मन पाए विश्राम जहाँ
नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !
निद्रा
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निद्रा
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सोमवार, मार्च 9
शांति कमल कैसे खिल जाते
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शांति कमल कैसे खिल जाते सजग रहेगा सदा जगत में जगा हुआ मन अपने भीतर, बाहर जागा कब सो जाये रहती उसको यह कहाँ खबर ! भान नहीं अपने होने क...
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शुक्रवार, जुलाई 4
ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा
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ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा गहराई में जाकर देखें एक धरा से उपजे हैं सब, ऊँचाई पर बैठ निहारें सूक्ष्म हुए से खो जाते तब ! रहे धरा पर उसको पीड़...
8 टिप्पणियां:
सोमवार, सितंबर 28
पंख पसार उड़े क्षितिजों तक
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पंख पसार उड़े क्षितिजों तक एक जागरण ऐसा भी हो खो जाए जब अंतिम तन्द्रा, रेशा-रेशा नाचे ऊर्जित मिटे युगों की भ्रामक निद्रा ! मन जो सिकुड़ा...
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रविवार, फ़रवरी 5
ऊपर हँसते भीतर गम था
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ऊपर हँसते भीतर गम था जाने कैसी तंद्रा थी वह कितनी गहरी निद्रा थी वह, घोर तमस था मन पर छाया ढके हुए थी सब कुछ माया ! एक विचारों का जंगल थ...
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