गुरुवार, सितंबर 29

दिल का मामला

दिल का मामला

जी हाँ, यहाँ मामला दिल का है
और बहुत नाजुक है
इसका धड़कता रहना हमारी
सेहत के लिए कितना आवश्यक है
शीशे से भी नाजुक दिल की सलामती के लिए
कुछ बातों को निहायत जरूरी है मानना
ठीक नहीं दिल से हर बात को लगाना
या कि इस दिल को खून के आसूँ रुलाना
दिल देके मुकर जाना भी
नहीं मुनासिब इसकी सेहत की खातिर
दिल चुराना किसी का हो ही जाएगा जग जाहिर
दिल की गलियों में सफाई भी जरूरी है बेहद
क्या पता कब हो जाये दिल से कोई रुखसत
दिल को हल्का रखना ही है मुफीद
बतौर हकीम के दिल कभी भारी न करना
   हाथ रखकर अपने दिल से पूछना
कितनी बार रखना पड़ा है पत्थर दिल पर
फिर अगर फूटने लगें फफोले दिल के
तो दिल थाम कर बैठ जाना ही ठीक है
दिल खोलकर रखना किसी दिलबर के सामने
न कि लोटने देना सांप दिल पर
 घाव के सिवा क्या देगा भला यह दिल को
दिल बैठने लगे तो खोल देना दिल की गांठें
दिल लगाने से बाग़ बाग होता है दिल
टूटे हुए दिल का सम्भालने के सिवा क्या इलाज है
वह भी क्या दिल है जो रोया न गम पे औरों के
जो पसीज जाये वह नेकदिल इन्सान है
 हाल जानते रहना दिल का, इसकी सेहत का राज है
दिल में चुभता तो नहीं कोई काँटा
दिल को बड़ा करना, दिल में जगह देना
संग दिल को आएगा न दिल जीतना
दिल भर आये या हो उथल पुथल दिल में
तो जानना कि दिल है जिंदा
लड्डू फूटें या फूल खिलें दिल में बसंत छा ही जाता है
दिल में चोर हुआ तो दिल दहल जाता है
या हिल जाता है छोटी सी बात पर
दिलवाला जो हर मुसीबत में साथ देता है
 दिलदार है.. वही दिलेर है   
तो फिर दिल को दुरस्त रखने में क्यों भला अब देर है !                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       


बुधवार, सितंबर 28

तू है तो मैं हूँ

तू है तो मैं हूँ

‘मैं’ हूँ तो ‘तुझे’ होना ही पड़ेगा
‘तू’ से ही ‘मैं’ का वंश चलेगा
तुझे बिठाया हमने सातवें आसमान पर
अनगिनत गुणों के रंग दिए भर
तू जानीजान है कहते रहे यह भी
छिप-छिप कर करते रहे जुर्म भी
एक हाथ में आरती का थाल
और मन में भरे कितना मलाल
ख़ुशी के नाम पर दुःख बटोरते रहे
कभी किस्मत कभी दुनिया को कोसते रहे
अब जब कि यह राज खुला है
न कोई गम न कोई गिला है
तू ही हर सूं नजर आता है
दिल झूम के यह गाता है
तू जो है तो मैं हूँ !  

सोमवार, सितंबर 26

कोष भरे अनंत प्रीत के

कोष भरे अनंत प्रीत के

पलकों में जो बंद ख्वाब हैं
पर उनको लग जाने भी दो,
एक हास जो छुपा है भीतर
अधरों पर मुस्काने तो दो !

सारा जगत राह तकता है
तुमसे एक तुम्हीं हो सकते,
होंगे अनगिन तारे नभ पर
चमक नयन में तुम ही भरते !

कोष भरे अनंत प्रीत के
स्रोत छुपाये हो अंतर में,
बह जाने दो उर के मोती
भाव सरि के संग नजर से !

जहाँ पड़ेगी दृष्टि अनुपम
उपवन महकेंगे देवों के,
स्वयं होकर तृप्ति का सागर
कण-कण में निर्झर भावों के !

शुक्रवार, सितंबर 23

एक अरूप ज्योति बहती है

एक अरूप ज्योति बहती है

पीछे मुड़कर देखें जब तक
क्यों न आगे कदम बढ़ा लें,
चंद पलों में मिल जाती हैं
लहरें मन में नयी जगा लें !

इक-इक श्वास भरे है भीतर
कोष एक अनंत प्रेम का,
बंद किवाड़ों के पीछे हों
या फिर जग को मीत बना लें

खग, मृग, तितली, भंवरे पादप
स्रोत नेह का सदा लुटाते,
खोल हृदय का द्वार उन्हें भी
निज जीवन का अमी पिला लें !

