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शुक्रवार, नवंबर 9

सब घटता है सहज यहाँ


सब घटता है सहज यहाँ


रात ढली, दिन उगा
बोलो किसको श्रम हुआ,
हवा बही सुरभि लिए
बोलो किसने दाम दिए !

शिशु जन्मा, पांव चला
किसने उसको खड़ा किया,
कली खिली, पुष्प बना
किसने रंग उड़ेल दिया !

नदी बही, सिंधु मिला
किसने उसका मार्ग गढ़ा,
सलिल उठा, मेघ बना
किसने उसको गगन दिया !

सब घटता है सहज यहाँ
मात्र यहाँ होना होता है,
होने में भी श्रम न कोई
बस खुद को मिटना होता है !

मिटना भी तो सहज घटे
जीवन का रहस्य मृत्यु है,
उससे ही सौंदर्य मिलता
वही मात्र परम सत्य है !




रविवार, जुलाई 1

खाली मन का कोरा पन्ना


खाली मन का कोरा पन्ना


खाली है मन बिल्कुल खाली
सर-सर जिसमें हवा गुजरती,
कभी अनल बन लपट सुलगती
नहर विमल सलिल की बहती !

मधुर गूंजता कलरव जिसमें
कभी पिघलते मधुरिम सपने,
झरे कभी पराग सुमनों से
स्वप्निल बहे फाग वृक्षों से !

रक्तिम आभा कभी झलकती
शीतल पावन अगन धधकती,
जल जाएँ इक-इक कर रोड़े
सुगम सुनहरी राह उभरती !

बरस-बरस नीले अम्बर से
मेघ तृषा बुझाते भू की,
बूंद-बूंद में लाते अमृत
बादल प्यास मिटाते जी की !

सहज प्रफ्फुलित रेशा-रेशा
खिली-खिली सी धरा सुहानी,
गहराई में तपन छुपी है
उसे सम्भाले शीतल पानी !

खाली मन का कोरा पन्ना
जिस रंग में चाहे रंग डालो,
केसरिया बन जले मशाल
एक क्रांति की लहर उठा दो !