बुधवार, जून 21

दोराहे हर मोड़ खड़े हैं




दोराहे हर मोड़ खड़े हैं



कहीं प्रज्ज्वलित अग्नि शिखा सी
कहीं धुँए से ढकी सुलगती,
कहीं सुगंधित अनिल बह रही
कहीं घुटन से फिजां रुँधी सी !

जीवन मिले बिछाय बिसातें 
चाहे जिस पाले में जाएँ,
पल-पल चुनना स्वयं को यहाँ
किसे सहेजें किसे लुटाएं !

दोराहे हर मोड़ खड़े हैं
निज हाथों में ही गेंद सदा,
हों स्वतंत्र हर दांवपेंच में
काटेंगे खुद का ही बोया !

एक ही नियम एक सदुपाय
जागे-जागे कदम बढ़े हर,
सूत्र यही इस खेल का सहज
यही बहे बन विजय का सुस्वर !

सोमवार, जून 19

तृषित उर की मालती है


तृषित उर की मालती है

खिल न पाया कमल दिल का
यही पीड़ा सालती है,
इक तंद्रालस ने घेरा
बात कल पर टालती है !

जगत केवल इक बहाना
एक अवसर, रास्ता इक,
खोज खुद की चल रही है
तृषित उर की मालती है !

साज भी है उँगलियाँ भी
मृदु रागिनी भी बज रही,
श्रवण लेकिन सुन न पाते
 चेतना धुन पालती है !

नीलवर्णी शुभ्र नभ पर
डोलते हैं मेघ सुंदर,
इस व्यूह में खो गया मन
पाश माया डालती है !

चले मीलों दूर फिर भी
मंजिलों से रहते सदा,
नींद लोरी दे सुलाए
सोमरस जो ढालती है !

रविवार, जून 18

बूँद यहाँ हर नयना ढलकी


बूँद यहाँ हर नयना ढलकी


जाने क्या पाने की धुन है
हर दिल में बजती रुनझुन है,
किस आशा में दौड़ लगाते
क्षण भर की ही यह गुनगुन है !

दिवस-रात हम स्वप्न देखते
इक उधेड़बुन जगते-सोते,
चैन के दो पल भी न ढूँढे
जीवन बीता हँसते-रोते !

जाने कितनी बार मिला है
फूल यही हर बार खिला है,
स्रोत खोज लें इस सौरभ का
क्यों आखिर मन करे गिला है !

करुणा भरी कहानी सबकी
एक वेदना ही ज्यों छलकी,
सुख भी मिलता साथ दुखों के
बूँद यहाँ हर नयना ढलकी !  

खुला रहस्य, राज इक गहरा
रब पर लगा न कोई पहरा,
खुली आँख भी वह दिखता है
मिलने उससे जो भी ठहरा !

शुक्रवार, जून 16

ओ मेरे मन !

ओ मेरे मन !


ओ मेरे मन !
जरा थम तो सही
कर पहचान खुद से
हजार छिद्रों वाला तू
पूर्ण क्योंकर हो सकेगा
अभाव यह तेरा कभी न भरेगा
तू मान ही ले
यह सच्चाई आज जान ही ले

तुझे ऐसा ही बनाया है
ऊपरवाले ने ही खेल रचाया है
तू कभी गाता कभी रोता है
दोनों बार ही नयन भिगोता है
दो कलों के मध्य डोलता रहता
कभी न खुद के करीब होता है

ओ मेरे मन !
थम जायेगा तू जिस पल
रुक जाएगी तेरी हलचल
जानेगा अपने कूल को
प्रकाश के उस मूल को


गुरुवार, जून 15

सरस बना पल-पल आ डोले

सरस बना पल-पल आ डोले


सुख आशा में जाने कितने
दुःख के बीज गिराए पथ में,
जिन्हें खोलने के गुर सीखें
बाँधे बंधन निज हाथों से !

एक बूंद भी विष की जग में
जीवन हर लेने में सक्षम,
धूमिल सी भी कोइ कामना
ढक देती अंतर का दर्पण !

यहाँ लगा बाजार चाह का
होश कहाँ से जगे हृदय में,
फूलों से जो सज सकता था
कंटक उगते मार्ग प्रणय में !

प्रथम कदम को दिशा मिले गर
खुदबखुद राहें खुलीं, गातीं,
सरस बना पल-पल आ डोले
जन्मों की अकुलाहट जाती !


सोमवार, जून 12

लौट चलें क्यों ना अपने घर


लौट चलें क्यों ना अपने घर


गर तलाश सुकून की दिल में
भटक-भटक यदि ऊब गया उर,
राह तके कोई बैठा है
लौट चलें क्यों ना अपने घर !

