मंगलवार, अप्रैल 25

एक लघु कहानी

एक लघु कहानी


कल रात्रि पुनः स्वप्न में उसे वही स्वर्ण कंगन दिखा, साथ ही दिखी मारिया की उदास सूरत. वह झटके से उठकर बैठ गयी. एक बार उसने ईश्वर से प्रार्थना की और मन ही मन मारिया से भी क्षमा मांगी,  “नहीं, उसे उस पर जरा भी संदेह नहीं है कि उसका कीमती आभूषण उसने चुराया है.” उसे याद आया, हफ्ता भर पहले की ही तो बात है. दो दिनों के एक कोर्स के लिए उसे बाहर जाना था. सुबह-सुबह योगासन के समय उसने दोनों कंगन उतारकर कालीन पर रख दिए थे, जिन्हें रोज ही उठते समय वह पहन लिया करती थी. उस दिन न जाने किस जल्दी में वह उन्हें उठाना भूल गयी. दूसरे दिन कोर्स समाप्त होने पर उन्हें एक भोज में भी सम्मिलित होना था, जिसमें पहनने के लिए पोशाक तथा मैचिंग आभूषण वह पहले ही रख चुकी थी. सम्भवतः यही कारण रहा होगा कि उसे कंगनों का ख्याल नहीं आया और बहुत बाद में जब याद आया तो उसने बेटी को से कहा, वह उन्हें कार्पेट से उठाकर सम्भालकर रख दे. दो दिन बाद घर लौटी तो उसने इस बारे में पूछा, बेटी ने कहा उसे कालीन पर वे नहीं मिले. पतिदेव ने बारीकी से हर तरफ खोज शुरू की तो एक कंगन मिल गया, पर दूसरा नदारद था. अब उसका माथा ठनका, एक कंगन है तो दूसरा कहाँ गया. एक बाहर है तो दूसरा आलमारी या गहनों के डब्बे में कैसे जा सकता है ? यह सोचकर सारे कमरे में खोज जारी रखी पर कंगन को नहीं मिलना था, नहीं मिला.

उस दिन घर में मारिया आई थी. जो पूरे घर की सफाई करती थी. मन में एक संदेह उठा शायद उसने पड़ा देखा हो और..आज तक कभी ऐसा हुआ तो नहीं था. बेटी ने कहा भी, “इस तरह आप किसी पर इल्जाम कैसे लगा सकती हैं ?” पतिदेव ने कहा, “कितने का रहा होगा, क्यों इतना परेशान होती हो”, पर उसे लग रहा था, कितना बड़ा नुकसान हो गया, वह भी घर बैठे. पढ़ाई में भी उसका मन नहीं लग रहा था. इसी मनःस्थिति में उसने उस दफ्तर में फोन कर दिया जहाँ से मारिया को काम पर भेजा जाता था. उसने उन्हें शांत स्वरों में कहा, घर से एक कीमती वस्तु खो गयी है, उन्हें मारिया पर जरा भी संदेह नहीं है, पर वे ही बताएं कि क्या करना चाहिए. वहाँ से संदेश आया, वे मारिया को भेज रहे हैं, वह तलाशने में मदद करेगी. पर कोई फायदा नहीं हुआ. मारिया का उदास चेहरा और परेशान करने लगा. ऐसा लगा जैसे अपना दुःख उसके काँधों पर डालकर दुःख को दुगना कर लिया है. इसी तरह दस दिन बीत गये, एकाएक ख्याल आया, क्यों न अपने शेष आभूषण भी सहेज ले, सब सही सलामत तो हैं. जैसे ही वह सूटकेस खोला जिसमें फाइलों के नीचे आभूषण का डब्बा था, एक फ़ाइल के ऊपर ही पड़ा था वह कंगन.. उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं. यह कोई चमत्कार ही लग रहा था. शायद उस दिन अनजाने में उसने सूटकेस खोलकर उन्हें रखना चाहा होगा, जल्दी में एक नीचे गिर गया और एक भीतर...दिल से बोझ उतर गया, परमात्मा के प्रति धन्यवाद का भाव भी जगा. मरिया का ध्यान आया, वह यह समाचार सुनकर कितनी खुश होगी.

