सोमवार, जनवरी 27

माँ



माँ 


माँ दुआओं का ही दूजा नाम है 
उसके दामन में सहज विश्राम है 

सर्द थीं कितनी हवाएं रोक न पायीं कभी 
नित लगीं घर काम में मुँह अंधेरे उठ गयीं 

गर्म चूल्हे की तपन जलता हुआ तंदूर था 
मुस्कुराते ही दिखीं यादों में हर मंजर खुला 

चन्द लम्हे फुरसतों के जब कभी उन्हें मिले
ली सलाई हाथ में ऊन के गोले खुले 

रेडियो पर सुन कहानी पत्रिका अखबार पढ़तीं 
इतिहास दसवीं में पढ़ा याद था उनको जुबानी 

छोड़ कर चल दीं जहां दिल से ना जा पायीं मगर
साया बनकर साथ हैं हर घड़ी आशीष बन कर  

आज माँ की उन्नीसवीं पुण्यतिथि है 

शनिवार, जनवरी 25

देश अपना फले-फूले

गणतन्त्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें


देश अपना फले-फूले

संस्कृति अद्धभुत यहाँ की 
सृष्टि के नव राज खोले, 
पूर्वजों ने दी विरासत 
वेद की हर ऋचा बोले !

धर्म के पथ पर चलें सब 
अर्थ का भंडार भर लें, 
कामना भी पूर्ण होगी 
मोक्ष का भी स्वाद चख लें !

पांव धरती पर टिके हों 
भाव जिसके गगन छू लें, 
सृष्टि कण-कण से जुड़े रह 
मर्म जीवन का समझ ले !

सम रहे जो धीर वह है 
लक्ष्य साधे वीर वह है, 
जीत का ही स्वर सुनाई
दे रहा हर कोण से है  !

जन्म से कोई न ब्राह्मण 
कर्म ही यह तय करेगा, 
परम भी यदि अवतरित हो 
कर्म का वह फल भरेगा !

अमर ऐसा देश अपना 
नभ की ऊँचाई छू ले, 
गा रहा हर देशवासी 
देश अपना फले-फूले !

शुक्रवार, जनवरी 24

ज्ञान और अज्ञान


ज्ञान और अज्ञान



असीम है ज्ञान और अज्ञान की भी सीमा नहीं है मानव के सह लेता है जन्म और मृत्यु का दुःख काट लेता है वृद्धावस्था भी रो-झींक कर सामना करता है रोग का पर क्या कहें दुःख के उस भंडार का जो लिए फिरता है अपने कांधों पर उस क्रोध का, जो जलाता है खुद को और झुलसाती है जिसको आंच दूसरों को भी ईर्ष्या की लपटें जो खुद ही सुलगाता है भीतर जब चीजें जुडी हैं आपस में इस तरह कि एक चींटी भी दे रही है योगदान इस सृष्टि में तो वह अहंकार के हाथी पर चढ़ा गिर कर धूल फांकता है न जाने किस अज्ञात भय से कँपता है उसका मन घृणा का बीज डालता है स्वयं ही फिर प्रेम के फलों की उम्मीद बाँधता है समझदारी की आशा कौन करे विवेक को सुलाकर मदहोश हुआ चंद घड़ियाँ चैन से बिताता है पाना चाहता है सारा संसार बिना श्रम लेकर असत्य का सहारा भी ...

