सोमवार, जुलाई 28

जहाँ मौसम बदलते नहीं

जहाँ मौसम बदलते नहीं


जहाँ कोई नहीं दूसरा
एक ऐसा भी देश है
जो नहीं धारण किया जाता प्रदर्शन के लिए
एक ऐसा भी वेश है
जहाँ टूट जाती हैं सब बेड़ियाँ
छूट जाती हैं रागात्मक छवियाँ
एक ऐसा भी प्रदेश है
जहाँ ठहर जाता है काल का रथ
ध्वनि का होता नहीं प्रवेश है
जहाँ नहीं कोई विरोध
जन्म लेती नहीं कोई कुंठा
कोई विडम्बना भी नहीं सताती
जहाँ दो न रहने से कोई स्मृति भी नहीं रह जाती
जहाँ खो जाती है अपनी छाया भी
नितांत एकांत ही जिसका होना है
एक ऐसा भी आदेश है
जहाँ मौसम बदलते नहीं पल-पल
जहाँ वसंत पतझड़ के आने की आहट नहीं देता
जहाँ बिन बरसे बादल कभी गुजरा ही नहीं
जहाँ नित एक रस मधुरता छायी है
जिसमें होना विपदा का मानो विदेश है
जहाँ निर्धूम अग्नि जलती है
 ज्योति की अखंड शिला पल-पल पिघलती है
जहाँ कोई मार्ग नजर नहीं आता
पर मंजिल हर कदम पर मिलती है
ऐसा भी एक स्वदेश है
जाना जहाँ संकट के मार्ग से गुजरना है
जहाँ टिकना तलवार की धार पर चलना है
 जो स्वयं को खो कर ही जाना जाता है
एक ऐसा भी महेश है !  


रविवार, जुलाई 27

एक कुमारी कन्या जैसे

एक कुमारी कन्या जैसे


कौन कहे जाता है भीतर
चुकती नहीं ऊर्जा जिसकी,
कौन गढ़े जाता है नूतन
प्यास नहीं बुझती उसकी !

एक कुमारी कन्या जैसे
है अभीप्सा शिव वरने की,
तृप्त नहीं होता है घट यह
बनी लालसा है भरने की !

एक अनंत स्रोत है जिससे
नित नवीन भाव जगते हैं,
पल भर कोई थम जाता जब
अमृत घट बरबस बहते हैं !

शब्द उसी के भाव उसी के
जाने क्या रचना वह चाहे,
कलम हाथ में कोरा कागज
सहज गीत इक रचता जाये 

शुक्रवार, जुलाई 25

अन्तरिक्ष का नहीं है छोर

अन्तरिक्ष का नहीं है छोर


तुझसे ही है जग में हलचल
तू है, तू ही खलबल मन की,
तू ही जीवन का कारण है
तू वजह हर एक उलझन की !

युद्ध जहाँ हो रहा वहाँ भी
तेरे नाम पर लड़ते लोग,
तप में लीन तपस्वी योगी
तुझसे ही लगाते योग !

शीतलतम हिमखड हैं कहीं
ज्वालामुखी कहीं फटते हैं,
कहीं लपकती तलवारे हैं
कहीं शंखनाद बजते हैं !

एक द्वंद्व से ग्रसित है सृष्टि
दिवस उजाले रात्रि भी घोर,
सागर की असीम गहराई
अन्तरिक्ष का नहीं है छोर !

भू के भीतर बहता लावा
शीश हिमानी सा शीतल,
मीलों रेगिस्तान बिछे हैं
कोसों तक फैला है जल !

दो ही दष्टि में आते हैं
दो पर ही यह माया टिकती,
एक तत्व है पीछे इसके
जिस पर सबकी नजर न जाती !

दोनों पल-पल साथ जी रहे
सन्त और असंत यहाँ पर,
पूजा और प्रार्थना घटती
संग ही होते युद्ध जहाँ पर !



