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बुधवार, फ़रवरी 22

किंतु न जानूँ पथ पनघट का

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किंतु न जानूँ पथ पनघट का पंथ निहारा, राह बुहारी  लेकिन तुम आए नहीं श्याम,  नयन बिछाए की प्रतीक्षा  बीत गए कई आठों याम ! अंतर में संसार भरा थ...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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