मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

शनिवार, अगस्त 6

भारत

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भारत  ओ मेरे देश !  तेरे आँचल में जन्म लिया और  तेरी हवाओं ने पाला हमको  तेरी माटी में पले, खेले   तेरी फ़िज़ाओं ने सम्भाला हमको ! तेरी हर ब...
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गुरुवार, अगस्त 4

आज़ादी का अमृत महोत्सव

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आज़ादी का अमृत महोत्सव  सप्त  दशकों व पाँच वर्ष का   सफ़र तय किया है भारत ने ?  आदि सनातन संस्कृति अनुपम  राह दिखायी जग को जिसने ! जूझा कभी ...
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मंगलवार, अगस्त 2

छिपा बूँद में भी इक सागर

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छिपा बूँद में भी इक सागर छोटा सा दिल लघु सी चाहत  उससे बनती मन की कारा,  उठो आज अम्बर को छू लो  है अनंत सामर्थ्य तुम्हारा ! ​​शुभ विवेक, आनं...
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शनिवार, जुलाई 30

शुभ कर्मों का बहे मकरंद

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शुभ कर्मों का बहे मकरंद ​​चेतन अमर, अजर, अविनाशी  प्रेम, शांति व हर्ष का सागर,  अहंकार बिंधता स्वयं से  अहंकार सीमित सम कायर ! जीवन जैसा है,...
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गुरुवार, जुलाई 28

जाग कर देखें जरा

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जाग कर देखें जरा  कैद पाखी क्यों रहे  जब आसमां उड़ने को है, सर्द आहें क्यों भरे  नव गीत जब रचने को है ! सामने बहती नदी  भला ताल बन कर क्यों प...
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मंगलवार, जुलाई 26

महाकाल सँग इक हो जाएँ

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महाकाल सँग इक हो जाएँ  लय खोयी छूटा छंद आज  जीवन में छाया महा द्वंद्व,  कविता सोयी भाव अनमने  कहाँ खो गया मधुर मकरंद ! समय पखेरू उड़ता जाता ...
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शनिवार, जुलाई 23

कहीं धूप खिली कहीं छाया

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कहीं धूप खिली कहीं छाया     यहाँ कुछ भी तजने योग्य नहीं  यह जगत उसी की है माया,   वह सूरज सा नभ में दमके  कहीं धूप खिली कहीं छाया ! दोनों का...
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गुरुवार, जुलाई 21

अंतर में इक दीप जलाये

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अंतर में इक दीप जलाये खुद का खुद से मिलना कैसा  कली-पुष्प में खिलने जैसा,  लहर सिंधु में ज्यों खो जाये  सुरभि चमन में भरने जैसा ! नभ में कोई...
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सोमवार, जुलाई 18

जब याद कमल सर खिलता है

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जब याद कमल सर खिलता है तू हर उस पल में मिलता है  जब याद कमल सर खिलता है,  नहीं अतीत न भावी में ही  दर्पण दर्शन का मिलता है ! मन जो नित भागा ...
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शुक्रवार, जुलाई 15

यह पल

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यह पल  जो अनंतानंत ब्रह्माडों का स्वामी है  वही भीतर ‘मैं’ होकर बैठा है   एक होकर मानो दो में बंट गया है  समय अखंड है, अखंड है  चेतना जैसे ...
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बुधवार, जुलाई 13

सदगुरु दोनों हाथ लुटाता

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सदगुरु दोनों हाथ लुटाता खुद से बढ़कर कुछ भी जग में पाने योग्य नहीं है, कहता, उसी एक को पहले पालो सदगुरु दोनों हाथ लुटाता !   जग में होकर नही...
7 टिप्‍पणियां:
सोमवार, जुलाई 11

एक कंकर चाहतों का

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एक कंकर चाहतों का  टुकड़ा-टुकड़ा जोड़ा मन    बुत इक अद्भुत बना लिया,   कभी सोया जागा कभी  कुछ स्वप्नों से सजा लिया ! दर्पण झील हुआ जब थिर   था ...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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