मन पाए विश्राम जहाँ
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आलोक
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आलोक
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शनिवार, मई 16
किताबें
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किताबें किताबें बहलाती हैं, भरमाती हैं और कभी-कभी गिरते हुए को सम्भालती भी हैं। किताबें गुदगुदाती हैं, हँसाती है कभी-कभी सच को छिपाकर ...
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शनिवार, अप्रैल 24
वासन्ती प्रभात
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वासन्ती प्रभात जन्म और मृत्यु के मध्य बाँध लेते हैं हम कुछ बंधन जो खींचते हैं पुनः इस भू पर भूमिपुत्र बनकर न जाने कितनी बार बंधे हैं अ...
17 टिप्पणियां:
गुरुवार, नवंबर 26
आहट
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आहट अनजाने रस्तों से कोई आहट आती है बुलाती है सहलाती सी लगती कौतूहल से भर जाती है जाने किस लोक से भर जाती आलोक से मुदित बन जात...
15 टिप्पणियां:
मंगलवार, अक्टूबर 13
उस लोक में
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उस लोक में जहां आलोक है अहर्निश किंतु समय ही नहीं है जहाँ रात-दिन घटें कैसे ? पर शब्दों की सीमा है जागरण के उस लोक में जहाँ नितांत एकां...
3 टिप्पणियां:
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