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गुरुवार, जून 26

अब कैसी दूरी अंतर में

अब कैसी दूरी अंतर में


जान लिया जब भेद हृदय का 

अब कैसी दूरी अंतर में, 

अंतरिक्ष में ग्रह घूमें ज्यों 

चंद्र-सूर्य अपने अंबर में !


उड़ना चाहें जितना उड़ लें 

भीतर बसा आकाश अनंत, 

 मिलते ही जिससे हो जाता 

हर पीड़ा हर रंज  का अंत !


जीवन इक उपहार अनोखा 

तन, मन, मेधा वाहक जिसके,

श्वास-श्वास में वही गा रहा 

वही छिपा है चेतनता में !


शुक्रवार, अप्रैल 29

निज विलास में खोयी थी जो

निज विलास में खोयी थी जो

जग जब मुझमें ही बसता है 

क्या पाना क्या खोना इसका,

 युग बीतें जब इक पल में ही

मिलना और बिछड़ना किसका !


 पल-पल में घटता है दर्शन

पट पर दृश्य बदलता जाता, 

द्रष्टा छुपा हुआ दर्शन में 

एक तत्व ही बस रह जाता !


अबदल अचल अगोचर कोई 

मायामय नूतन रूप धरे, 

नित निरभ्र अनंत अंबर सा 

बदली बन उर जिसमें विचरे !


छाने लगी सघन नीरवता 

गहन गुफा में सोयी थी जो, 

आना-जाना मिटा गयी है 

निज विलास में खोयी थी जो !


महक भरी जर्रे-जर्रे में 

उसी एक चेतन प्रज्ञा की, 

कब पत्ता भी हिला उस बिना 

आधार वही हर संज्ञा की !





शुक्रवार, अप्रैल 15

निरभ्र गगन खुलता जाता

निरभ्र गगन खुलता जाता 

नील वितान धरा को थामे 

मन मेघ देख क्यों कँप जाता, 

पल भर में छँट जाते बादल 

नीरव अंबर खुलता जाता !

 

काले धूसर घनघोर मेघ 

कहाँ कभी ढक पाये नभ को 

बना वही है आश्रय स्थल फिर

 अकुलाहट क्यों हो अंतर को !

 

ज़रा खोल दें खिड़की मन की 

या गवाक्ष की ओट गिरा दें,

खुला-खुला सा नभ दिख जाए 

नज़र उठा भर उधर देख लें !

 

चाहे मीलों दौड़ लगाए 

या पंछी सा तिरता जाए, 

वही विस्तीर्ण अनंत प्रदेश 

हर सीमा से मुक्त कराए !


रविवार, नवंबर 25

दिल के तो पास है


प्रिय ब्लॉगर साथियों,  मैं बनारस व बैंगलोर की यात्रा पर जा रही हूँ, अब दिसंबर के तीसरे सप्ताह में मुलाकात होगी. आने वाले वर्ष के लिए तथा क्रिसमस के लिए अग्रिम शुभकामनायें...


दिल के तो पास है 

अंबर की झील में 
चंदा की नाव है 
तारों की मीन सुंदर 
रंगो का गांव है  !

जाने किस लोक में 
परियों के गांव हैं 
फूल जहाँ बातें करते 
रोशन सी छाँव है !

मोती का नूर है 
ज्योति की हूर है,
दिल के तो पास है 
हाथों से दूर है !