गुरुवार, मई 14

सागर सी आत्मा

सागर सी आत्मा 


दिन-रात 

सागर में लहरें उठती हैं 

फेन, बुदबुदे, तरंगें 

सभी तो जल हैं !

आत्मसिन्धु में वृत्तियाँ 

भाव, विचार, कल्पनाएँ 

सभी तो ऊर्जा हैं !!


सागर अपनी गरिमा में रहता है 

जल भी तत्वतः वैसा का वैसा, 

आत्मा स्वयं में प्रतिष्ठित 

ऊर्जा अपरिवर्तित ।


लहरें बाहर से नहीं आयी 

सागर का ही विवर्त हैं !

आत्मा निरंजन है 

मन मात्र विवर्त है !!


1 टिप्पणी:

  1. आत्मा सुंदर विश्लेषण।
    सादर।
    ---------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १५ मई २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं