मन पाए विश्राम जहाँ
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पेड़
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पेड़
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शनिवार, सितंबर 9
इच्छाएँ
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इच्छाएँ इच्छाएँ पत्तों की तरह उगती हैं मन के पेड़ पर कुछ झड़ जाती हैं आरम्भ में ही कुछ बनी रहती हैं देर तक कभी समाप्त नहीं होतीं यह एक...
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रविवार, अप्रैल 22
कुछ पल बगीचे में...
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कुछ पल बगीचे में... हवा सांय-सांय की आवाज लगाती बहती जाती है पेड़ों के झुरमुटों से सुनहली धूप में चमक रहा होता है जब घास का ए...
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रविवार, अप्रैल 15
यदि हम गए होते सारनाथ
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जब हम बनारस में थे एक बार सारनाथ जाने का कार्यक्रम बना पर किसी कारण वश सफल नहीं हो पाया तब मैंने यह कविता लिखी थी. यदि हम गए होते सारनाथ ...
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