गुरुवार, जनवरी 28

आस्था का दीप

 आस्था का दीप 
वक्त पर जो थाम ले गिरते हुए को 
बढ़े आगे हाथ दे हिलते हुए को,
जो गमों की धूप से दिल को बचाए
ज्ञान वह जो डूबते के काम आये !

ज्ञान भरता है उजाला पथ अँधेरे जब मिलें 
खिला देता पुष्प, पत्थर जब कभी पथ पर मिलें, 
जब कभी संशय सताये राही कोई पथ न पाए 
काट देता हर विभ्रम को ज्ञान ही वह शस्त्र लाये !

मन कभी चंचल अति हो भंवर में डूबा डरे 
बुद्धि विचलित बंट गयी राह नहीं निश्चित करे, 
आस्था का दीप जगमग तब भी भीतर जल रहा है 
ज्ञान, श्रद्धा बन, कभी विश्वास बन कर पल रहा है  !

जगत जब विकराल बनकर भरे जीवन में निराशा
आँधियाँ ही हों गुजरतीं शांति की न नि:शेष आशा, 
जब कभी दानव बढ़ें देवों का न सम्मान हो 
उस समय भी दिल में कान्हा व अधर पर राम हों !

8 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 29-01-2021) को
    "जन-जन के उन्नायक"(चर्चा अंक- 3961)
    पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"

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  2. जब कभी दानव बढ़ें देवों का न सम्मान हो
    उस समय भी दिल में कान्हा व अधर पर राम हों !
    बहुत सुंदर।

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  3. आस्था ही तो अहं ब्रह्मास्मि की गूंज उठाती है बस सुनने के लिए वो ध्यान चाहिए । अति सुन्दर भाव ।

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  4. अध्यात्मिक चिंतन से परिपूर्ण सुन्दर कृति..

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