मारिया आज सोचकर आयी थी कि यदि कंगन नहीं मिला तो वह काम छोड़ देगी. पिछले दस दिनों से कोई दिन ऐसा नहीं गया था जिस दिन उसने कंगन के मिल जाने के लिए खुदा से प्रार्थना न की हो. वह नियमित चर्च जाती है और बचपन से ही अल्लाह के रास्ते पर चलकर अपने ईमान पर टिकी रही है. कितने ही बड़े-बड़े घरों में उसने काम किया है जहाँ कीमती सामान रखकर मालकिन स्नान करने चली जाती थीं. जहाँ आभूषण यूँ ही पड़े रहते थे पर कभी उसके मन में ख्याल भी नहीं आया, फिर इस घर में भी वह कई महीनों से आ रही है. छोटा सा हँसमुख परिवार है, मालकिन किसी परीक्षा के लिए पढ़ाई कर रही हैं. सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन उनका एक कंगन खो गया, ‘खोना’ और ‘चोरी होना’ में कितना अंतर है, और जब उसके एजेंट ने उससे यहाँ आकर खोजने के लिए कहा तो वह ख़ुशी-ख़ुशी आ गयी थी. पर यहाँ आकर घर वालों के व्यवहार से लगा कि उन्हें उस पर संदेह है और एक दिन जब जब उसने अतिरिक्त काम के लिए मना कर दिया, क्योंकि उसका ड्राइवर बाहर आ गया था, तो साहब का पारा चढ़ गया. पहले भी उसने समय न होने पर काम के लिए मना किया था पर ऐसा कभी नहीं हुआ था. घर आकर वह फूट-फूट कर रोई, क्या उन जैसों का कोई सम्मान नहीं होता, कहीं काम करने का अर्थ यह तो नहीं कि उन पर इतना भी विश्वास न किया जा सके. उसने निश्चय कर लिया अगली बार उन्हें  साफ-साफ कह देगी कि अब यहाँ काम नहीं कर सकती.


उसके लिए आज ख़ुशी का दिन था. उसे लग रहा था मारिया भी यह खबर सुनकर खुश हो जाएगी और वह सब कुछ पल में भुला देगी, पर ऐसा नहीं हुआ. विषाद के जो बीज उन्होंने दस दिनों में बोये थे उसकी फसल भी उन्हें ही काटनी थी. मारिया ने जैसे ही ये शब्द सुने, “मिल गया”..उसकी आँखों से आंसू झरने लगे और कुछ ही देर में वह फूट-फूट कर रोने लगी. वह उसे देखती रही फिर गले से लगा लिया. क्षमा मांगी पर उसके आंसूओं का जैसे बाँध ही टूट गया था. वह कुछ देर बाद शांत हुई तो उसका खुद का मन अब उदासी की छाया से घिर गया था. पिछली बार जब वह आई थी तो उसने पूछा था, “आपको मुझपर संदेह है ?” तो उसने कहा था, “नहीं, पर मैं उदास हूँ” मुझे दुःख है कि मेरा इतना कीमती सामान खो गया है.” उस दिन भी उसे दुःख हुआ होगा पर तब उसके पास यह देखने की फुर्सत कहाँ थी. आज उसका चेहरा देखकर खुद पर क्रोध आ रहा है, इसकी जिम्मेदार वह ही तो है. उसकी लापरवाही की सजा इसे व्यर्थ ही भोगनी पड़ी, उसके लोभ की सजा भी, स्वर्ण आभूषणों के प्रति उसकी आसक्ति की सजा भी. कितने आभूषण पड़े हैं जिन्हें वर्ष भर में एक बार भी पहनने का अवसर नहीं आता. परमात्मा का दिया सब कुछ है. यदि वास्तव में ही कोई वस्तु गुम हो जाये तो उसके लिए मन के चैन को खोना क्या उचित है ? और कितनी सरलता से वे घरों में काम करने वालों पर संदेह करने लगते हैं, उन्हें सम्मान न दें पर अपमान करने का क्या हक है उन्हें ? उसने एक बार फिर मारिया को गले से लगाया और भरे गले से क्षमा मांगी. 

सोमवार, अप्रैल 24

चलों संवारें वसुधा मिलकर



चलों संवारें वसुधा मिलकर 

दुनिया युद्ध की भाषा बोले 
प्रीत सिखाने आया भारत, 
टुकड़ों में जो बांट हँस रहे
उनको याद दिलाता भारत !

एक विश्व है एक ही धरती 
एक खुदा है एक ही मानव,
कहीं रक्त रंजित मानवता 
कहीं भूख का डसता दानव 

विश्व आज दोराहे पर है 
द्वेष, वैर की आग सुलगती,
भुला दिए संदेश प्रेम के 
पीड़ित आकुल धरा  झुलसती 

इसी दौर में पुनः प्रेम के
पुष्प खिलाने आया भारत, 
निज गौरव का मान जिसे है 
वही दिलाने आया भारत !

