मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

मंगलवार, अक्टूबर 24

विजयादशमी

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विजयादशमी  माँ को पूज कर राम ने पाया विजय का वरदान,  किया विनाश दशानन का  मिला दुनिया में सम्मान ! राम तभी अवतार बने  जिस पल निज शीश झुकाया,...
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सोमवार, अक्टूबर 23

शिकायत ख़ुद से भी अनजान हुई

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   शिकायत ख़ुद से भी अनजान हुई  खुद से खुद की जब पहचान हुई ज़िंदगी फ़ज़्र की ज्यों अजान हुई  जिन्हें गुरेज था चंद मुलाक़ातों से  गहरी हरेक स...
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गुरुवार, अक्टूबर 19

अनजाने पथ पर वह सहचर

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अनजाने पथ पर वह सहचर नव सृजन घटे नव द्वार खुलें  कदम पड़ेगा जब अनंत का, नूतन राग जगेंगे,  जैसे   शीश उठाये कोमल दूर्वा ! नव भाषा, नव छंद, शब...
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मंगलवार, अक्टूबर 17

अबकी बार नवरात्रों में

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अबकी बार नवरात्रों में  तंद्रा, प्रमाद सताते हैं  देह को अथवा मन को   आत्मा सदा ही सचेतन है ! पर जैसे काली हो जाये चिमनी  तो प्रकाश नहीं आता...
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रविवार, अक्टूबर 15

माँ प्राण का आधार भी है

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माँ प्राण का आधार भी है    जो थामती है हर विपद में   दे ज्ञान दीपक पथ दिखाती, माँ प्राण का आधार भी है    रात्रि बनकर  विश्राम देती ! सौंदर्य...
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गुरुवार, अक्टूबर 12

नवरात्रि का करें स्वागत

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नवरात्रि का करें स्वागत  बस दो दिनों की प्रतीक्षा  फिर देवी का आगमन होगा  गरबे की धूम मचेगी  घरों में कलश स्थापन होगा  मिलजुल कर उत्सव मनाना...
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बुधवार, अक्टूबर 11

साक्षी

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साक्षी  जैसे दर्पण में झलक जाता है जगत  दर्पण ज्यों का त्यों रहता है  पहले देखती हैं आँखें फिर मन और तब उसके पीछे ‘कोई’  पर वह अलिप्त है  उस...
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सोमवार, अक्टूबर 9

अपनों का प्यार

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अपनों का प्यार यहाँ कुछ और नहीं  जीवन ही साध्य है  हर सुख टिका है जिस पर  भौतिक, मानसिक, आत्मिक  स्वास्थ्य ही प्राप्य है  श्वासें जो भीतर जा...
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शनिवार, अक्टूबर 7

हल्का हो मन उड़े

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हल्का हो मन उड़े यादों की गठरी ले  तन-मन ये चलते हैं,  कल का ही जोड़ आज   संग लिए फिरते हैं ! कोई तो उतारे बोझ हल्का हो मन उड़े,  एक बार बिन...
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बुधवार, अक्टूबर 4

भावों का अभाव उर खलता

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भावों का अभाव उर खलता बनता सहज अभाव का भाव  भावों का अभाव उर खलता टिकी ‘नहीं’ पर  नज़र  सदा ही  मन ‘है’ को  देख नहीं पाता  ! जग, सोने का अभि...
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गुरुवार, सितंबर 28

रहे साधते वीणा के स्वर

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रहे साधते वीणा के स्वर कितनी बार झुकें आखिर हम  कितनी बार पढ़ें ये आखर, जीवन सारा यूँ ही बीता  रहे साधते वीणा के स्वर ! श्वास काँपती ह्रदय डो...
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सोमवार, सितंबर 25

यह तू तो नहीं

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यह तू तो नहीं कहीं कुछ ऐसा नहीं  जहाँ नज़र ठहर जाये  दिल के मोतियों को लुटाता चल  कि यह दामन भर जाये हर सुकून भीतर ही मिला  जब भी मिला  बाहर...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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