ठोकर ही खायी हो जिसने
पलकों पर यह उसे बिठाये,
सदा मुखौटा ही ओढ़ा हो
सहज सादगी से देगा भर !

स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख के सपने
नहीं दिखाता कभी किसी को,
सौगातें अनमोल लिए यह
सहज लुटाता जीवन  के स्वर !

नहीं माँगता कीमत कोई
मोल बिना बिकने को आकुल
धूल छान ली हो जग की तो
झुका दें निज द्वार यह अंतर !




शनिवार, जून 10

समर्पण


समर्पण 

झुका चरणों में जब-जब कोई माथ
पाया सर पर सदा कोई अदृश्य हाथ
नयनों से झरते जिस पल अश्रु कृतज्ञता के
हरे हैं भाव सारे उसने अज्ञता के
पाया कुछ अनमोल.. क्या है.. कहा नहीं जाता
ऐसा कोई गीत है जो शब्दों में नहीं समाता
सारा अस्तित्त्व जैसे समा गया हो भीतर
या खो गया मन भी उस महान के अंदर
रहा कौन शेष , लुप्त हुआ कौन.. यह भी रहता अस्पष्ट है
बस भीतर पुलक नहीं कोई कष्ट है
धरा बन जाती अनोखा रंगमंच
खो जाता पल भर को जैसे हर प्रपंच
वृक्ष देते ताल उस नृत्य के साथ
जो भीतर घटता
बदल जाता सब कुछ देखते-देखते
पर कोई नजर ना आता
कैसा अनोखा वह सुमिलन का क्षण
सज उठता अस्तित्त्व का कण-कण
भीतर-बाहर का रहता भेद नहीं कोई
एक अनंत की खुशबू रग-रग में समोई
शमा जली है जब जान जाता कोई यह
बन परवाना जल कर भी बचा ही रहता वह
थोथा उड़ गया तब सार ही शेष
हर श्वास हर क्षण लगता विशेष !

सोमवार, जून 5

राग मधुर भीतर जो बहता


राग मधुर भीतर जो बहता

क्या कहना अब क्या सुनना है
मौन हुए उसको गुनना है,
होकर भी जो नहीं हो रहा
उस हित भाव पुष्प चुनना है !

क्या चाहें किसको खोजें अब
अंतहीन तलाश हर निकली,
मिलकर भी जो नहीं मिला है
कदमों पर उसके झुकना है !

क्या पाना अब किसे सहेजें
किसका लोभ ? लाभ अब चाहें,
छूट रहा पल-पल यह जीवन
श्वासों का अंबर बुनना है !

राग मधुर भीतर जो बहता
जर्रा जर्रा जिसे समेटे,
हट जाना राहों से उसकी
अनायास उसको बहना है !

अंतर में जो दीप जल रहा
राह दिखाता वही अंत में,
रोशन कर दे कंटक सारे
एक-एक कर सब चुनना है !

सोमवार, मई 29

आँसू बनकर वही झर गया


आँसू बनकर वही झर गया


दुःख की नगरी में जा पहुँचे,
निकले थे सुख की तलाश में, 
अंधकार से भरे नयन हैं  
खोल दिये जब भी प्रकाश में ! 

फूल जान जिसे कंठ लगाया, 
काँटे बनकर वही बिँध गया,  
अधरों पर जो मिलन गीत था 
आँसू बनकर वही झर गया !

तलविहीन कूआं था कोई 
 किया समर्पित हृदय जिस द्वार,
जहाँ उड़ेला भाव प्रीत का 
पाषाण की निकली दीवार ! 

स्वप्न भरे थे जिस अंतर में,
सूना सा वह बना खंडहर
बात बिगड़ती बनते-बनते, 
दिल में पीड़ा बहे निरंतर ! 


शुक्रवार, मई 26

शस्य श्यामला मातरम्


शस्य श्यामला मातरम्

लबालब भरे हैं पोखर अमृत जल से
हरियाली का उतरा समुन्दर जैसे
दूर क्षितिज तक फैले गहरे हरे वन 
देख-देख ठंडक उतर जाती भीतर
कदली वन.. बांस के झुरमुट
धान और अरहर के खेत
कीचड़ सने पाँव कई गाते रहे होंगे गीत
सुंदर अरहर की पूलियां
मानो किसी चित्रकार की आकृतियाँ
नील गगन पर श्वेत मेघ की पूनियां
सुपारी के नारंगी फूल महकते 
पोखर में झाँकता गगन
वृक्षों-पादपों के मोहक प्रतिबिम्ब
मानो बालक-बालिकाएं पंक्तिबद्ध

सोमवार, मई 22

लहरें उठतीं अम्बर छूने


लहरें उठतीं अम्बर छूने


जग पल-पल रूप बदलता है 
कैसे नयनों में थिर होगा,
लहरें उठतीं अम्बर छूने
गिर जातीं सागर फिर होगा !

