मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

बुधवार, जून 29

सच क्या है

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सच क्या है सच सूक्ष्म है जो कहने में नहीं आता सच भाव है जो शब्दों में नहीं समाता सच एकांत है जहाँ दूसरा प्रवेश नहीं पाता सच सन...
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मंगलवार, जून 28

स्वप्नों की इक धारा बहती

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स्वप्नों की इक धारा बहती भाव जगें कुछ नूतन पल-पल शब्दों की इक माल पिरो लें, प्रीत निर्झरी सिंचित करती उर का कोना एक भिगो लें !...
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सोमवार, जून 27

माया द्वन्द्वों का है खेल

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माया द्वन्द्वों का है खेल माया मनमोहक अति सुंदर किन्तु बाँधती मोह पाश में, सुख का देती सिर्फ छलावा जीवन कटता इसी आश में ! म...
रविवार, जून 26

ज्यों की त्यों

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ज्यों की त्यों हर लहर जो सागर से निकलती है सागर की खबर देती है हर दुआ जो दिल से निकलती है दिलबर की खबर ही देगी न .... और दुआ...
शुक्रवार, जून 24

प्रार्थना

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प्रार्थना पुहुप, पवन, पंछी व सितारे जो भी साथी-संग हमारे, सुख पायें, हो मंगल सबका प्रमुदित हो पनपें वे सारे  ! जो भी सुंदर है, ...
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मंगलवार, मई 17

अभी

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अभी अभी खुली हैं आँखें तक रही हैं अनंत आकाश को अभी जुम्बिश है हाथों में  लिख रही है कलम प्रकाश को अभी करीब है खुदा पद चाप ...
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शुक्रवार, मई 13

गुरूजी के जन्मदिन पर

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गुरूजी के जन्मदिन पर शब्द नहीं ऐसे हैं जग में जो तेरी महिमा गा पायें, भाव अगर गहरे भी हों तो व्यक्त हृदय कैसे कर पायें !   ...
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गुरुवार, अप्रैल 28

खिले रहें उपवन के उपवन

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खिले रहें उपवन के उपवन रिमझिम वर्षा कू कू कोकिल मंद पवन सुगंध से बोझिल, हरे भरे लहराते पादप फिर क्यों गम से जलता है दिल ! ...
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गुरुवार, अप्रैल 21

अर्थवान मन

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अर्थवान मन समेट ले सारे ब्रह्मांड को अपने भीतर या ‘न कुछ’ हो जाये मन तभी अर्थवान होता है वरना तो बस परेशान होता है कभी इस बा...
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सोमवार, अप्रैल 11

सत्य

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सत्य  “ सत्य समान नहीं कोई पावन सत्य आश्रय मन अपावन, नदियाँ ज्यों दौड़ें सागर में सत्य साध्य है सत्य ही साधन ! ” जो सत्य ...
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मंगलवार, अप्रैल 5

प्रकाश की एक धारा

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प्रकाश की एक धारा प्रकाश की एक धारा अनवरत साथ बहती है भले नजर न आये सरस्वती सी गहराई की थाह नहीं जिसकी और शीतल इतनी कि गोद...
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मंगलवार, मार्च 29

भारत

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भारत शांति का संदेश दे रहा जो भारत सारी दुनिया को स्वयं अशांत क्यों हो बैठा ? प्रीत की डोर से बांधा जिसने दुनिया के हर कोन...
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शुक्रवार, मार्च 18

थोड़ी सी हँसी

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थोड़ी सी हँसी फूल क्या लुटाते हैं ? इतना जो भाते हैं थोडा सा रंग.. गंध थोड़ी सी और ढेर सारी खिलावट ! नहीं उनके होने में जरा ...
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गुरुवार, मार्च 3

सुख-दुःख

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सुख-दुःख एक को लिया तो दूसरा पीछे आने ही वाला है चाहा सुख को तो दुःख को गले लगाना ही है पार हुआ जो मन दोनों से उसने ही यह रा...
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बुधवार, मार्च 2

होना भर यदि क़ुबूल हो

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होना भर यदि क़ुबूल हो दुःख के कांटे यदि नहीं चाहिये  तो सुख के फूल कैसे खिलेंगे पतवार खेने का श्रम उठाया नहीं तो पार भला कैसे उ...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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