ध्वजा शांति की लहरानी है 
विश्व ताकता इसकी ओर,
एक एक भारतवासी को
लानी है सुखमयी वह भोर !

शुक्रवार, अप्रैल 21

नई कोंपलें जो फूटी हैं


नई कोंपलें जो फूटी हैं

कोकिल के स्वर सहज उठ रहे
जाने किस मस्ती में आलम,
मंद, सुगन्धित पवन डोलती
आने वाला किसका बालम !

गुपचुप-गुपचुप बात चल रही
कुसुमों ने कुछ रंग उड़ेले,
स्वर्ग कहाता था जो भू पर
उस भूमि पर नफरत डोले ?

कैसा विषम काल आया है
लहू बहाते हैं अपनों का,
जिनसे अम्बर छू सकते थे
कत्ल कर रहे उन स्वप्नों का !

महादेव की भूमि रंजित
कब तक यह अन्याय सहेगी,
बंद करें यह राग द्वेष का
सहज नेह की धार बहेगी !

भूल हो चुकी इतिहासों में
कब तक सजा मिलेगी उसकी,
नई कोंपलें जो फूटी हैं
क्यों बंद हों राहें उनकी !

काश्मीर है अपना गौरव
हर भारतवासी मिल गाये,
एक बार फिर झेलम झूमे
केसर बाग़ हँसे, मुस्काए !


बुधवार, अप्रैल 19

अनजाने गह्वर भीतर हैं

अनजाने गह्वर भीतर हैं

पल-पल बदल रहा है जीवन
क्षण-क्षण सरक रही हैं श्वासें,
सृष्टि चक्र अविरत चलता है
किन्तु न हम ये राज भुला दें !

अनजाने गह्वर भीतर हैं
नहीं उजास हुआ है जिनमें,
कौन कहाँ से कब प्रकटेगा
भनक नहीं जिनकी ख्वाबों में !

फसल काटनी स्वयं को ही है
जितने बीज गिराए मग में,
अनजाने या जानबूझकर
कितने तीर चलाये हमने !

तीरों की शैय्या पर लेटे
भीष्म कृष्ण की राह ताकते,
सदा साथ ही रहता आया
स्वयं ही उससे दूर भागते !

सोमवार, अप्रैल 17

वरदानों को भूल गया मन



वरदानों को भूल गया मन

रिश्ता जोड़ रहा है कब से
 पल-पल दे सौगातें  जीवन,
निज पीड़ा में खोया पागल 
वरदानों को भूल गया मन !

ठगता आया है खुद को ही 
उसी राह पर कदम बढ़ाता,
शूल चुभा था, दर्द सहा था 
गीत वही गम के दोहराता !

एक चक्र में डोले जैसे 
बिंधने की पल-पल तैयारी,
सुख का बादल रहा बरसता 
दुःख की चादरिया है डारी !

कृष्ण हँसे, बुद्ध मुस्काए
शंकर मूढ़ मति कह गाये,
मन मतवाला निज धुन में ही 
अपनी धूनी आप रमाये !

बड़ी अजब है ताकत इसकी 
बीज प्रेम का, फसल वैर की,
नर्क-स्वर्ग इक साथ ही गढ़ता 
 अपनों संग भी बात गैर सी !





सोमवार, अप्रैल 3

एक रहस्य

एक रहस्य

थम जाती है कलम
बंद हो जाते हैं अधर
ठहर जाती हैं श्वासें भी पल भर को
लिखते हुए नाम भी... उस अनाम का
नजर भर कोई देख ले आकाश को
या छू ले घास की नोक पर
अटकी हुई ओस की बूंद
झलक मिल जाती है जिसकी
किसी फूल पर बैठी तितली के पंखों में
या गोधूलि की बेला में घर लौटते
पंछियों की कतारों से आते सामूहिक गान में
कोई करे भी तो क्या करे
इस अखंड आयोजन को देखकर
ठगा सा रह जाता है मन का हिरण
इधर-उधर कुलांचे मारना भूल
निहारता है अदृश्य से आती स्वर्ण रश्मियों को
जो रचने लगती हैं नित नये रूप
किताबों में नहीं मिलता जवाब
एक रहस्य बना ही रहता है..

मंगलवार, मार्च 28

मिट जाने को जो तत्पर है


मिट जाने को जो तत्पर है

मरना जिसने सीख लिया है
उसको ही है हक जीने का,
साँझ ढले जो मुरझाये, दे
प्रातः उसे अवसर खिलने का !

मिट जाने को जो तत्पर है
वही बना रहता इस जग में,
ठोकर से जो न घबराए
बना रहेगा जीवन मग में !

