मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

सोमवार, अक्टूबर 12

जो खिल रहा अनंत में

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  जो खिल रहा अनंत में  एक ही तो बात है  एक ही तो राज है,  एक को ही साधना  एक से दिल बाँधना ! एक ही आनंद है  वही जीवन छंद है,  बह रहा मकरंद ह...
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शुक्रवार, अक्टूबर 9

ज्ञान और ज्ञाता

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  ज्ञान और ज्ञाता जो किताबें आज सजी हैं  पुस्तकालयों की आलमारियों में  वे कभी रहा करती थीं  मानव मस्तिष्क में  जब तक प्रकटी नहीं  तब भी थीं...
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गुरुवार, अक्टूबर 8

प्रार्थना

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  प्रार्थना   जो दिया है तूने हे प्रभु ! असीम है  नहीं समाता इस झोली में  तू दिए ही जाता है  तेरी अनुकम्पा की क्या कोई सीमा है ? उदार मालिक ...
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मंगलवार, अक्टूबर 6

मन और वह

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मन और वह  मन  हिरण सा दौड़ता है  धरती से आकाश तक  अनभिज्ञ.... कि कोई है ज्योति शिखा सा  भीतर जलता है, अकंप  जो उसमें प्राण फूँकता है  मन बादल...
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सोमवार, अक्टूबर 5

बरसेगा वह बदली बनकर

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  बरसेगा वह बदली बनकर  उर में प्यास लिए राधा की  कदमों में थिरकन मीरा की,  अंतर्मन में निरा उत्साह  उसकी बांह गहो ! जीवन की आकुलता से भर  प्...
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रविवार, अक्टूबर 4

अस्तित्त्व और हम

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  अस्तित्त्व और हम   एक हवा का झोंका भी आकर  उसकी खबर दे जाता है  दूर गगन में उगता हुआ साँझ का तारा  उसकी याद से भर जाता है  बादलों में बना ...
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शनिवार, अक्टूबर 3

लुटा रहा वह धार प्रीत की

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लुटा रहा वह धार प्रीत की    जीवन के इस महाविटप पर  दो खग युगों-युगों से बसते,  एक अविचलित सदा प्रफ्फुलित  दूजे के पर डोला करते ! लुटा रहा वह...
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शुक्रवार, अक्टूबर 2

गाँधी बाबा

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गाँधी बाबा तुम्हारा जीवन ही तुम्हारा संदेश है ‘सत्य ही ईश्वर है’ से ‘ईश्वर सत्य है’ की  तुम्हारी यात्रा  कितनी अनोखी है, अप्रतिम, अनिवर्चनीय...
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गुरुवार, अक्टूबर 1

मिलन अधूरा उसे न भाए

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मिलन अधूरा उसे न भाए जन्मों की मृदु प्रीत पुरानी  कुछ भूली सी अनजानी कुछ,  उस प्रियतम को जरा पुकारो    दौड़ा आता हर पुकार पर ! निज सुख खातिर ...
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बुधवार, सितंबर 30

दोनों के ही पार मिले वह

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दोनों के ही पार मिले वह  देखे राग-रंग दुनिया के  मृग मरीचिका ही सब निकले,   निकट जरा जा  छूकर देखा  जैसे इंद्रधनुष हो नभ में ! पीड़ाओं के बीज...
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मंगलवार, सितंबर 29

नाचती इक ऊर्जा ही

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नाचती इक ऊर्जा ही   नित नवीन निपट अछूती इक मनोहरी ज्योत्स्ना है, सुन सको तो सुनो उसकी  आहट ! यह न  कल्पना है ! गूँज कोई नाद अभिनव  हर शिरा म...
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सोमवार, सितंबर 28

पंख पसार उड़े क्षितिजों तक

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  पंख पसार उड़े क्षितिजों तक  एक जागरण ऐसा भी हो  खो जाए जब अंतिम तन्द्रा,  रेशा-रेशा नाचे ऊर्जित  मिटे युगों की भ्रामक निद्रा ! मन जो सिकुड़ा...
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शुक्रवार, सितंबर 25

भोर में कोई जगाये

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  भोर में कोई जगाये  चैन नींदों में समाए  स्वर्ग स्वप्नों में दिखाए, भोर में कोई जगाये  बस यही तुम मांग लेना !  बैन में मधुरा भरी हो  नैन सू...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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