

अनभिज्ञ.... कि कोई है ज्योति शिखा सा 

भीतर जलता है, अकंप 

जो उसमें प्राण फूँकता है 

मन बादलों की तरह डोलता है 

चाहता है दूर अंतरिक्ष के पार जाना 

अनभिज्ञ.... कि कोई है पूनो के चाँद सा 

जो उससे ही आवृत रहता है 

देता है संबल

युगों से प्रतीक्षारत  

मौन ! दौड़ कभी तो अर्थहीन होगी 

डोलना कभी तो थमेगा  

गति के पीछे अगति में 

रूप के पीछे अरूप में 

शब्द के पीछे निशब्द में 

सम्भवतः सुख के पीछे आनंद में !