सच की पूजा करने वाले
नहीं झूठ से बच सकते हैं,
जो सुन्दरता को ही चाहें
वही कुरूपता लख सकते हैं !

बोल-अबोल, मित्र-शत्रु भी
है पहलू इक ही सिक्के का,
सदा डोलता रहता मानव
 बना हुआ एक दोलक सा !




शनिवार, मार्च 25

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश (अंतिम भाग )

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश (अंतिम भाग )



गेस्टहाउस के कर्मचारियों ने जो वहाँ पिछले कुछ वर्षों से रह रहे हैं कुछ रोचक बातें बतायीं. मिजोरम में संयुक्त परिवार होते हैं. परिवार के बड़े पुत्र को जायदाद नहीं मिलती, बल्कि सबसे छोटे पुत्र को परिवार का उत्तराधिकारी बनाया जाता है. विवाह और तलाक के मामलों में भी चर्च का कानून ही चलता है. माता-पिता के न रहने पर अथवा असमर्थ होने पर बच्चों की देखभाल का जिम्मा भी चर्च का होता है. क्रिसमस के अलावा मुख्य उत्सव छरपार कुट मनाया जाता है, उत्सव के लिए मिजो शब्द कुट है. यहाँ कोई पिक्चर हॉल नहीं है. हिंदी फ़िल्में यहाँ नहीं दिखाई जातीं. टीवी पर आने वाले धारावाहिक वे मिजो भाषा में डब करके देखते हैं. यहाँ की साक्षरता दर केरल के बाद दूसरे नम्बर पर है. मिजो भाषा की कोई लिपि नहीं है, रोमन भाषा को ही इन्होंने अपनाया है. यहाँ की यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट की आवश्यकता होती है. यह छात्रों का एक संगठन मिजो यूथ असोसिअशन बहुत शक्तिशाली है. यह समाज हित के कार्य भी करता है तथा दुर्घटना आदि होने पर आपसी सुलह भी कराता है. यहाँ किसी के घर में प्रवेश करने पर सबसे पहले रसोईघर में प्रवेश होता है, यहीं मेहमानों को बैठाया जाता है. पीने का पानी यहाँ खरीदना पड़ता है. अन्य कामों के लिए ये लोग वर्षा ऋतु में पानी का संग्रह कर लेते हैं, हर घर के नीचे पानी का टैंक होता है. इसी तरह सोलर पावर का भी लगभग सभी लोग इस्तेमाल करते हैं.




सुबह ग्यारह बजे ही हमने वापसी की यात्रा आरम्भ की, एक दिन कोलकाता में रुकना पड़ा क्योंकि उसी दिन की असम तक की कोई उड़ान नहीं थी. अगले दिन सुबह की उड़ान से हम मिजोरम की मधुर स्मृतियों को मन में संजोये हुए वापस घर आ गये. 

शुक्रवार, मार्च 24

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश (तीसरा भाग )

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश (तीसरा भाग )

१७ मार्च २०१७-लुंगलेई
आज भी सुबह मुर्गे की आवाज आने से पहले ही नींद खुल गयी. आज की सुबह भी पहले से बिलकुल अलग थी. कमरे की विशाल खिड़की से जिस पर लगे शीशे से बहर का दृश्य स्पष्ट दिखाई देता है, पर्दे हटा दिए. अभी बाहर अँधेरा था. आकाश पर तारे नजर आ रहे थे. धीरे-धीरे हल्की लालिमा छाने लगी और गगन का रंग सलेटी होने लगा, फिर नीला और पांच बजे के बाद सूर्योदय होने से पहले आकाश गुलाबी हो गया. साढ़े पांच बजे चर्च की घंटी बजने लगी और लाल गेंद सा सूरज का गोला पर्वतों के पीछे से नजर आने लगा. इसके बाद कुछ दूर कच्चे रास्ते पर नीचे उतर कर हम घाटियों में तिरते बादलों को देखने गये. दूर-दूर तक श्वेत रुई के से बादलों को पर्वतों की चोटियों पर ठहरे हुए देखा. नहाधोकर नाश्ता करके साढ़े सात बजे हमने वापसी की यात्रा आरम्भ की, दोपहर एक बजे वापस आइजोल पहुंच गये. रास्ता सुंदर दृश्यों से भरा था, हरे-भरे जंगल, बेंत के झुरमुट तथा छोटे-छोटे गाँव था कस्बे. मुश्किल से एकाध जगह ही हमें खेत दिखे. इस इलाके में झूम खेती की जाती है. मार्ग में पड़ने वाला वानतांग नामक झरना देखने भी हम गये. काले पत्थरों को काटता हुआ काफी ऊँचाई से बहता हुआ अपनी तरह का एकमात्र जलप्रपात !

