सागर सी आत्मा
दिन-रात
सागर में लहरें उठती हैं
फेन, बुदबुदे, तरंगें
सभी तो जल हैं !
आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ
भाव, विचार, कल्पनाएँ
सभी तो ऊर्जा हैं !!
सागर अपनी गरिमा में रहता है
जल भी तत्वतः वैसा का वैसा,
आत्मा स्वयं में प्रतिष्ठित
ऊर्जा अपरिवर्तित ।
लहरें बाहर से नहीं आयी
सागर का ही विवर्त हैं !
आत्मा निरंजन है
मन मात्र विवर्त है !!
आत्मा सुंदर विश्लेषण।
जवाब देंहटाएंसादर।
---------
जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १५ मई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत बहुत आभार श्वेता जी!
हटाएंसुंदर रचना
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएं