बुधवार, मई 27

कुछ भूली-बिसरी यादें

कुछ भूली-बिसरी यादें

लंबा, छरहरा कद, गेहुँआ रंग, फुर्तीला तन और आवाज में युवाओं का सा जोश. ऐसे हैं माथुर अंकल ! जब भी आंटी के साथ बेटी-दामाद से मिलने असम आते उनसे भेंट होती. यह सिलसिला कई वर्षों से चल रहा था. अपने नाती-नातिन के प्रति उनका अति प्रेमपूर्ण व्यवहार, वृद्धा संगिनी का हाथ पकड़ कर सड़क पार कराना, मेहमानों के आने पर रसोईघर में बेटी का हाथ बंटाना, फिर भी घर में ऐसे रहना जैसे हो ही नहीं, ऐसे जैसे हवा रहती है. अगले दिन वे वापस जाने वाले थे, सो उस शाम जब मिलने गयी तो बातों का क्रम उनके अतीत की ओर मोड़ते हुए कुछ सवाल किये. जवाब में उन्होंने कई रोचक संस्मरण सुनाये.
“आप जानती हैं, उस वक्त पूरे सूबे में एक आईजी हुआ करता था, आज तो एक जिले में ही एक से अधिक होते हैं. यह पंडित नेहरू के युग की बात है. आज बच्चे-बच्चे के पास मोबाइल फोन हैं, उस वक्त यदि कोई वीआईपी आने वाला होता था तो कमिश्नर भी घंटों तक खड़े रहकर प्रतीक्षा करने को विवश थे. काफिला कहाँ तक पहुंचा है, जानने का कोई साधन ही नहीं था. मैंने बीएससी की डिग्री लेने के बाद पुलिस के वायरलेस तकनीकी विभाग में वायरलेस ऑपरेशन अधिकारी के पद पर लखनऊ में कार्य करना शुरू किया. मुरादाबाद में हमें सख्त ट्रेनिंग दी गयी, सुबह पांच बजे उठकर परेड करनी होती थी, राइफल चलाना भी सिखाया गया. उस समय उत्तरप्रदेश के पुलिस प्रमुख एक कर्नल थे, उन्होंने हरिद्वार के कुम्भ मेले में पहली बार वायरलेस सेट का इस्तेमाल किया था. ये सेट अमेरिकी सेना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मुम्बई  में छोड़ गयी थी. भारत सरकार ने इसे राज्यों की पुलिस को ले जाने के लिए कहा तो लखनऊ के जोशीजी इन्हें ले आये. बैटरी से चलने वाले इन उपकरणों को अपनी जरूरत के अनुसार बदल  कर हम काम में लाने लगे.
मैंने पहली बार इनका प्रयोग इलाहबाद के कुम्भ मेले में किया. उस साल वहाँ एक भयानक हादसा हुआ था. वहाँ के स्थानीय निकाय तथा पुलिस ने मेले के लिए काफी प्रबंध किये थे लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था. संगम तक पहुंचने के लिए एक ऊंचा टीला पार करना पड़ता था, जिसे मिट्टी वगैरह डालकर ठीकठाक किया गया था. रात को वर्षा हुई व मुँह अँधेरे स्नानार्थियों की भीड़ आनी शुरू हो गयी. टीले की ऊंचाई पर लोग आराम से पहुंच रहे थे पर उतरते समय फिसलन इतनी ज्यादा हो गयी कि लोग गिरते-पड़ते नीचे पहुंचने लगे. पीछे आने वालों को इसकी खबर नहीं थी, भीड़ बढती जा रही थी, लोग कुचले जा रहे थे. हमने टावर से यह हादसा देखा, वायरलेस सेट का प्रयोग कर जब तक हम लोगों को सचेत कर पाते कई सौ कीमती जानें जा चुकी थीं. कतार में रखे सफेद चादरों में लिपटे शवों का वह दृश्य आज भी कंपा जाता है.”
हम सब भी यह सुनकर सन्न रह गये थे. अंकल थोड़ा प्रकृतिस्थ हुए तो आगे कहने लगे,
“सन् बासठ के चीनी आक्रमण के वक्त मुझे मुरादाबाद भेजा गया, जहाँ से हमारी यूनिट उत्तरकाशी, जोशीमठ तथा आगे गंगोत्री तक गयी. बर्फ गिरने से रास्ते बंद हो गये थे. सेना से भी आगे रहकर दुश्मन के हमले को झेला. वायरलेस सिस्टम के द्वारा ही संदेश भेजना सम्भव हो सका था.”
हम सभी उनकी बातें बड़े आश्चर्य के साथ सुन रहे थे. आगे उन्होंने बताया, “अगले कुछ वर्षों तक मेरी ड्यटी अति विशिष्ट अधिकारियों के साथ लगी. कुछ दिन खुफिया विभाग में काम किया और संचार मंत्रालय में भी. जब कभी वीआइपी आते थे, मिनट-मिनट बड़ा कीमती होता था, उन्हें सुरक्षित लाने के लिए कितनी बार रिहर्सल होती थी. उनके सामने खुर्श्चेव आये, ड्यूक ऑफ़ एडिनबरा आये और दलाई लामा, राजेन्द्र प्रसाद के साथ भी उनकी ड्यूटी लगी थी. नेहरू जी जब लखनऊ आते तो हिंडन ब्रिज पर काफिला रोककर दिल्ली पुलिस लौट जाती थी. फिर यूपी पुलिस की जिम्मेदारी थी. नेहरू जी का एक रोचक किस्सा उन्होंने बताया, एक बार लोग उनके दर्शनों के इंतजार में खड़े-खड़े थक गये थे, जब वे पहुँचे, उन्होंने गाड़ी रुकवाई और लोगों से मिलने लगे, सारी सुरक्षा धरी रह गयी, किसी ने लड्डू दिया तो उन्होंने खा लिया.
माथुर अंकल के पास और भी मजेदार किस्से थे, कैसे सुल्ताना डाकू को पकड़ने ब्रिटेन से एक कैदी आया था. एक बार वह खुद यूनिट के साथ मान सिंह को पकड़ने गये थे. कहने को तो पुलिस तन्त्र था पर कई तरह के काम उन्होंने किये. माइक, जेनरेटर भी सुधारे. उनके काम से अफसर बहत खुश थे, तरक्की भी मिलती गयी. उन्हें पुलिस पदक भी मिला, पड़ोसी ने अख़बार पढ़ा और उन्हें आकर यह खबर सुनाई. राजभवन में शानदार आयोजन हुआ था.
हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की बात कहते समय उनकी आँखें चमक रही थीं, “लखनऊ की पुलिस लाइन में रहते समय सभी मिलजुलकर सब त्यौहार मनाते थे. जफर साहब कीर्तन में शामिल होते थे, ईद व दीवाली सब मिल कर मनाते थे.” शाम काफी हो गयी थी. सब से विदा लेकर हम घर आये तो मन में वह स्मृतियाँ ताजा थीं. आज उन्हें कागज पर उतार दिया है, ताकि कुछ और लोग भी पढ़कर भारत के अतीत से रूबरू हो सकें औत माथुर अंकल जैसे व्यक्तित्व से भी.


