मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

बुधवार, नवंबर 30

जागरण

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 जागरण  सोयी हुई देशभक्ति भी  जाग  रही है दिल में सबके, खोयी हुई आस्था जागी  मूल्यों के प्रति हर अंतर में ! तप कर सोना क...
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मंगलवार, नवंबर 29

मौन

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मौन   सिमट गयी है कविता  या छोड़ दिया है खजाना शब्दों का  उस तट पर  मंझदार ही मंझदार है अब  दूसरा तट कहीं नजर नहीं आता  ए...
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रविवार, नवंबर 27

घुटने का दर्द

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घुटने का दर्द  उम्र की सीढ़ी चढ़ते चढ़ते  दर्द की इक सौगात मिली, जितना जितना किया इलाज  मर्ज को उतनी हवा मिली  बचपन का वह कोम...
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बुधवार, नवंबर 16

बदल रहा है देश

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बदल रहा है देश लोग निकल रहे हैं घरों से छोटे-बड़े सब समान होकर खड़े हैं लम्बी-लम्बी कतारों में जिन्हें एक नहीं कर पाये सद उपदेश और...
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गुरुवार, नवंबर 3

कविता झुलस रही है

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 कविता झुलस रही है  कविता झुलस रही है उस आग में लगा रहा है जो कोई सिरफिरा अनगिनत स्वप्न और निशान नन्हे कदमों के  दफन हो गये जि...
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बुधवार, अक्टूबर 19

जिंदगी का गीत यूँ ही

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जिंदगी का गीत यूँ ही सोचते ही आज बीता कल कभी आता कहाँ, जिंदगी का गीत यूँ ही छिटक ही जाता रहा ! डर छुपाये जी रहा जग धुधं,...
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मंगलवार, अक्टूबर 18

मन

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मन भर जाता भीतर उत्साह गायत्री मन्त्र का उच्चार स्यात् सवितादेव की तरह बंटना चाहता है  करता आह्लादित  युगों-युगों से गंगा की ...
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शुक्रवार, अक्टूबर 14

जो भी राह दिखाने आया

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जो भी राह दिखाने आया एक मुखौटा ओढ़ा सुंदर चेहरे पर मुस्कान पहन ली, दिल में चाहे आग सुलगती   शीतल सी पहचान ओढ़ ली ! हालचाल स...
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मंगलवार, अक्टूबर 4

माँ

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माँ शिव रूप में जो निर्निमेष तकता रहता है माँ बनकर वही अस्तित्त्व समेट लेता है निज आश्रय में अभय कर देती है माँ शिशु को स्वीक...
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गुरुवार, सितंबर 29

दिल का मामला

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दिल का मामला जी हाँ, यहाँ मामला दिल का है और बहुत नाजुक है इसका धड़कता रहना हमारी सेहत के लिए कितना आवश्यक है शीशे से भी नाजु...
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बुधवार, सितंबर 28

तू है तो मैं हूँ

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तू है तो मैं हूँ ‘मैं’ हूँ तो ‘तुझे’ होना ही पड़ेगा ‘तू’ से ही ‘मैं’ का वंश चलेगा तुझे बिठाया हमने सातवें आसमान पर अनगिनत गुणों...
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सोमवार, सितंबर 26

कोष भरे अनंत प्रीत के

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कोष भरे अनंत प्रीत के पलकों में जो बंद ख्वाब हैं पर उनको लग जाने भी दो, एक हास जो छुपा है भीतर अधरों पर मुस्काने तो दो ! स...
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शुक्रवार, सितंबर 23

एक अरूप ज्योति बहती है

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एक अरूप ज्योति बहती है पीछे मुड़कर देखें जब तक क्यों न आगे कदम बढ़ा लें, चंद पलों में मिल जाती हैं लहरें मन में नयी जगा लें ! ...
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शुक्रवार, सितंबर 16

आसमान में तिरते बादल

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आसमान में तिरते बादल खुली हवा में शावक बनकर दौड़ लगाते क्यों न जीयें, एक बार फिर बन के बच्चे वर्षा की बूंदों को पीयें ! नाव...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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