मिजोरम में यह हमारी अंतिम रात्रि है. दोपहर का भोजन करके हम शहर के कुछ अन्य दर्शनीय स्थल देखने गये. ताजमहल नामक एक स्मारक जो एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की स्मृति में बनवाया था, जिसमें उसके वस्त्र तथा अन्य सामान भी सहेज कर रखे हैं, अब इस स्मारक में उसके पूरे परिवार को दफनाया गया है. इसके बाद आइजोल की सबसे ऊंची पहाड़ी पर बना थियोलोजिकल कालेज देखने गये. जहाँ से पूरा शहर दिखाई देता है. 

इसके बाद हमारा पड़ाव था निर्माणाधीन सोलोमन टेम्पल, जो पिछले बीस वर्षों से बन रहा है और अभी भी इसके पूरा होने में काफी समय लगेगा. कल दोपहर हमें वापस जाना है.

१८ मार्च २०१७ - आइजोल
कल रात्रि लगभग एक बजे से लगतार समूह गान की आवाजें हमारे कानों में सुनाई दे रही हैं. खिड़की से झांककर देखा तो पिछवाड़े की एक इमारत में लगभग पचास-साथ लोग बेंचों पर बैठे हैं और एक ड्रम की बीट के साथ लय बद्ध गा रहे हैं, लगातार यह गाने का कार्यक्रम चल रहा है. गेस्ट हॉउस के रसोइये ने बताया, कल शाम को ही लाऊडस्पीकर पर एक घोषणा की गयी थी कि कोई व्यक्ति देह त्याग गया है. उसी के शोक में यह गायन चल रहा है. दोपहर बारह बजे के बाद मृतक को ले जायेंगे.

सुबह हम गेस्ट हॉउस के पीछे वाली सड़क पर लगने वाले स्थानीय शनि बाजार को देखने गये, बीसियों दुकानें लगी थीं, ज्यादातर महिलाएं सड़क के दोनों ओर दुकानें लगा रही थीं, दस प्रतिशत ही पुरुष रहे होंगे. कपड़े, बरतन, सजावट की वस्तुएं, खाद्य पदार्थ यानि हर तरह की वस्तुएं वहाँ  बिक रही थीं, उस समय सुबह के साढ़े पांच बजे थे, अर्थात वे लोग अवश्य ही तीन बजे उठ गये होंगे. आज आकाश में बादल हैं, शायद शाम तक वर्षा हो, हवा में एक अजीब तरह की गंध है, यहाँ के अस्सी प्रतिशत लोग खेती से जुड़े कार्यों में रत हैं. साधन न होने के कारण खेती के लिए उपलब्ध जमीन के मात्र छह प्रतिशत पर ही खेती की जा रही है. कल रात को किसी पशु के रोने की आवाज आ रही थी, जिसे सुनकर बचपन में मेहतरों के मोहल्ले से आती करूण पुकार स्मरण हो आयी. काश इन्हें भी शाकाहारी भोजन व्यवस्था के बारे में जानकारी देने वाला कोई संत मिले. चर्च में इनकी आस्था है पर वहाँ न नशे के खिलाफ कुछ कहा जाता है न मांसाहार के ही. डेढ़ वर्ष पहले तक यह शुष्क राज्य था, पर अब सरकारी दुकानें हैं तथा हर व्यक्ति को कार्ड के आधार पर नियत मात्रा में मादक पेय दिया जाता है.
क्रमशः

गुरुवार, मार्च 23

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश ( दूसरा भाग )

मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश ( दूसरा भाग )