एक अरूप ज्योति बहती है
एक सूत्र पिरोये सबको,
बनें फूल माला के हम भी
वैजन्ती फिर हार चढ़ा लें !


शुक्रवार, सितंबर 16

आसमान में तिरते बादल

आसमान में तिरते बादल

खुली हवा में शावक बनकर
दौड़ लगाते क्यों न जीयें,
एक बार फिर बन के बच्चे
वर्षा की बूंदों को पीयें !

नाव चलायें पानी में इक
इक्कड़-दुक्कड़ भी खेलें,
आसमान में तिरते बादल
देख-देख हर्षित हो लें !

तोड़ के सारे बंधन झूठे
नजर मिलाएं मुक्त गगन से,
मन को जिन पहरों ने बांधा
उन्हें जला दें प्रीत अगन से !

थोड़े से हों नियम-कायदे
निजता का हो वरण सदा,
मीत बना लें सारे जग को
सीखें शिशु से यही अदा !

गुरुवार, सितंबर 15

भोर नयी थामे जब अंगुली

भोर नयी थामे जब अंगुली

महक रहा कण-कण सृष्टि का
अनजानी सी गंध बहे है,
गुंजित गान सुरीले निशदिन
जाने किससे कौन कहे है !

पलकों में तंद्रा भर जाता
स्वप्न दिखा ताजा कर जाता,
भोर नयी थामे जब अंगुली
नये मार्ग हर रोज सुझाता !

रचे रास अदृश्य कन्हाई
तन का पोर-पोर हुलसाता,
झांक रहा नीले नयनों से
साँझी प्रीत उड़ेंले जाता !  

मंगलवार, अगस्त 23

छोटा सा जीवन यह सुंदर

छोटा सा जीवन यह सुंदर

थम कर पल दो पल बैठें हम
होने दें जो भी होता है,
रुकने का भी है आनंद
चलना तभी मजा देता है !

स्वयं ही चलती रहतीं श्वासें
जीवन भीतर धड़क रहा है,
जिसने सीखा है विश्राम
दौड़ लगाना व्यर्थ हुआ है !

छोटा सा जीवन यह सुंदर
अल्प जरूरत है इस दिल की,
काफी से भी ज्यादा पाया
कुदरत सदा बांटती रहती !


शुक्रवार, अगस्त 19

झर जाती हर दुःख की छाया

झर जाती हर दुःख की छाया

सभी स्वर्ग क्षण भंगुर होंगे
 नर्क सभी अनंत हैं होते,
दुःख में समय न कटता पल भर
सुख के क्षण बहते ही जाते !

सुख बंटना ही सदा चाहता
जो फैलता ही जाता है,
दुःख में भीतर सिकुड़े छाती
सुख विस्तीर्ण हुआ बढ़ता है !

आज सोचते हैं हम कल की
सदा व्यवस्था में ही बीते,
प्रेम जहाँ वहीं सुख पलता
 यह पल ही पर्याप्त उसे  !

नहीं सताती कल की चिंता
क्षण प्रेम का जिसने पाया,  
खो जाता अतीत, भावी सब
झर जाती हर दुःख की छाया !

सूना उर ! हम जग से भरते
खालीपन भीतर का अपना,
एक भाव शाश्वत भीतर
शेष सभी ज्यों भोर का सपना  !

प्रेम ही है वह द्वार जहाँ से
जीवन की कलियाँ खिलती हैं,
साझीदार मिले जब कोई
जीवन की धारा पलती है !



शुक्रवार, अगस्त 12

परिभाषाएं हम गढ़ते हैं


परिभाषाएं हम गढ़ते हैं

खुद से ही मिलते रहते हैं
जब भी हम बाहर जाते हैं !

दुनिया पल-पल बदल रही है
परिभाषाएं हम गढ़ते हैं !

रटते-रटते ब्रहम सूत्र भी
सिमटे-सिमटे हम रहते हैं !

खुले कान मेहर कुदरत की
अक्सर खुद को ही सुनते हैं !

स्वप्न निरंतर मन में उगते
जग पर उनको ही मढ़ते हैं !