बुधवार, जनवरी 22

समाधि का फूल

समाधि का फूल

“जब गिर जाएगी झूठ की आखिरी दीवार भी भीतर 
सुडौल हो जायेगा भावनाओं का नुकीला पत्थर घिसते-घिसते 
जो चुभ जाता था खुद को और चुभाया जाता था दूसरों को 
जब तृप्त हो जाएगी मन की आखिरी वासना भी 
जीने की, यश और साहचर्य की 
“जब गिर जाएगी झूठ की आखिरी दीवार भी भीतर सुडौल हो जायेगा भावनाओं का नुकीला पत्थर घिसते-घिसते जो चुभ जाता था खुद को और चुभाया जाता था दूसरों को जब तृप्त हो जाएगी मन की आखिरी वासना भी जीने की, यश और साहचर्य की जब उत्तेजना के साधन नहीं जुटाने होंगे मन के शावक को तृप्त होगा वह उस कोमल शिशु की भांति जो जल की अनंत राशि पर लेटा तिरता है जब ऐसा होगा तो समाधि का फूल खिलेगा” कहा गुरू ने पूछा शिष्य ने, “जब तक खिले न समाधि का फूल, कोई ऐसा कैसे हो सकता है ? देख पायेगा वही भीतर असत्य का धुआं जो जाग गया है आत्मकामी होना बिना असीम सुख को पाए सम्भव ही नहीं “ गुरू ने एक फूल दिया शिष्य को और पूछा, “यह पहले खिला या सहे इसने बीज से फूल होने की यात्रा के दंश मिटाया अपने अस्तित्व को सही धूप और बारिश की मार वह बीज तुम हो ! समाधि का फूल जो खिलेगा एक दिन उसकी संभावना भीतर लिए हो !”

सोमवार, जनवरी 20

सन्नाटे को गुनना होगा


सन्नाटे को गुनना होगा



शब्दों को तो बहुत पढ़ लिया सन्नाटे को गुनना होगा, शोर बहुत है इस दुनिया में नीरवता को चुनना होगा ! महानगर की अपनी ध्वनियाँ गाँवों में भी शोर बढ़ रहा, दिनभर वाहन आते-जाते देर रात संगीत बज रहा ! कानों में मोबाईल लगा कोकिल के स्वर सुनेगा कौन ? कुक्कुट की ना बाँग सुन रहे गऊओं का रंभाना मौन ! अपनों को भी नहीं सुन रहे मन में भीषण शोर मचा है, खुद की आवाजें भी दुबकीं जग को भीतर बसा लिया है ! जाने किससे बात हो रही दूजा कोई नहीं वहाँ है, उस तक पहुँच नहीं हो पाती निर्जन में ही जो रमता है !

रविवार, जनवरी 19

व्यक्ति या अभिव्यक्ति


व्यक्ति या अभिव्यक्ति 


अव्यक्त जब व्यक्त होता है शक्ति के साथ कहलाता है व्यक्ति और तब अहंकार का जन्म होता है सीमाएं बनती हैं जब व्यक्ति मात्र एक अभिव्यक्ति बन जाये उस अव्यक्त की तो जन्मता है मोक्ष टूट जाती हैं सारी सीमाएं ! पृथ्वी जब व्यक्त होती हैं देशों के माध्यम से तो युद्धों का जन्म स्वाभाविक है जैसे मानव ने गढ़ लिए हैं एक भूमि पर अनेक देश वैसे ही नहीं क्या एक ब्रह्म में अनेक जगत एक को जिसने पहचान लिया वह मुक्त हुआ वही भागीदार बना उस अनन्त सत्य का एकत्व का अनुभव किया वृक्षों, पर्वतों, गगन, अनल, पवन के संग एक में सबको, सबमें एक को देखो कृष्ण ने यही तो गाया है एक ही प्रेम, एक ही दर्द हर दिल में समाया है एक ही सत्य को अनेक रूपों में दर्शाया है हर बुद्ध ने इसी पथ पर चलाया है !

शुक्रवार, जनवरी 17

प्रेम


प्रेम 


एक-दूजे को समझते हुए 
एक दूजे को ऊपर उठाते हुए 
साथ-साथ जीने का नाम ही प्रेम है 
अहंकार तज कर हँसते-हँसते हर मान-अपमान को 
सहने का नाम ही प्रेम है 
दूसरे को प्रीतिकर हों ऐसे वचन ही मुख से निकलें 
इस सजगता का नाम ही प्रेम है 
सब कुछ साझा है इस जहाँ में 
हर कोई जुड़ा है अनजान धागों से,
धरा, गगन, पवन, अनल और सलिल के साथ 
जुड़ाव महसूस करने का नाम ही प्रेम है 
मैत्री और साहचर्य का आनन्द लेने और बाँटने का नाम ही प्रेम है 
मुक्त है यह प्रेम एकाधिकार से, दुःख और घृणा से 
जो बाँधता नहीं मुक्त करता है 
अनंत से मिलाने का दम रखता है 
अंतर में शांति और आनंद भरता है 
एक समन्वय, सामंजस्य और बोध का नाम ही प्रेम है !  