सुबह पांच बजे से भी पहले मुर्गे की बांग सुनकर हम उठे गये. सूर्योदय होने को था, कुछ तस्वीरें उतारीं. पल-पल आकाश के बदलते हुए रंग यहाँ के हर सूर्योदय को एक आश्चर्यजनक घटना में बदल देते हैं. रंगों की अनोखी छटा दिखाई देती है. गेस्ट हॉउस के रसोइये ने आलू परांठों का स्वादिष्ट नाश्ता परोसा. सवा आठ बजे हम आइजोल से, जो मिजोरम की राजधानी है, लुंगलेई के लिए रवाना हुए. लगभग पांच घंटों तक सुंदर पहाड़ी घुमावदार रास्तों पर चलते हुए दोपहर सवा एक बजे गन्तव्य पर पहुंच गये. सड़क अपेक्षाकृत बहुत अच्छी थी, पता चला यह सड़क विश्व बैंक के सहयोग से बनी है, मार्ग में एक दो स्थानों पर भूमि रिसाव के कारण सड़क खराब हो गयी है, जिसके दूसरी तरफ मीलों गहरी खाई होने के कारण बड़ी सावधानी से चालक वाहन चलाते हैं. मार्ग में एक जगह चाय के लिए विश्राम गृह में रुके, मिजोरम के हर जिले में एक से अधिक सरकारी यात्रा निवास हैं. लुंगलेई का यह टूरिस्ट लॉज भी काफी बड़ा व साफ-सुथरा है. बालकनी से पर्वतों की मनहर मालाएं दिखती हैं. सामने ही मिजोरम के बैप्टिस्ट चर्च की सुंदर भूरे रंग की विशाल इमारत है. बाहर निकलते ही एक बड़ा अहाता है, जिसमें एक वाच टावर बना है. जिसपर चढ़कर हमने सूर्यास्त का दर्शन किया, तथा रंगीन बादलों और आसमान की कुछ अद्भुत तस्वीरें उतारीं. रात्रि में यहाँ का आकाश चमकीले तारों से भर जाता है और धरती भी चमकदार रोशनियों से सज जाती है. हजारों की संख्या में पास-पास घर बने हैं, जो पहाड़ियों को पूरा ढक लेते हैं और शाम होते ही चमकने लगते हैं. यहाँ की हवा में एक ताजगी है.  


मिजोरम के लोगों के रहन-सहन तथा रीतिरिवाजों के बारे में कई रोचक जानकारियां मिली हैं. ये लोग सुबह जल्दी उठते हैं, चार बजे से भी पहले तथा सुबह छह बजे ही दिन का भोजन कर लेते हैं. इसके बाद काम पर निकल जाते हैं तथा दोपहर को भोजन नहीं करते. शाम का भोजन छह बजे ही कर लेते हैं, इसलिए यहाँ बाजार जल्दी बंद हो जाते हैं. कुछ देर पहले हम बाजार गये लेकिन ज्यादातर दुकानें बंद हो चुकी थीं. यहाँ भोजन में ज्यादातर चावल, मांस तथा उबली हुई सब्जियां ही खायी जाती हैं. मसाले भी नहीं के बराबर. यहाँ बहुविवाह प्रथा प्रचलित है तथा स्त्री या पुरुष दोनों को इसका समान अधिकार है. महिलाएं यहाँ सभी प्रकार के काम करती हैं, बचपन से ही उनके साथ कोई भेद भाव नहीं किया जाता. उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का पूरा अवसर मिलता है. तलाक लेना यहाँ बहुत आसान है. किसी भी तरह का विवाद लोग आपसी बातचीत से सुलझा लेते हैं. पुलिस तथा अदालत तक मामला पहुंचने की नौबत नहीं आती. सडकों पर ड्राइवर एक दूसरे को रास्ता देते हैं तथा अपने वाहन को पीछे ले जाने में जरा भी नहीं हिचकते.

१६ मार्च २०१७ लुंगलेई

लुंगलेई में हमारी पहली सुबह है. पंछियों की आवाजों ने हमें जगा दिया, कमरे की खिड़की से परदा हटाया तो सामने पर्वतमालाएं थीं और आकाश पर गुलाबी बादल. जैसे सामने कोई चित्रकार अदृश्य हाथों से अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा हो. सामने वाले पहाड़ हरे वृक्षों से लदे थे, उसके पीछे काले पर्वत जिनके वृक्षों की आकृतियाँ खो गयी थीं पर आकार फिर भी नजर आ रहे थे. तीसरी श्रेणी, जहाँ ऊँची-नीची सी वृक्षों की चोटियाँ मात्र दिख रही थीं, और उसके पीछे स्वप्निल से पहाड़ जो धुंध और सलेटी कोहरे में लिपटे थे. एक के पीछे एक तीन-चार पर्वत श्रेणियां और ऊपर गहरा नीला आकाश और उस पर सुनहरे चमकते बादल, जो गगन के राजा के आने का संदेश दे रहे थे. तभी चर्च से घंटियों का स्वर आने लगा और पूरा वातावरण एक आध्यात्मिक रंग में सराबोर कर गया. कुछ देर बाद हम प्रातः भ्रमण के लिए निकले, हवा ठंडी थी, बाहर का तापमान आठ डिग्री था. निकट ही बादलों को पर्वतों की श्रंखलाओं पर सिमटते हुए देखा, एक अद्भुत दृश्य था.  