शुक्रवार, अगस्त 5

डूबे हैं आकंठ

डूबे हैं आकंठ

धूसर काले मेघों से आवृत आकाश
निरंतर बरस रहा
जल की हजार धाराओं से
नहा रही हरी-भरी वसुंधरा
वृक्ष, घास, लतर, पादप
तृप्त हुए सभी डूबे हैं आकंठ
नीर के इस आवरण में ढका है दृष्टिपथ
गूँज रही है निरंतर गिरती बौछार की प्रतिध्वनि
निज नीड़ों में सिमटे चुप हैं पंछी
फिर भी बोल उठती है कभी कोकिल
अथवा कोई अन्य पांखी परों को झाड़ता हुआ
ले चुके हैं न जाने कितने कीट जल समाधि
अथवा तो धरा की गोद में उन्हें पनाह हो मिली
घास कुछ और हरी हो गयी है
नभ कुछ और काला
सावन के पहले से ही मौसम
 हुआ है सावन सा मतवाला
असम की हरियाली का यही तो राज है
ऋतुओं की रानी यहाँ वर्षा बेताज है



गुरुवार, जुलाई 28

नाम प्रेम का लेकर

नाम प्रेम का लेकर


उससे मिलकर जाना हमने
प्यार किसे कहते हैं,
नाम प्रेम का लेकर कितने,
 खेल चला करते हैं !

चले हुकूमत निशदिन उस पर,
 जिसको अपना माना,
मैं ही उसका रब हो जाऊं
और न कोई ठिकाना !

नहीं प्रेम में कोई बंधन
मुक्त गगन के जैसा,
सब पर सहज मेह सा बरसे
मुक्त पवन के जैसा !  

मंगलवार, जुलाई 26

ढाई आखर भी पढ़ सकता

ढाई आखर भी पढ़ सकता


उसका होना ही काफी है
शेष सभी कुछ सहज घट रहा,
जितना जिसको भाए ले ले
दिवस रात्रि वह सहज बंट रहा !

स्वर्ण रश्मियाँ बिछी हुई हैं
इन्द्रधनुष कोई गढ़ सकता,
मदिर चन्द्रिमा भी बिखरी है
ढाई आखर भी पढ़ सकता !

बहा जा रहा अमृत सा जल
अंतर में सावन को भर ले,
उड़ा जा रहा पवन गतिमय
चाहे तो हर व्याधि हर ले !

देना जब से भूले हैं हम
लेने की भी रीत छोड़ दी,
अपनी प्रतिमा की खातिर ही
मर्यादा हर एक तोड़ दी !

क्यों न हम भी उसके जैसे
होकर भी ना कुछ हो जाएँ,
एक हुए फिर इस सृष्टि से
बिखरें, बहें और मिट जाएँ !


शुक्रवार, जुलाई 22

पावन मौन यहाँ छाया है

पावन मौन यहाँ छाया है


सहज खड़े पत्थर पहाड़ सब
जंगल अपनी धुन में गाते,
पावन मौन यहाँ छाया है
झरने यूँ ही बहते जाते !

वृक्ष न कहते फिरते खग से
बन जाओ तुम साधन मेरे,  
मानव ही केवल चेतन को
जड़ की तरह देखता जग में !

नहीं आग्रह सूरज करता
खिलें सुमन क्योंकि वह आया,  
पंछी गायें ही सुबहों को
कोई न ऐसा शोर मचाया  !

सहज घटा करता है सब कुछ
तृप्त हुए कर रहे मौज में,
एक अनाम प्रेम बहता है
सुख सृजते सुख बांटा करते !

स्वयं ही मिटता जाता मानव
दूजों को आहत करने में,
राज जानती है प्रकृति यह
सदा पनपती निज आनंद में !

स्वयं का हित जो कर न पाया
कैसे हित औरों का साधे,
भीतर तक जो पगा प्रेम से
वही बनेगा श्याम की राधे !

कैसी भूल में उलझा है मन
स्वयं से पृथक अन्य को जाने
देता दुःख वह तभी बींधता
अपने ही दामन में कांटे !

उंगली भी यदि कभी उठी तो
चोट स्वयं को ही लगती है,
एक ही सत्ता व्याप रही है
एक अजब लीला चलती है !

सहज हुआ जो यूँ जीएगा
जैसे फूल खिला करते हैं,
जैसे मीन तैरती जल में
जैसे अनिल बहा करते हैं !

श्रम शून्य हो जाये जब मन
सायास ही सब घटता हो,
जाने तभी ध्यान उतरा है
अंतर में प्रेम बढ़ता हो !

जिसे हराया हारे उससे
राज यह जिसने जान लिया है,
सभी मीत जो मीत स्वयं का
उसने ऐसा मान लिया है !