गुरुवार, जुलाई 24

करुण पुकार इस धरा की

करुण पुकार इस धरा की


इजराइल में आग उगलती हैं तोपें
फिलिस्तीन जलता है
युक्रेन में शहीद होते हैं निर्दोष नागरिक
रूस भी पिघलता है
युद्ध की ज्वाला खा रही है इराक को
सीरिया का जख्म अभी है हरा
ए खुदा ! मारी गयी है मत तेरे बन्दों की
हिरोशिमा-नागासाकी से जी उनका नहीं भरा
लाचार है यूएनओ लाचार है अमेरिका और चीन भी
भारत इस हिंसा को देखता मौन है
फिर ढूँढ़ता हल इसका कौन है ?
करुण पुकार इस धरा की
नहीं जाती किसी के कानों में  
डूबी जाती है अन्याय व अत्याचार के भार से
जहाँ अमृत बरस सकता हो हर क्षण
वहाँ जहर फैला है अज्ञान का
दिलों और देशों को जो एक नहीं होने देता
भुलाकर भेद धर्म और जाति का
इन्सानियत का पुष्प खिलने नहीं देता
तब क्या अर्थ रह जाता है
धर्म के नाम पर होते इस संघर्ष का
इक्कीसवीं सदी की यह कैसी मानसिकता  
अंधकार मय युग की जहाँ छायी कालिमा  
कबीलों की जगह अब कौमें हैं लड़ती
विकास के नाम पर सभ्यता सिर धुनती  
किस सच की बात कर रहे विद्वान् विश्वविद्यालयों में
संदेश मिल रहे कैसे नई नस्ल को वाचनालयों में
कैसे मन्दिरों और मस्जिदों का वर्चस्व रहेगा  
जब नामलेवा इन्सान का हृदय ही
हिंसा से कठोर होकर न बचेगा ?




बुधवार, जुलाई 23

किसकी बाट जोहता यह उर


किसकी बाट जोहता यह उर


नीले नभ पर ज्यों बदलियाँ
नूतन रंगों से रंग जातीं,
अंतर के कोरे कागज पर
सुधियाँ कोई नृत्य सजातीं !

जाने किस दिन की बातें हैं
जाने किस पल की यादें हैं,
कोई तार नजर न आता
फूलों की लड़ियाँ पिर जातीं !

मन उड़ने-उड़ने को होता
कहने को कुछ भी न होता,
 अधर कांपते, मौन हृदय में
मधुरिम छायाएं घिर आतीं !

किसकी बाट जोहता यह उर
किसके हित बजते अंतर सुर,
मिलकर भी जो कभी न मिलता
उसकी चुप पुकार तड़पाती !

पल-पल आने की आहट है
मधुर अति यह अकुलाहट है,
जाने कैसा रूप धरेगा
प्रतिभिज्ञा मति कर न पाती !


मंगलवार, जुलाई 22

टेर लगाती इक विहंगिनी

टेर लगाती इक विहंगिनी




इन्द्रनील सा नभ नीरव है
लो अवसान हुआ दिनकर का,
इंगूर छाया पश्चिम में ज्यों  
हो श्रृंगार सांध्य बाला का !

उडुगण छुपे हुए जो दिन भर
कुछ पल में दिप-दिप दमकेंगे,
तप्त हुई वसुधा इतरायी
शीतलता राकापति देंगे !

उन्मीलित से सरसिज सर में
सूर्यमुखी भी ढलका सा है,
कर उपराम दिवस, भास्कर
अमी गगन से छलका सा है !

कर-सम्पुट  में भरे पुष्पदल
संध्या वन्द करें बालाएं,
कन्दुक खेल बाल टोलियाँ
लौट रहीं वन से चर गाएं !

तिमिर घना ज्यों कुंतल काले
संध्या फैलाये चहुँ ओर,
टेर लगाती इक विहंगिनी
केंका करते लौटें मोर !




सोमवार, जुलाई 21

झुका समपर्ण में जब मस्तक


झुका समपर्ण में जब मस्तक


सैकत पर लहरें सागर की
छोड़ चलीं ज्यों सीपी, शंख
उर के इस खाली दर्पण पर
स्मृतियों की बह गयी तरंग !

सेतु बनाया उन सुधियों को
सृजन किया इक भावालोक,
आवाहन कर प्राण प्रिय का
रचा महावर मिटाया शोक !

सुषमा अतुलित सुरति सुभग है
 सिंहावलोकन भी आवश्यक,
तब तब प्राण हुए आलोड़ित
झुका समपर्ण में जब मस्तक !