शनिवार, मई 23

वाराणसी – एक अंतहीन उत्सव


वाराणसी – एक अंतहीन उत्सव

हम अर्धरात्रि दो बजे वाराणसी रेलवे स्टेशन पर उतरे. मुख्यद्वार से सटा हॉल खचाखच भरा था, पुल पर भी बोरिया-बिस्तर लिए सैकड़ों व्यक्ति थे, कुछ बैठे, कुछ लेटे हुए सोए थे. उनमें से कई तीर्थयात्री रहे होंगे जो आस-पास के गावों तथा कस्बों से गंगा मैया तथा बाबा विश्वनाथ के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करने हर पर्व पर वाराणसी आते हैं. कुछ मेडिकल कॉलेज में इलाज करने आये होंगे. स्टेशन से बाहर निकले तो सड़क पर भी चहल-पहल थी. ऑटो रिक्शा वाले ताजा-तरीन मूड में थे, कोई भी उनींदा नजर नहीं आया. कहते हैं एक अजीब सी मस्ती या खुमारी यहाँ की हवा में है, जिसमें हर तबके के लोग डूबे रहते हैं. वाराणसी, जिसे बनारस और काशी भी कहते हैं, के बारे में कहा जाता है कि ‘सात वार और नौ त्यौहार’, अर्थात यहाँ किसी दिन एक से अधिक पर्व भी मनाया जाता है. यहाँ स्थान-स्थान पर आस्था के प्रतीक स्थल हैं, शहर के हर मुख्य तिराहे या चौराहे पर हनुमानजी, शिवजी अथवा देवी के मन्दिर हैं, कहते हैं काशी के कंकर-कंकर में शंकर का वास है. अगले एक सप्ताह तक हम बनारस के इसी रूप को निकट से महसूस करने की ख्वाहिश लेकर आये थे.

सुबह उठकर हम विश्व प्रसिद्ध घाट देखने निकले. जो हजारों वर्षों से काशी की शोभा बढ़ा रहे हैं. वर्तमान में यहाँ अठाहरवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में निर्मित पत्थर की असंख्य सीढ़ियों वाले घाट तथा उन पर स्थिर अनेक भव्य मन्दिर, महल, आलीशान द्वार तथा हवा का आनंद लेने के लिए बने गई खास इमारतें हैं. हम रिक्शे से सीधे दशाश्वमेध घाट आये, जो सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा स्वच्छ घाट है. बड़े-बड़े श्वेत व गुलाबी आभा लिए पत्थरों द्वारा बनाये गये घाटों तथा जल तक उतरती सीढ़ियों ने हमारा मन मोह लिया तथा कल-कल बहती गंगा का नीला जल हृदय को भीतर तक शीतल कर गया. काशी में गंगा नदी का नहीं आस्था का नाम है. गंगा के प्रति लोगों की भक्ति यहाँ देखते ही बनती है. बांस की छतरी लगाये, लकड़ी के तख्तों पर अपना आसन बिछाए पंडे-पुजारी दूर प्रदेशों से आये यात्रियों को पूजा करवा रहे थे, तथा उनके सामान की सुरक्षा भी कर रहे थे. एक स्थान पर हमें दक्षिण भारत से आया एक परिवार मंत्रोच्चारण करता हुआ दिखा. जल को श्रद्धा से मस्तक पर छुआते, आचमन करते तथा डुबकी लगाते सैकड़ों यात्री सुंदर दृश्य उत्पन्न कर रहे थे. कहीं कोई बालक तैरने का अभ्यास कर रहा था तो कहीं कोई महिला किनारे पर बैठ लोटे से सिर पर जल उडेंल रही थी. नौका भ्रमण कराते हुए नाविक ने बताया कि बरसात में जब पानी सीढ़ियों को ढक लेता है नाव चलाना जोखिम भरा काम होता है. सर्दियों में जब गंगा का शांत रूप देखने को मिलता है, अंतिम सीढ़ी तक उतर कर जल में प्रवेश मिलता है.

गंगा की शोभा प्रातःकाल से रात्रि तक कई रूपों में परिलक्षित होती है. गंगा जो नित्य नई है और हजारों वर्ष पुरानी भी, साक्षी है अनेक राजवंशों की, जो अपने समय में उन्नति के शिखर पर पहुंचे थे. जिसके स्मृति चिह्न घाटों के रूप में आज भी मौजूद हैं. उनमें अहल्याबाई होल्कर हैं, जयपुर के महाराजा जयसिंह, मराठा सरदार पेशवा अमृतराव हैं. त्रिपुराभैरवी घाट दक्षिण भारतीय लोगों का निवास स्थल है, जहाँ हजारों की संख्या में आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक से यात्री आते हैं.

हमने देखा हर घाट चाहे वह छोटा हो या बड़ा, अपनी अलग पहचान लिए है. लगभग सौ घाटों में से कुछ समय के साथ ढह गये हैं, कुछ पूरी आन-बान के साथ हर सुबह स्नानार्थियों का स्वागत करते हैं. कुछ का नवीनीकरण हुआ है. कितनों के किनारे आधुनिक होटल बन गए हैं, कुछ में बनारसी साड़ियों की दुकानें व कारखाने भी हैं. कई घाटों पर योगकेंद्र भी तथा कुछ पर लोगों ने अपना निवास भी बना रखा है. यहाँ नित्य एक उत्सव का माहौल बना रहता है. नगर के दक्षिणी छोर पर स्थित है अस्सी घाट, गंगा व असी नदी के संगम स्थल पर स्थित यह घाट बनारस के प्राचीनतम स्थलों में से है. इसके बाद तुलसी घाट, हनुमान घाट हरिश्चन्द्र घाट तथा केदार घाट हैं. हरिश्चन्द्र तथा मणिकर्णिका दोनों श्मशानघाट हैं, वहाँ जाकर जीवन की नश्वरता का बोध हमें गंभीर बना गया. काशी को मुक्ति स्थल माना गया है, यह पंच तीर्थों में से एक है. नौकावाहक ने जो हमारे गाइड का काम भी कर रहा था, कई घाटों से जुडी कथाएं भी सुनायीं. राजा हरिश्चन्द्र का महल, डोम के रूप में उनका निवास स्मृति रूप में अभी तक सुरक्षित है. जहाँ तुलसी ने रामचरितमानस लिखी थी, जहाँ कबीर को गुरू मिले थे, वे स्थान तथा जहाँ शंकर का कर्णफूल गिरा था और पार्वती का मणि, वह कुंड आज भी मौजूद है. काशी में समय जैसे ठहर गया है, चाहे दुनिया कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, यहाँ के मन्दिर तथा घाट अपनी प्राचीन भव्यता को सुरक्षित रखे हुए हैं.

संध्या काल में होने वाली गंगा आरती में शामिल होने के लिए हमने पुनः नाव का आश्रय लिया. नाविक ने अनेक छोटी-बड़ी नौकाओं के साथ अपनी नाव भी स्थिर कर ली. आस-पास के सभी स्थान लोगों से भर गये थे, कुछ चबूतरों व सीढ़ियों पर बैठकर प्रकाश के इस उत्सव का आनंद उठा रहे थे. धूप, दीप, लोहबान, कपूर, पुष्प तथा कई सामग्रियों के द्वारा सात पुजारियों ने जब मंत्रोच्चार करते हुए आरती की तब सभी मंत्रमुग्ध हो गये. जल में दीपों का प्रतिबिंब तथा नदी की धारा के साथ बहते पत्तों की नाव में तैरते दीपक जाने किस लोक की खबर दे रहे थे.

अगले दिन मन्दिर दर्शन का कार्यक्रम था. सबसे पहले हमारा रिक्शा रुका, महा मृत्युंजय मन्दिर पर, जहाँ दर्शनार्थियों की कतार पहले से ही लगी थी, हमने बाएं द्वार से शिव पिंडी के दर्शन किये. हमें आगे पैदल ही जाना पड़ा, संकरी गली में दो ट्रक आमने-सामने आ जाने से आगे नहीं जाया जा सकता था. रास्ता पूछते-पूछते हम काशी के प्रसिद्ध काल भैरव मन्दिर पहुंचे. काशीवासी इन्हें काशी का कोतवाल मानते हैं, सर्वप्रथम इनके दर्शन का विधान है. संकटादेवी के मन्दिर में हम सीढियाँ चढ़ते हुए पहुंचे तो श्वास फूल रही थी, घाट पर स्थित अनेक मन्दिरों में से यह एक है. इसके बाद भूल-भुलैया गलियों में चलते-चलते हम विश्वनाथ गली पहुंचे जहाँ विश्वप्रसिद्ध विश्वनाथ मन्दिर है. कई बार हुए आतंकवादी हमलों के कारण तथा विवादित क्षेत्र होने के कारण यहाँ पुलिस का सख्त पहरा था. इस मन्दिर का निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने अठाहरवीं शताब्दी में करवाया था. इसके शिखर पर महाराजा रणजीत सिंह ने लगभग बाइस टन सोना लगवाया था.

