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सोमवार, मार्च 9

शांति कमल कैसे खिल जाते

शांति कमल कैसे खिल जाते  

सजग रहेगा सदा जगत में 

जगा हुआ मन अपने भीतर, 

बाहर जागा कब सो जाये 

 रहती उसको यह कहाँ खबर ! 


भान नहीं अपने होने का 

तंद्रा, निद्रा में खोया है, 

सपनों में ही हर्ष मनाता 

हर दुख सपनों में बोया है !  


छवियाँ गढ़ लीं थीं अनजाने 

जिनको सत्य मानकर जीता, 

अमृत समझ के विष की बूँदें 

कितने अरमानों से पीता ! 


रण के बादल घिर आये फिर 

इसकी ही तैयारी की थी, 

 शांति कमल कैसे खिल जाते  

पीड़ा से ही यारी की थी !



शुक्रवार, जुलाई 4

ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा

ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा


गहराई में जाकर देखें 

एक धरा से उपजे हैं सब, 

ऊँचाई पर बैठ निहारें 

सूक्ष्म हुए से खो जाते तब !


रहे धरा पर उसको  पीड़ा 

ऊपर-नीचे जग है क्रीड़ा, 

ज्यों निद्रा में सब खो जाये 

स्वप्नों में भी मन बहलाये ! 


लेकिन एक अवस्था चौथी 

जिसमें तीनों एक हुए हैं, 

जगना, सोना, स्वप्न देखना 

तीनों जहां विलीन हुए हैं !


वहीं ठिकाना मिला जिसे गर 

सदा तृप्त, हर्षित हो गाए, 

जुड़ अनंत ऊर्जा से निशदिन 

तीनों में वह आये-जाये !


सोमवार, सितंबर 28

पंख पसार उड़े क्षितिजों तक

 पंख पसार उड़े क्षितिजों तक 

एक जागरण ऐसा भी हो 

खो जाए जब अंतिम तन्द्रा, 

रेशा-रेशा नाचे ऊर्जित 

मिटे युगों की भ्रामक निद्रा !


मन जो सिकुड़ा-सिकुड़ा सा था 

पंख पसार उड़े क्षितिजों तक, 

सारी कायनात भरने फिर 

बाहें फैलें नीलगगन तक !


दूजा नहीं दिखाई देता 

संग पवन के चले डोलते,

चहूँ ओर वसन्त छाया हो 

नयन प्रेम के राज खोलते !


संशय, भ्रम, भय जलें अग्नि में 

अनहद घन मंजीरे बजते,

मानस भू पर बहे प्रीत रस 

थिरकें झूमें पुष्प ख़ुशी के !


एक जागरण ऐसा भी हो 

फिर न कभी मदहोशी घेरे, 

नहीं सताए कोई अभाव 

पलकों में ना स्वप्न अधूरे !


रविवार, फ़रवरी 5

ऊपर हँसते भीतर गम था


ऊपर हँसते भीतर गम था


जाने कैसी तंद्रा थी वह
कितनी गहरी निद्रा थी वह,
घोर तमस था मन पर छाया
ढके हुए थी सब कुछ माया !

एक विचारों का जंगल था
भीतर मचा महा दंगल था,
खुद ही खुद को काट रहे थे
कैसा फिर ? कहाँ मंगल था !

अपनों से ही की थी दुश्मनी
कभी किसी सँग बात न बनी,
एक अबूझ डर भीतर व्यापा
भृकुटी रही सदा ही तनी !

एक नर्क का इंतजाम था
आधि-व्याधि का सरंजाम था,
ऊपर हँसते भीतर गम था
भावनाओं का महा जाम था !

लेकिन कोई भीतर तब भी
जाग रहा था देखा जब भी
बड़ा सुकून मिला करता था
बाहर लेकिन दुःख था अब भी

धीरे-धीरे वह मुस्काया
पहले पहल स्वप्न में आया,
सहलाया रिसते जख्मों को
फिर तो अपने पास बुलाया !

एक झलक अपनी दिखलाई
लेकिन फिर न पड़े दिखाई,
एक खोज फिर शुरू हो गयी
भीतर की फिर दौड़ लगाई !

कही प्रार्थना अश्रु बहाए
निशदिन मन उसको ही बुलाए,
दिन भर काम में भूल गया हो
पर नींदों में वही सताए !

शनैः शनैः फिर राह मिल गयी
आते-जाते कली खिल गयी,
सुरभि बिखेरे अब विकसित हो
जब प्रमाद की चूल हिल गयी !

अब तो मीत बना है मन का
भेद बड़ा पाया जीवन का,
उससे मिलने ही हम आये
यही लाभ है सुविधा धन का !