अब शाम के पांच बजे हैं. हम आज जल्दी जाकर बाजार से लौट आये हैं. सुबह पतिदेव जब अपने काम के सिलसिले में चले गये तो मैंने कुछ देर कमरे में रखी बाइबिल पढ़ी, नया नियम नाम से छोटी सी हिंदी में लिखी पुस्तक, जो कई स्थलों पर बहुत रोचक और उत्साहवर्धक लगी, परमात्मा का राज्य हमारे भीतर है, हम इस बात को भुला देते हैं और व्यर्थ ही परेशान होते हैं. कल हमें वापस आइजोल जाना है और परसों कोलकाता, तथा उसके अगले दिन असम. 
क्रमशः

बुधवार, मार्च 22

ओ रे मन !


ओ रे मन !

किस उलझन में खोये रहते 
किस पीड़ा को पल-पल सहते,
सुनो गीत जो नभचर  गाते
निशदिन  मधुर राग बहता है !

किस शून्य को भरे हो भीतर 
कण-कण में अमृत बसता है,
सपनों ने दिन-रात जलाया 
खुली आंख ही वह मिलता है !

एक विशाल वितान सजाया  
रंगमंच पर नट अनेक हैं,
सुख-दुःख के झीने पर्दे में 
सदा एकरस कुछ रिसता  है !

पाँव रुके उर की जड़ता से 
चाह अधीर करे धड़कन को,
दोनों ही के पार गया जो 
हरसिंगार चुना करता है !


मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश


मिजोरम - एक अनोखा प्रदेश
१४ मार्च २०१७-आइजोल 

सुबह पौने छह बजे हम दुलियाजान-असम से रवाना हुए थे. सवा आठ बजे फ्लाईट डिब्रूगढ़ के मोहनबारी हवाईअड्डे से चली और पौने दस बजे कोलकाता पहुंची. जहाँ तीन घंटे प्रतीक्षा करने के बाद दोपहर एक बजे स्टारलाइंस-एयर इंडिया के विमान ने आइजोल के लिए उड़ान भरी. हवाईअड्डे पर कई मीजो लड़के-लडकियाँ थे, सभी काफी प्रसन्न, जरा उनसे नजरें मिलाओ तो मुस्कुराने को तैयार ! छोटी सी फ्लाईट थी लगभग पचास मिनट की, ऊपर से सैकड़ों मीलों तक फैली हरियाली से ढकी पर्वतों की श्रृंखलायें दिख रही थीं, एक के बाद एक पहाड़ों की चोटियाँ, घाटियाँ नहीं के बराबर. दोपहर दो बजे हम मिजोरम के लुंगपेई हवाईअड्डे पर पहुंचे, जहाँ कई सुंदर छोटे-छोटे बगीचे फूलों से भरे थे. 

बाहर निकले तो हर तरफ वृक्षों की कतारें. शहर से काफी दूर है हवाईअड्डा, लगभग सवा घंटा पहाड़ों के सान्निध्य में छोटी सी पतली सड़क पर यात्रा करने के बाद हम कम्पनी के गेस्ट हॉउस पहुंचे. रास्ते में बांसों के झुरमुट और फूल झाड़ू के पेड़ बहुतायत में दिखे. दो तीन जगह पिकनिक स्पॉट जाने के मार्ग बताते बोर्ड दिखे. यह हल्के हरे रंग से रंगी चार मंजिला इमारत है. स्वादिष्ट नाश्ता करके हम शहर घूमने निकले. पूरा शहर या कहें पूरा प्रदेश ही पहाड़ियों पर बसा है, सडकें ऊंची-नीची हैं, कहीं-कहीं तो खड़ी चढ़ाई है, लेकिन यहाँ के ड्राइवर इतने अभ्यस्त हैं कि ऐसी सडकों पर आराम से वाहन चला लेते हैं. हमने एक पारंपरिक मिजो ड्रेस खरीदी. यहाँ के लोग कुत्तों से बहुत प्रेम करते है. एक महिला को देखा स्कूटर पर एक कुत्ते को शाल में लपेटे ले जा रही थी, जैसे कोई अपने बच्चे को ले जाता है. याद आया, एक मिजो लडकी यात्रा में हमारे निकट बैठी थी, जो हैदराबाद में ब्यूटी पार्लर में काम करती है, अब छुट्टियों में घर जा रही थी. उसने बताया था, मिजोरम में कोई स्ट्रीट डॉग नहीं होता. सडकों पर महिलाएं और बच्चे ज्यादा नजर आ रहे थे, सभी प्रसन्न मुद्रा में.

