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रविवार, जुलाई 19

कैसे कोई समझे उसको


कैसे कोई समझे उसको 
 

वह अजर अमर, है अटल शिखर 
अखिल ब्रह्माण्ड में व्याप रहा, 
कुसुमों से भी कोमल उर है 
बन मानव हर संताप सहा !
 
लघु पीड़ा से व्याकुल होता 
प्रियजन पर प्रेम लुटाता है, 
जब कोई राह भटक जाता 
करूणाकर पुनः दिखाता है !
 
वह वाणी का मर्मज्ञ बड़ा 
रसिक दिलदार रसज्ञ भी है, 
प्रकृति ने अनेकों रूप धरे 
भरे प्राण उन्हें डुलाता है !
 
जड़ चट्टानों से झर निर्झर
उससे ही बह चैतन्य हुए,
अग्नि की लपटों में प्रज्ज्वलित 
वायु के प्रचंड झकोरों में !
 
असीम अंबर सा व्याप्त रहा 
सब लीला उसमें घटती है, 
कैसे कोई समझे उसको 
मेधा भी उससे झरती है !
 
वह शिव भी है शक्ति भी वही 
वह एक बहुत अलबेला है,
उसको भजता मन जिस क्षण जो  
रहता ना कभी अकेला है !
 

मंगलवार, दिसंबर 29

जाता हुआ वर्ष

जाता हुआ वर्ष

वक्त का पहिया आगे कुछ सरक गया
अनगिन सौगात दे और एक बरस गया

दुनिया में युद्ध कहीं शांति की बात हुई
पारा कुछ और चढ़ा भारी बरसात हुई

बदलीं निष्ठाएं कुछ सत्ताए भी छिनीं 
सहनशीलता घटी अफवाहें भी बुनीं

तेवर शीतल हुए मंदी की मार पड़ी
योगमय हुआ विश्व ध्यान की लहर बढ़ी

सीरिया में रक्त बहा बेघर को घर मिला
द्वार खुले ही मिले जहाँ गया काफिला

आई एस का जुल्म बढ़ा दूरियां भी घटीं
समीकरण बने नये मित्रता को शक्ल दी

विष बढ़ा वायु में विकास महंगा पड़ा
जाता हुआ यह बरस दे कई सबक गया 

रविवार, जनवरी 11

उसने कहा था

उसने कहा था


जानते हो
 क्यों भला-भला लगता है ?
निरभ्र..विस्तीर्ण गगन
निस्सीम, निस्तब्धता छू जाती है
अंतर आकाश को
जैसे कोई दो बिछुड़े मित्र मिलकर
प्रसन्न हो जाएँ !

गंगा की लहरों से खेलना
युगों से लुभाता रहा है क्यों हमें ?
सागर की उत्ताल लहरों का स्पर्श
कर जाता है रोमांचित
क्योंकि नाच उठता है
भीतर का जल तत्व उसके साथ
उन पलों में होकर एकाकार !

अग्नितत्व भी हो जाता है तरंगित
निहार उठती हुई लपटों को
थिरक उठते हैं कदम तभी
होलिकादहन और लोहरी के उत्सवों में !

हो जाता होगा तन्मय वायुतत्व भी
सहला जाता है जब हवा का झोंका हौले से
और.... भला-भला लगता है माटी का स्पर्श
क्यों कुम्हार को ?
किसान घंटो गुजारता है उसके अंग-संग
उनके भीतर की माटी भी लेती है कोई आकार
पंच तत्वों से बने मानव
उन्हीं से जुड़कर होते हैं
वास्तव में आनंदित, प्रफ्फुलित !