मन पाए विश्राम जहाँ
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रविवार, जुलाई 19
कैसे कोई समझे उसको
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कैसे कोई समझे उसको वह अजर अमर, है अटल शिखर अखिल ब्रह्माण्ड में व्याप रहा, कुसुमों से भी कोमल उर है बन मानव हर संताप...
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मंगलवार, दिसंबर 29
जाता हुआ वर्ष
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जाता हुआ वर्ष वक्त का पहिया आगे कुछ सरक गया अनगिन सौगात दे और एक बरस गया दुनिया में युद्ध कहीं शांति की बात हुई पारा कुछ और ...
4 टिप्पणियां:
रविवार, जनवरी 11
उसने कहा था
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उसने कहा था जानते हो क्यों भला-भला लगता है ? निरभ्र..विस्तीर्ण गगन निस्सीम, निस्तब्धता छू जाती है अंतर आकाश को जैसे को...
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