मन पाए विश्राम जहाँ
नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !
सलिल
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सलिल
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शुक्रवार, नवंबर 9
सब घटता है सहज यहाँ
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सब घटता है सहज यहाँ रात ढली, दिन उगा बोलो किसको श्रम हुआ, हवा बही सुरभि लिए बोलो किसने दाम दिए ! शिशु जन्मा, पांव चला क...
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रविवार, जुलाई 1
खाली मन का कोरा पन्ना
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खाली मन का कोरा पन्ना खाली है मन बिल्कुल खाली सर-सर जिसमें हवा गुजरती, कभी अनल बन लपट सुलगती नहर विमल सलिल की बहती ! मधुर...
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