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सोमवार, अप्रैल 26

रहमतें बरसती हैं

 

रहमतें बरसती हैं

करें क़ुबूल सारे गुनाहों को हम अगर

रहमतें बरसती हैं, धुल ही जायेंगे 


हरेक शै अपनी कीमत यहाँ माँगे 

 भला कब तक चुकाने से बच पाएंगे 


 वही खुदा बसता सामने वाले में भी

 खुला यही राज कभी तो पछतायेंगे 


मांग लेंगे करम सभी नादानियों पर 

और अँधेरे में मुँह नहीं छुपायेंगे 


उजाले बिखरे हैं उसकी राहों में 

 यह अवसर भला क्यों चूक जायेंगे 


अपनी ख्वाहिशें परवान चढ़ाते आये 

अब उसी मालिक के तराने गाएंगे 


भूख से ज्यादा मिला प्यास फिर भी न बुझी 

 आखिर कब तक यह मृगतृषा बुझाएंगे 

 

गुरुवार, फ़रवरी 25

वह

वह 


खुदा बनकर वह सदा साथ निभाता है

मेरा हमदम हर एक काम बनाता है 


जिंदगी फूल सी महका करे दिन-रात 

कितनी तरकीब से सामान जुटाता है  


न कमी रहे न कोई कामना अधूरी 

बिन कहे राह से हर विरोध हटाता है 


किस तरह करें शुक्रिया ! कैसे जताएं ?

कुछ किया ही नहीं काम यूँ कर जाता है 


दिल मान लेता जिस पल आभार उसका 

वह निज भार कहीं और रख के आता है 


कौन है  सिवाय उसके या रब ! ये बता 

वही भीतर वही बाहर नजर आता है  

 

गुरुवार, दिसंबर 10

हरेक शै के दो पहलू हैं जनाब

 हरेक शै के दो पहलू हैं जनाब

'जो' है खुशी का सबब किसी के लिए 

कुछ उससे ही दुखों के वस्त्र सिले जाते हैं

जमाने में फूल भी तो खिलते हैं

महज फितरत से कांटे ही चुने जाते हैं

दी है खुदा ने पूरी आजादी 

कोई जन्नत, कुछ जहन्नुम से दिल लगाते हैं

शब्द सारे उन्हीं स्वर-वर्ण से बने 

कोई वंदन तो कुछ क्रंदन में पिरोते हैं

मिले हर माल कुदरती बाजार में 

कोई सुकून तो कुछ झंझट लिए जाते हैं

नजर अपनी ही धुंधली है मगर

इल्जाम जमाने को दिए जाते हैं

नजर बदली तो नजारे बदलते 

रंगीन चश्मे लगा श्वेत शै चुने जाते हैं

मुक्कमल आकाश छिपाए भीतर

लोग  पिंजरों में जिंदगी बिताए जाते हैं 

दरिया बहते समंदर ठाठें मारे 

जाने क्यों प्यास दिल से लगाए जाते हैं 

कौन कहता है, रब नहीं, बुद्ध ने कहा

स्वयं बंद आँखों में बसाए जाते हैं !