उसी दिन संध्या के समय नगर के तीन प्रसिद्ध मन्दिर – बिरला मन्दिर, जो बनारस हिंदू विश्व विद्यालय में स्थित है, संकट मोचन हनुमान मन्दिर, जो संतकवि तुलसीदास को समर्पित है, तथा श्री दुर्गा मन्दिर देखने गये. नवरात्रि के कारण हर जगह भीड़ थी. दुर्गा मन्दिर के सामने तो व्रती स्त्रियों की लम्बी-लम्बी कतारें लगी थीं, जो हमें धर्म के बदलते हुए रूप पर सोचने को विवश कर रही थीं. अगले दिन मौसम गर्म था सो हमने सुबह-सवेरे ही नाव से गंगा के दूसरे तट पर जाकर, जहाँ पानी अपेक्षाकृत स्वच्छ था तथा भीड़ भी कम थी, स्नान किया, गंगा का रेतीला तट मीलों तक पसरा हुआ था.


वाराणसी से मात्र दस किमी दूर बौद्धों का पवित्र विश्वप्रसिद्ध तीर्थस्थल सारनाथ स्थित है. शाम सारनाथ के हरे भरे बगीचों में हिरणों को बेफिक्री से घूमते हुए देखने तथा शीतल हवा का आनंद लेने में बितायी. भगवान बुद्ध ने अपने प्रथम पांच शिष्यों को जिस स्थान पर उपदेश दिया था वहाँ सुंदर भव्य मूर्तियों द्वारा बना स्मारक सभी दर्शनार्थियों को आकर्षित करता है. विभिन्न देशों के पर्यटक बौद्ध लामाओं द्वारा दिए गये प्रवचन को सुनने के लिए एक मन्दिर के पास लॉन में कतार बद्ध बैठे थे. एक अन्य समूह मौन धारण किये किसी साधना कक्ष से निकल रहा था. महात्मा बुद्ध के अवशेषों को समेटे स्तूप जो तेतीस मीटर ऊंचा है और लाल इंटों व पत्थरों से बना है, हमें दूर से बुला रहा था. सारनाथ संग्रहालय में सम्राट अशोक की भव्य लाट तथा पुरानी मूर्तियाँ, लेख तथा बर्तन देखकर किसे भारत के स्वर्णिम अतीत पर गर्व नहीं होगा. हमने पैदल घूमते हुए चीनी, जापानी व तिब्बती बौद्ध मन्दिर देखे. अपने पड़ाव के अंतिम दिन हम वरुणा नदी के तट पर नये बने लाल बहादुर शास्त्री घाट को देखने गये. कई सुखद स्मृतियाँ लेकर हमने उसी रात्रि वापसी की यात्रा आरम्भ की.

बुधवार, मई 20

गाँठ सभी खोल लो


गाँठ सभी खोल लो
  

एक वर्ष और बीता
गठरी न बांधो और
जाने कब चलना हो
अंतिम हो कौन भोर ?

हल्का ही मन रहे
सफर जाने कैसा हो,
गाँठ सभी खोल लो
कौड़ी न पैसा हो !

एक ही लगन रहे
जाना है उसी देश,
कोई जहाँ तके राह
भटके बहुत परदेश !

मंगलवार, मई 19

नींदें हैं सदियों की



नींदें हैं सदियों की

छोटे से जीवन में
भरना है आकाश,
नन्ही सी बगिया में
पलना है पलाश !

कुछ ही तो पल होंगे
जीवन मुस्काएगा,
पलकों में पल भर ही
सपना भर पायेगा !

नींदें हैं सदियों की
क्षण भर में टूटेंगी,
मंजिल को पाने की
हसरत भी छूटेगी !