गुरुवार, जनवरी 16

मन


मन 

सुख-दुःख, राग-द्वेष के तट पर नदिया जैसा बहता है मन, इस तट आकर पुलकित होता उस तट उदग्विन रहता है मन ! मिट कर चैन मिले न जाने किरणों संग यदि उड़ जाये, उसी एक से एक हुआ तब नजर नहीं किसी को आये ! किन्तु उसे दूर जाना है लक्ष्य कई मन में पाले हैं, पाहन, जंगल, विजन, शहर भी उसके रस्ते में आने हैं ! नहीं ज्ञात है आखिर में तो हर नदिया को मिटना होगा, सागर के खारे जल में ही सूरज के संग तपना होगा !

मंगलवार, जनवरी 14

है सारा विस्तार एक से



है सारा विस्तार एक से

सूरज बनकर दमक रहा है बना चन्द्रिका चमक रहा है, झर झर झरती जल धार बना बन सुवास मृदु गमक रहा है ! हरियाली बन बिखराता सुख भाव रूप में मौन व गरिमा कहाँ अलग धरती अम्बर से है सारा विस्तार एक से ! जल का स्वाद, अन्नका पोषण वह ही लपट आग की नीली, उससे ही जग का आकर्षण वही ज्वाला बनी है पीली ! वह ही भाव, विचार, ज्ञान है वह ही लघु, सबसे प्रधान है, उससे कोई कहाँ विलग है जिससे है वह कहाँ अलग है ! जननी है वह सब जीवों की उससे रूप सभी को मिलता, वही पराशक्ति भी अजर वह नाम जहाँ से पैदा होता ! खुद को खुद की जगे कामना ऐसी माया वह ही रचती, जग का पहिया रहे डोलता ऐसा कुछ आयोजन करती ! थामे हुए नजर है कोई आसपास ही सदा डोलती, ग्रह, नक्षत्र सभी की शोभा एक उसी का राज खोलती !



शनिवार, जनवरी 11

जीवन


जीवन 

बरसों बीते जीते जीते जीवन से कब आँख मिलाई, निकट खड़ा वह मुस्काता था दुःख की देते रहे दुहाई ! शब्दों के जंगल में भटके ज्योति किरण न छन जहाँ आई, मौन की इक नदी बहती थी किन्तु कभी ना प्यास बुझाई ! कुसुमों संग खिलता है जीवन पवन परस में भी छू जाए, शीतल छुअन धरा की पग पग तपन अनिल को भी दे जाए ! जीवन इस पल में मिलता है यादों में क्यों उसे बुलायें, स्वप्नों में अंतर भटक रहा अभी-अभी वह नगमे गाये !


गुरुवार, दिसंबर 26

वक्त चुराना होगा

नया वर्ष आने पर हम हर बार संकल्प लेते हैं, नियमित भ्रमण और व्यायाम करेंगे, नियमित योग और ध्यान करेंगे, नियमित अध्ययन और लेखन करेंगे, किन्तु कुछ दिनों बाद जब जीवन अपने पुराने क्रम में आ जाता है तो सबसे पहले यही शब्द निकलते हैं, क्या करें समय ही नहीं मिलता. मुझे लगता है आने वाले वर्ष में यदि हम जीवन में कुछ सकारात्मक बदलाव चाहते हैं तो हमें अपने लिए कुछ वक्त चुराना होगा।


वक्त चुराना होगा !

काल की तरनि बहती जाती 
तकता तट पर कोई प्यासा,
सावन झरता झर-झर नभ से 
मरुथल फिर भी रहे उदासा ! 

झुक कर अंजुलि भर अमृत का भोग लगाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

समय गुजर ना जाए यूँ ही 
अंकुर अभी नहीं फूटा है,
सिंचित कर लें मन माटी को 
अंतर्मन में बीज पड़ा है !

कितने रैन-बसेरे छूटे यहाँ से जाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

कोई हाथ बढ़ाता प्रतिपल 
जाने कहाँ भटकता है मन, 
मदहोशी में डुबा रहा है 
मृग मरीचिका का आकर्षण !

उस अनन्त में उड़ना है तो सांत भुलाना होगा 
वक्त चुराना होगा !