रविवार, जुलाई 20

अम्बर सा जो ढांपे जग को

अम्बर सा जो ढांपे जग को



अंक लिए सारी सृष्टि को
वह अनंत यूँ डोल रहा है,
अंतर गुहा का वासी भी है
निज रहस्य को खोल रहा है !

अंतरैक्य जब घटता है
सिंधु बिंदु में झर-झर जाता,
अम्बर सा जो ढांपे जग को
लघु उर में वह अजर समाता !

अक्षत, अगरु, अग्नि स्फुलिंग सी  
ज्योति अखंड बिखेरे भीतर,
अतल, अचल, अमर, अदम्य
भरे आस्था, प्रीत निरंतर !

अनुप्राणित कण-कण को करता
 है कोई अनुबंध अनकहा,
रहे अगोचर कहने भर को
हस्ताक्षर कहीं दिख रहा !

स्वयं अनुरक्त नजर में रखता
सहस भुजाओं वाला कहते,
 अनुरागी अंतर को मथता
प्रेमिल अश्रु यूँ न बहते ! 

शनिवार, जुलाई 19

अभी तो जिंदा हैं हम


अभी तो जिंदा हैं हम


दूर खड़ी है अभी तो मौत 
जब आएगी तब आयेगी
अभी तो जी लेने दो
लोग मरते हैं उन्हें मरने दो
अभी तो जिंदा हैं हम
अभी से क्यों करें उसका गम
अभी होश में आने को मत कहो
अभी तो देखने दो सपने
अभी तो झटक डालो यह बात भी
अभी तो दिन है न कहो
कभी आएगी रात भी
 ये जलती हुई चिताएं औरों की हैं
ये धूल में दबी देह अपनी तो नहीं
जो राख हो गये वे दूसरे हैं
 अभी तो खेलने खाने के दिन हमारे हैं....

शुक्रवार, जुलाई 18

तो खिलेगी पाँखुरी

तो खिलेगी पाँखुरी


बांस की इक पोंगरी हम
तुम बजाओ तो बनेंगे बांसुरी

एक बिखरा गीत जैसे
इक अधूरी सी कहानी
क्रम नहीं सतरों में कोई
तुम लिखो, तो बहेगी माधुरी !

चंद श्वासें पास अपने
पल रहे कुछ खास सपने
किस चरण पर हों समर्पित
तुम धरो, तो खिलेगी पाँखुरी !

बांस भी अपना नहीं है
श्वास भी पायी तुम्हीं से
तुम्हें अर्पित शै तुम्हारी
 तुम गहो तो सार्थक हो रागिनी !



गुरुवार, जुलाई 17

अँधेरे के पार


अँधेरे के पार



प्रकाश की एक दूधिया नदी
बहती है भीतर
जिसका कोई तट नजर नहीं आता
एक अंतहीन सन्नाटे की गूँज
जिसकी लहरों में सुनाई देती है
अदृश्य कमलों की गंध भी चली आती है
खो जाते हैं स्पंदन.. और
जम जाता है शिराओं में बहता रक्त
थम जाता है ज्यों सृष्टि का सारा व्यापार
 एक मधुर रस टपकता है
दिग दिगंत से
सहेजते हैं अदेखे हाथ
महसूस होती है छुअन बन परस
नृत्य घटता है कहीं गहराइयों में
नजर नहीं आता पर कोई नर्तक !


बुधवार, जुलाई 16

रंगमंच


रंगमंच



जल धाराओं के सिंचन से
तृप्त हुई माँ
उलीचती हरियाली
निज अंतर में कुछ न रखती
सभी यहाँ लौटा देती है
गंध, स्वाद, रंग बन मिलती
धरती कई रूप में खिलती !
पुरवाई भी हुई शीतला
जल संस्पर्श हर गया तप्तता
झूमें वृक्ष, डालियाँ थिरकें
विहग विहँसते.. परस पवन का !
अन्तरिक्ष प्रफ्फुलित उर में
मूक, मौन हो सबको धारे
रवि मयूख धेनु बना कर
नील गगन का रूप संवारे !
सृष्टि रंग मंच पर नित ही
खेल नये नित खेले जाते
उसी चेतना के हित हैं ये
उससे ही हैं भेजे जाते !