गुरुवार, मई 14

मृत्यु और जीवन

मृत्यु और जीवन


मौत एक पल में छीन लेती है कितना कुछ
माथे का सिंदूर हाथों की चूड़ियाँ
मन का चैन और अधरों की हँसी
पत्नी होने का सौभाग्य ही नहीं छीनती मौत
एक स्त्री से उसके कितने छोटे-छोटे सुख भी
पिता का आश्रय ही नहीं उठता सिर से
पुत्र की निश्चिंतता, उसका भरोसा भी
अश्रु बहते हैं निरंतर ऑंखें सूज जाती हैं
रुदन थमता नहीं विधवा का
रह-रह कर याद आती है कोई बात
और कचोट उठती है सीने में
रोते-रोते चौंक जाती है
कह उठती है, मुझे साथ ले चलो
पर कोई जवाब नहीं आता
कभी नहीं आया,
उस पार गया कोई भी लौट कर नहीं आया
क्या है मृत्यु ?
जो छीन लेती है जीवन का रस
अपनों का, भर जाती है ऐसी उदासी
जो कभी खत्म होगी इसका विश्वास नहीं होता
मर सकता है कोई भी.. कभी भी.. किसी भी क्षण
तो क्यों न सामना करें इस प्रश्न का
क्यों न रहें तैयार हर पल.. सामना करने मौत का...
मौत जो जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है
जिसकी नींव पर ही जीवन की भीत टिकाई है
जीवन के पीछे ही छुपी है मौत
करती रहती है इंतजार उस पल का
जब शांत हो जायेगा सांसों का खेल
और झपट लेगी वह हलचल जीवन की
मुर्दा हो जायेगा यह शरीर
पर भीतर जो जान थी उसे
छू भी नहीं पायेगी मौत
कौन जानता है उसका होना
वही जो उतरा है भीतर जीते जी
जिसने चखा है मृत्यु का स्वाद जीते जी
जिसने पहचान की है घर के मालिक से !

मंगलवार, मई 12

गुरूजी के जन्मदिन पर

गुरूजी के जन्मदिन पर

मुक्तिबोध कराते पल में
करुणा सागर ज्ञान का दरिया,
ऐसे थामे रखते पल-पल  
प्रेम लुटाते ज्यों सांवरिया !

स्वीकारें हर परिस्थिति को
किन्तु डिगें न अपने पथ से,
वर्तमान में रहकर प्रतिक्षण
वरतें स्वयं सम सारे जग से !

नित नूतन कई ढंग से
बोध कराते निज स्वरूप का,
भाव भंगिमा अनुपम उनकी
छलकाते जाम मस्ती का !

सेवा, सत्संग और साधना
स्वाध्याय का दें संदेश,
जीवन धन्य बनेगा कैसे
सिखलाते हैं देश-विदेश !

सद्गुरु का होना सूर्य सम
अंधकार अंतर का मिटता,
चाँद पूर्णिमा का अथवा हो
सौम्य भाव इक उर में जगता !

शुभता और सत्यता बाँटें
हर लेते हर पीड़ा मन की,
सहज समाधि में ले जाते
अद्भुत है क्रीड़ा गुरू जन की !

दिवस अवतरण का पावन है
बरसों पूर्व धरा पर आये,
शुद्ध बुद्ध चेतना लेकर
भारत भूमि पर मुस्काए !

शिशु काल से ही भक्ति का
बीज अंकुरित था अंतर में,
लाखों जन की पीड़ा हर लूँ
यह अंकित था कोमल उर में !

की तपस्या बरसों इस हित
सहज ध्यान में बैठे रहते,
जग को क्या अनमोल भेंट दूँ
इस धुन में ही खोये रहते !

स्वयं कुछ पाना शेष नहीं था
तृप्त हुआ था कण-कण प्रभु से,
चिन्मय रूप गुरू का दमके
पोर पोर पगा था रस से !

क्रिया की कुंजी बांटी सबको
राज दिया भीतर जाने का,
छुपा हुआ जो प्रेम हृदय में
मार्ग दिया उसको पाने का !

सद्गुरु को शत शत प्रणाम हैं
कृपा बरसती है नयनों से,
शब्द अल्प हैं क्या कह सकते
तृप्ति झरती है बयनों से !

लाख जन्म लेकर भी शायद
नहीं उऋण हो सकता साधक,
गुरू की एक दृष्टि ही जिसको
करती पावन जैसे पावक !

एक समन्दर है शांति का
एक बगीचा ज्यों पुष्पों का,
एक अनंत गगन सम विस्तृत
मौन एक पसरा मीलों का !

गुरु की गाथा कही न जाये
शब्दों में सामर्थ्य कहाँ है,
स्वर्गिक ज्योति ज्यों ज्योत्स्ना
बिखरी उसके चरण जहाँ हैं !