१५ मार्च २०१७ – आइजोल

मिजोरम की हमारी यह पहली यात्रा है. इस प्रदेश के बारे में हम कितना कम जानते हैं, १९७२ में केंद्र शासित प्रदेश बनने से पूर्व यह असम का एक जिला था, फरवरी १९८७ में लंबे हिंसक संघर्ष के बाद भारत सरकार व मिज़ो नेशनल फ्रंट के मध्य समझौता होने पर यह भारत का तेइसवां राज्य घोषित किया गया. इसके पूर्व और दक्षिण में म्यांमार है तथा पश्चिम में बांग्लादेश. मिजोरम से उत्तर-पूर्व भारत के तीन राज्यों असम, मणिपुर तथा त्रिपुरा की सीमाएं भी मिलती हैं. प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर यह प्रदेश विभिन्न प्रजातियों के प्राणियों तथा वनस्पतियों से सम्पन्न हैं. इसी अनजाने प्रदेश के आठ जिलों में से एक लुंगलेई जिले में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता का सर्वे करने के लिए भारत सरकार की और से विभिन्न सरकारी तेल कम्पनियों के अधिकारियों को नियुक्त किया गया है. इसी कारण मुझे भी पतिदेव के साथ यहाँ आने का अवसर मिल गया है. मिजोरम का अर्थ है पहाड़ी प्रदेश के लोगों की भूमि ! यह प्रदेश जैसे भारत की मुख्य भूमि से बिलकुल अलग-थलग है. माना जाता है कि यहाँ के निवासी दक्षिण-पूर्व एशिया से सोलहवीं और अठाहरवीं शताब्दी में आये थे, बर्मा की संस्कृति का इन पर काफी प्रभाव है, देखने में भी यह उन जैसे लगते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी में यहाँ ब्रिटिश मिशनरियों का प्रभाव फ़ैल गया. लगभग पचासी प्रतिशत लोग ईसाई धर्म के अनुयायी हैं भारतीय संसद में प्रतिनिधित्व के लिए लोकसभा में यहाँ से केवल एक सीट है. विधान सभा में चालीस सदस्य हैं. 
क्रमशः

रविवार, मार्च 12

होली है !


होली है !

होली जगाती है 
तमस की नींद से 
जड़ता की कैद से 

होली जलाती है 
आपस के वैर को
द्वेष के जहर को 

होली बताती है 
प्रीत की रीत को 
सत्य की जीत को

होली सिखाती है 
रंगों की भाषा से  
जीवन की आशा से 

होली पढ़ाती है 
कथा प्रहलाद की 
राधा व श्याम की 

होली भर जाती  है 
राग और रंग से 
दिल की उमंग से   


शनिवार, मार्च 11

जीवन स्वप्नों सा बहता है



जीवन स्वप्नों सा बहता है 


आज नया  दिन 
अग्नि समेटे निज दामन में 
उगा गगन में अरुणिम सूरज 
भर उर में सुर की कोमलता 
नये राग छेड़े कोकिल ने 
भीगी सी कुछ शीतलता भर 
नई सुवास हवा ले आयी
मंद स्वरों में गाती वसुधा 
 पल भर में हर दिशा गुंजाई 
उड़ी अनिल संग शुष्क पत्तियां 
कहीं झरे पुहुपों के दल भी 
तिरा गगन में राजहंस इक 
बगुलों से बादल के झुरमुट 
नीला आसमान सब तकता 
माँ जैसे निज संतानों को 
जीवन स्वप्नों सा बहता है 
भरे सुकोमल अरमानों को...

शुक्रवार, मार्च 10

दिल का द्वार रहे उढ़काए


दिल का द्वार रहे उढ़काए 


नजर चुरायी जिस क्षण तुझसे 
खुद से ही हम  दूर हो गये, 
तेरे दर पर झुके नहीं जो 
 दिल खुद से मजबूर हो गये  !

स्वप्निल नैना बोझिल सांसें  
दूर खड़ी ललचाती मंजिल,
कितने दांवपेंच खेले पर 
सभी इरादे  चूर हो गये !

राग जगाता जग भरमाता 
हर सुकून ख्वाब बन टूटा, 
मनहर खेल रचाए जितने  
आखिर सभी  कुसूर हो गये !

हर उस क्षण तू वहीं रुका था 
हाथ बढ़ाने से मिल सकता,
कैसी मदहोशी छायी थी 
भूले से मगरूर हो गये !

सुने थे तेरे कई फसाने 
है अनंत प्रेम का सागर,
दिल का द्वार रहे उढ़काए 
इसमें ही मशहूर हो गये !