सब घटता है सहज यहाँ
रात ढली, दिन उगा
बोलो किसको श्रम हुआ,
हवा बही सुरभि लिए
बोलो किसने दाम दिए !
शिशु जन्मा, पांव चला
किसने उसको खड़ा किया,
कली खिली, पुष्प बना
किसने रंग उड़ेल दिया !
नदी बही, सिंधु मिला
किसने उसका मार्ग गढ़ा,
सलिल उठा, मेघ बना
किसने उसको गगन दिया !
सब घटता है सहज यहाँ
मात्र यहाँ होना होता है,
होने में भी श्रम न कोई
बस खुद को मिटना होता है !
मिटना भी तो सहज घटे
जीवन का रहस्य मृत्यु है,
उससे ही सौंदर्य मिलता
वही मात्र परम सत्य है !