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बुधवार, फ़रवरी 22

किंतु न जानूँ पथ पनघट का


किंतु न जानूँ पथ पनघट का

पंथ निहारा, राह बुहारी 

लेकिन तुम आए नहीं श्याम, 

नयन बिछाए की प्रतीक्षा 

बीत गए कई आठों याम !


अंतर में संसार भरा था 

शायद तुम एकांत  निवासी, 

कहाँ बिठाती इस दुविधा से 

बचा गए मुझको घनश्याम !


अब यह सूनापन भाता है 

हर आहट पर हृदय धड़कता, 

एक नज़र ही पा जाए मन 

नहीं औरों से मुझको काम !


नगरी तेरी दूर  नहीं है 

किंतु न जानूँ पथ पनघट का, 

जीवन की संध्या  घिर आयी 

कब दर्शन  मिले  मनोभिराम !