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शनिवार, सितंबर 9

इच्छाएँ

इच्छाएँ 


इच्छाएँ पत्तों की तरह उगती हैं 

मन के पेड़ पर 

कुछ झड़ जाती हैं आरम्भ में ही 

कुछ बनी रहती हैं देर तक 

कभी समाप्त नहीं होतीं 

यह एक सदानीरा नदी सी 

कल-कल करतीं शोर मचातीं 

जिसमें तरंगें उठती गिरती हैं निरंतर 

पत्तों को मूल का ज्ञान नहीं हो पाता

जिनसे वे पोषित हैं 

न तरंगों को हिमशिखरों का 

अंततः मूल भी पोषित होता है धरा से 

और हिमशिखर जल से 

पंच भूतों के पार क्या गया है कोई 

भूत भावन है जो शिव सोई 

शिवोहम् मंज़िल है 

हम रास्तों पर ही अटक रहे हैं 

प्रकाश सम्मुख है 

हम अंधेरों में ही भटक रहे हैं ! 


रविवार, अप्रैल 22

कुछ पल बगीचे में...


कुछ पल बगीचे में...

हवा सांय-सांय की आवाज लगाती
बहती जाती है
पेड़ों के झुरमुटों से
सुनहली धूप में चमक रहा होता है
जब घास का एक एक तिनका
किसी तितली के इंतजार में फूल
आँखें बिछाए तो नहीं
बैठा होता डाली के सिरे पर..

सूनी सड़क पर एकाएक
गुजर जाती है कोई साईकिल
और ठीक तभी दूर से
आवाज देती है गाड़ी
स्टेशन छोड़ दिया होगा किसी ट्रेन ने
हाथ हिल रहे होंगे, प्लेटफार्म और
ट्रेन के कूपों से बाहर हवा में
जाने किस किस के....  

आकाश नीला है
और श्वेत बगुलों से बादल
इधर-उधर डोल रहे हैं
एक पेड़ न जाने किस धुन में बढ़ता चला गया है
बादल की सफेद पृष्ठभूमि में
खिल रहा है उसका हरा रंग
जैस सफेद चादर पर हरे बूटे...

रह रह के हवा झूला जाती है झूला
जिस पर बैठ कर लिखी जा रही है कविता
परमात्मा इतना करीब है इस पल कि
नासिका में भर रही है उसकी खुशबू
और कानों में गूंज रही है बादलों की गड़गड़ाहट
धूप की तेजी को कम करती
रह-रह कर सहला जाती है
हवा की शीतलता
मैं हूँ यह है सौभाग्य मेरा
एक श्वेत तितली
कहती हुई गुजर जाती है सामने से..
हवा सांय-सांय की आवाज लगाती
बहती जाती है बगीचे में...




रविवार, अप्रैल 15

यदि हम गए होते सारनाथ



जब हम बनारस में थे एक बार सारनाथ जाने का कार्यक्रम बना पर किसी कारण वश सफल नहीं हो पाया तब मैंने यह कविता लिखी थी.

यदि हम गए होते सारनाथ

झड़ गया होता
मन का हल्का सा भी तनाव
हरे पेड़ों की छाँव में,

वह नीला गगन
याद दिलाता अनंत की
और कुलांचे भरते हिरण
कैसी पुलक न भर देते मन प्राणों में

वे ऊँचे स्तूप बने है जिसकी याद में
उसकी सौम्य मूर्ति
भीतर तक एक शांति और ठहराव को जन्म देती
कतारें दीपकों की
अंतर को सुवासित करतीं

यदि हम गए होते सारनाथ....

भूल जाते कुछ पल के लिये
ओढ़ी हुई उपाधियाँ
प्रकृति के सान्निध्य में
बच्चे न बन जाते....