जग की नैया सदा डोलती 
हिचकोले भी कभी लुभाते, 
जिन रस्तों से तोबा की थी 
लौट-लौट कर उन पर आते !

नई राह चुनकर फिर उस पर कदम बढ़ाना होगा 
वक्त चुराना होगा !



बुधवार, दिसंबर 25

अंतरलोक



अंतरलोक

देश-काल से परे है जो
आधार है सृष्टि का 
उस जीवन से आँख मिलाकर ही 
कोई इस जीवन से हाथ मिला सकता है 
उस अदृश्य लोक से भरकर प्रकाश 
इस अंधकार में नन्हा सा ही सही 
एक दीपक जला सकता है 
बादल कहीं से तो भरते हैं खुद को 
बदल देते हैं मरुथलों को चारागाहों में 
सुवास लती हैं हवाएं उपवनों से गुजर 
अंतर शांति से भर लेता है जो मन 
निज आकाश को 
बना देता है मैत्री पल वही जगत में 
वैर से हल नहीं होते छोटे से मतभेद तक 
रक्त क्रांतियां छोड़ जाती हैं गहरे घाव 
इतिहास बनते हैं बुद्ध और महावीर की 
करुणा के फैलाव में 
जो आती है अंतर की गहराई से 
परे  है जो देश-काल से !

सोमवार, दिसंबर 23

मन इक बगिया सा खिल जाता

मन इक बगिया सा खिल जाता



निज के मुखड़े पर धूल लगी
दर्पण को दोष दिए जाते
हिंसा जब मन में बसती हो
अवसर भी उसके मिल जाते

स्वीकार किया जिस क्षण सच को
झर जाता हर संशय उर से
मन इक बगिया सा खिल जाता
मिटते बादल भय के डर के

अपने वैभव को जला दिया
जिस क्षण हिंसा का साथ दिया
कटुता जो सही नहीं जाती
खुद में थी जग को दोष दिया

कितने कलुषित वे क्षण होंगे
जिनमें विद्वेष पला करता
भुला अस्मिता गौरव निज का
मानव हर बार छला जाता

गुरुवार, दिसंबर 19

आदमी





आदमी

सुलगता इक सवाल बन गया है आदमी 
चेतना ज्यों सो गयी 
शरम-हया खो गयी 
गली गली दानव हैं 
मनुष्यता रो गयी 
जूझता  इक बवाल बन गया है  आदमी 
आधी रात तक जगे 
भोर नींद में कटे 
देवों का ध्यान नहीं 
नियम वरत सब मिटे
उलझता इक ख्याल बन गया है आदमी 
हवा धुऑं धुआँ हुई 
सूरज भी छुप गया  
अपने ही हाथों से
 जहर ज्यों घोल दिया 
'नादान' इक  मिसाल बन गया है आदमी 
अपने ही देश में 
तोड़-फोड़ कर रहा 
सभ्यता की दौड़ में 
अनवरत पिछड़ रहा 
वाकई  इक जमाल बन गया है आदमी

रविवार, दिसंबर 8

हम और वह


हम और वह


दिये सबूत हजारों खुद के होने के 
लाख उपायों से हम नकारे जाते हैं


हजारों नेमतें लुटा रहा वह कब से 
फटे दामन यहाँ हम दिखाए जाते हैं 


युगों से कर रहा इशारों पर इशारे 
 बने अनजान अम्बर निहारे जाते हैं 


संग लिए जाता है बाँह पकड़ कोई 
हाथ बच्चे की तरह  छुड़ाए जाते हैं 


हर एक पल है नजरे इनायत हम पर 
 पीठ हम बेखुदी में दिखाए जाते हैं 


माना कि मद्धिम है उसकी आहट बहुत 
 सवारी विचारों की निकाले जाते हैं 


है हुकूमत उसी की जर्रे जर्रे पर 
 ‘मैं’ का परचम यूँही उड़ाए  जाते हैं 


  बता सकता था उससे मिलने का सबब 
उस फकीर से  किस्मत पढ़ाये जाते हैं 


सुना है खुद के पार जाकर मिलता है 
खड़े तट पे सी हम बुलाये जाते हैं 


झीना पर्दा  था दरम्यां, गिरा  देते 
ऊँची दीवारें भी चुनाये जाते हैं