मन पाए विश्राम जहाँ
नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !
अंबर
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गुरुवार, जून 26
अब कैसी दूरी अंतर में
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अब कैसी दूरी अंतर में जान लिया जब भेद हृदय का अब कैसी दूरी अंतर में, अंतरिक्ष में ग्रह घूमें ज्यों चंद्र-सूर्य अपने अंबर में ! उड़ना चाहे...
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शुक्रवार, अप्रैल 29
निज विलास में खोयी थी जो
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निज विलास में खोयी थी जो जग जब मुझमें ही बसता है क्या पाना क्या खोना इसका, युग बीतें जब इक पल में ही मिलना और बिछड़ना किसका ! पल-पल में घट...
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शुक्रवार, अप्रैल 15
निरभ्र गगन खुलता जाता
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निरभ्र गगन खुलता जाता नील वितान धरा को थामे मन मेघ देख क्यों कँप जाता, पल भर में छँट जाते बादल नीरव अंबर खुलता जाता ! काले धूसर घनघोर ...
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रविवार, नवंबर 25
दिल के तो पास है
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प्रिय ब्लॉगर साथियों , मैं बनारस व बैंगलोर की यात्रा पर जा रही हूँ, अब दिसंबर के तीसरे सप्ताह में मुलाकात होगी. आने वाले वर्ष के लिए तथा...
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