सिर पर हाथ धरे जिसके वह
जन्मों का फल पल में पाता,
एक वचन भी अपना ले जो
जीने का सम्बल पा जाता  !

महिमा उसकी है अपार
बिन पूछे ही उत्तर देता,
प्रश्न कहीं सब खो जाते
अन्तर्यामी सद्गुरु होता !

दूर रहें या निकट गुरू के
काल-देश से है अतीत वह,
क्षण भर में ही मिलन घट गया
गूंज रहा जो पुण्य गीत वह !

पावन हिम शिखरों सा लगता
शक्ति अरूप आनंद स्रोत है,
नाद गूंजता या कण-कण में
सदा प्रज्वलित अखंड ज्योत है !

वही शब्द है अर्थ भी वही
भाव जगाता दूजा कौन,
उसकी महिमा खुद ही जाने
वाणी हो जाती है मौन !

सरिता कल-कल ज्यों बहती है
उससे सहज झरे है प्रीत,
डाली से सुवास ज्यों फैले
उससे उगता है संगीत !

धरती सम वह धारे भीतर
माणिक-मोती सम भंडारे,
बहे अनिल सा कोने कोने
सारे जग को पल पल तारे !


मंगलवार, मई 5

छा गयी जब बदलियाँ

छा गयी जब बदलियाँ


हवा की सरगोशियाँ
पर झुलाती तितलियाँ,
डोलते से शाख-पत्ते
झूमती सी कहकशां !

एक चादर सी बिछी हो
या धरा पर चुनरियाँ ,
पुष्प जिस पर सज रहे हैं
मस्त यूँ नाचे फिजां !

आ गये मौसम सुहाने
छा गयी जब बदलियाँ,
धार अम्बर से गिरी ज्यों
रहमतें बरसें जवां !

गा रहे पंछी मगन हो
छा रही मदहोशियाँ,
हैं कहीं नजदीक ही वह
कह रही खामोशियाँ !

शुक्रवार, मई 1

मजदूर दिवस

मजदूर दिवस

घर के बाहर माली दिखा
बगीचे की घास संवारता सुबह-सवेरे ही
याद आया आज मजदूर दिवस है और इसे पता तक नहीं..
कुछ ही देर में आयी कामवाली बाई
पहला सवाल था आज छुट्टी है किस बात की
समझाया उसे आज है मजदूर दिवस
पर उसे तो काम करना था रोज की तरह
कामगार ससुर अस्पताल में भर्ती है
उसे जाने की जल्दी है  
दूध वाला आया
और फिर धोबी घर-घर घूमते
भीगे पसीने से, साइकिल चलाते
उन्हें भी कहाँ ख्याल होगा आज कौन सा दिन है
सोचा.. क्यों न खुद ही कुछ ऐसा करें
आज कुछ खास है उन्हें लगे
माली के लिए मसाला चाय बनाई
बाई के लिए परांठे भी
दूध वाले को बिन मांगे बख्शीश दी
और धोबी से कुछ देर गपशप की
अस्पताल जाकर रोगी को देखा
और.. इस तरह मजदूर दिवस मना !


गुरुवार, अप्रैल 30

मौसम

मौसम

आते हैं जाते हैं
वृक्ष पुनः पुनः बदला करते हैं रूप
हवा कभी बर्फीली हो चुभती है
कभी तपाती आग बरसाती सी..
शुष्क है धरा... फिर
भीग-भीग जाती है  
निरंतर प्रवाह से जल धार के
मन के भी मौसम होते हैं और तन के भी
बचपन भी एक मौसम है
और एक ऋतु तरुणाई की
जब फूटने लगती हैं कोंपलें मन के आंगन में
और यौवन में झरते हैं हरसिंगार
फिर मौसम बदलता है
कुम्हला जाता है तन
थिर हो जाता है मन
कैसा पावन हो जाता प्रौढ़ का मन
गंगा के विशाल पाट जैसा चौड़ा
समेट लेता है
छोटी बड़ी सब नौकाओं को अपने वक्ष पर
सिकुड़ जाता है तन वृद्धावस्था में
पर फ़ैल जाता है मन का कैनवास
सारा जीवन एक क्षण में उतर आता है
मृत्यु के मौसम में..