खो जाता ज्यों भोर  सितारा 
अस्त हो रहे प्राणी ऐसे, 
दृश्य बदलता पलक झपकते  
दुनिया रंगमंच हो जैसे !

विस्मयकारी जग का मालिक 
स्वयं छुपा है पट के पीछे,
अकुलाते यूँ व्याकुल प्राणी  
अभिनय को सत्य मान बैठे !

जब वही रूप धर कर आया 
फिर कौन यहाँ किससे आगे,
नन्हा सा कीट भी उसका है 
ब्रह्मा भी भज उसको जागे ! 

शुक्रवार, मई 19

उड़ न पाते हम गगन में



उड़ न पाते हम गगन  में

गुनगुनी सी आग भीतर 
कुनकुन सा मन का पानी, 
एक आशा ऊंघती सी 
रेंगती सी जिन्दगानी !

फिर भला क्यों कर मिलेगा 
तोहफा यह जिन्दगी का, 
इक कशिश ही, तपन गहरी 
पता देगी मंजिलों का !

जो जरा भी कीमती है 
मांगता है दृढ़ इरादे, 
एक ज्वाला हो अकंपित
 पूर्ण होते अटल वादे !

आज थम कर जरा सोचें 
 गर न हों अवरोध पथ में, 
बिन चुनौती, बिना प्रेरक
 उड़ न पाते हम गगन  में !

सोमवार, मई 15

कोई राग छिपा कण-कण में


कोई राग छिपा कण-कण में

पाहन में ज्यों छिपी अगन है
उर भावों में छिपी तपन है,
कस्तूरी सी महके भीतर,
घट-घट में जो बसी लगन है !

कोई राग छिपा कण-कण में
मृदु अनुराग बसा जीवन में,
मद्धिम-मद्धिम दीप जल रहा
इक  सुगंध  हर अंतर्मन में  !

एक अरूप रूप के भीतर
दृष्टा तकता एक निरंतर,
तम कितना भी घन छा जाए
हीरा एक चमकता भीतर  !

 देह धरा सी गगन सदा  मन
पंख लगा उड़ने को तत्पर,
एक संपदा लेकर आया,
खोल पोटली देखें थमकर !

शुक्रवार, मई 12

परम पूज्य सदगुरू के जन्मदिन पर



परम पूज्य सदगुरू के जन्मदिन पर 


खिलता कमल, पूनम का चाँद
अरुणिम सूर्य, नीला आकाश,
मंद समीर प्रातः का जैसे
सद्गगुरु बहता हुआ प्रकाश !

नयन बोलते, स्मित झरता है
मधुरिम आभा सँग-सँग डोले,
प्रश्न सभी गिर जाते मन के
वाणी राज जगत के खोले !

सुख-दुःख की सीमा दिखलाई
छोड़ दिया ले जा अनंत में,
उत्सव है जीवन का हर पल  
वही विराजे अंतरतम में !

सारे जग का मीत बना है
करुणा और ज्ञान का सागर,
उर कोमल, संकल्प लौह सा
प्रीत भरी ज्यों छलके गागर !

दुनिया के कोने-कोने में
 पहुँचाया संदेश प्रेम का,
द्रवित हुए पाहन से उर भी
दृष्टि मिली सत्य तभी प्रकटा !

जन्मदिवस पर गाता हर दिल
बार-बार आये यह शुभ दिन,
रहें सुवासित पाकर अंतर
ज्ञान पुष्प जो झरते निशदिन !





गुरुवार, मई 11

मन सिमटा आंगन में जैसे


मन सिमटा आंगन में जैसे


फिर घिर आये मेघ गगन पर
फिर गाए अकुलाई कोकिल,
मौसम लौट लौट आते हैं,
जीवन वर्तुल में खोया मन !  

वही आस सुख की पलती है
वही कामना दंश चुभोती,
मन सिमटा आंगन में जैसे
दीवारें चुन लीं विचार की !

मन शावक भी यदि निशंक हो,
 तोड़ कैद उन्मुक्त हुआ सा,
एक नजर भर उसे ताक ले
द्वार खुलेगा तब अनंत का !

निकट कहीं वंशी धुन बजती
टेर लगाता कोई गाये,
निज कोलाहल में डूबा जो  
रुनझुन से वंचित रह जाये !