बुधवार, फ़रवरी 14

इश्क की दास्ताँ





इश्क की दास्ताँ


उसने दिए थे हीरे हम कौड़ियाँ समझ के
जब नींद से जगाया रहे करवटें बदलते

ओढ़ा हुआ था तम का इक आवरण घना सा
माना  स्वयं  को घट इक जो ज्ञान से बना था

गीतों में प्रेम खोजा झाँका न दिल के भीतर
दरिया कई बसे थे बहता था इक समुन्दर

गहराइयों में दिल की इक रोशनी सदा है
उतरा नहीं जो डर से उस शख्स से जुदा है 

तनहा नहीं किसी को रखता जहाँ का मालिक
हर दिल में जाके पहले वह आप ही बसा है

जिस इश्क के तराने गाते हैं लोग मुस्का
मरके ही मिलता सांचा उस इश्क का पता 

उस एक का हुआ जो हर दिल का हाल जाने
सबको लगन है किसकी यह राज वही जाने

सोमवार, फ़रवरी 12

‘कुछ’ न होने में ही सुख है





‘कुछ’ न होने में ही सुख है 


‘कुछ’ होने की जिद में अकड़ा
फिर-फिर दुःख को कर में पकड़ा,
इक उलझन में हरदम जकड़ा
 क्यों न हो दिल टुकड़ा-टुकड़ा !

कुछ होकर भी देख लिया है
कुछ भी जैसे नहीं किया है,  
तृषित अधर सागर पिया है
 दिल का दामन नहीं सिया है !

‘कुछ’ ना होने में ही सुख है
मिट जाता जन्मों का दुःख है,
मुड़ा जिधर समीर का रुख है
सब उसका जो अंतर्मुख है !

सब कुछ ही हो जाना होगा
भेद हरेक मिटाना होगा,
लब पर यही तराना होगा
दिल तो वहीं लगाना होगा !

शुक्रवार, फ़रवरी 9

अनुरागी मन



अनुरागी मन

कैसे कहूँ उस डगर की बात
चलना छोड़ दिया जिस पर
अब याद नहीं
कितने कंटक थे और कब फूल खिले थे
 पंछी गीत गाते थे
या दानव भेस बदल आते थे
अब तो उड़ता है अनुरागी मन
भरोसे के पंखों पर
अब नहीं थकते पाँव
' न ही ढूँढनी पड़ती है छाँव
नहीं होती फिक्रें दुनिया की
 उससे नजर मिल गयी है
घर बैठे मिलता है हाल
सारी दूरी सिमट गयी है !

गुरुवार, फ़रवरी 8

शून्य और पूर्ण



शून्य और पूर्ण


 तज देता है पात शिशिर में पेड़
ठूंठ सा खड़ा होने की ताकत रखता है
 अर्पित करे निज आहुति
सृष्टि महायज्ञ में
नुकीली चुभन शीत की सहता है
भर जाता कोमल कोंपलों औ’ नव पल्लवों से
 बसंत में वही खिल उठता है
त्याग देता घरबार सन्यासी
स्वागत करने को हर द्वार आतुर होता है
पतझड़ के बाद ही आता है बसंत
समर्पण के बाद ही मिलता है अनंत
शून्य हो सका जो वह पूर्ण बनता है
हीरा ही वर्षों माटी में सनता है !


गुरुवार, फ़रवरी 1

कल जो चाहा आज मिला है

कल जो चाहा आज मिला है


भय खोने का, पाने का सुख
मन को डाँवाडोल करेगा,
अभय हृदय का, वैरागीपन
पंछियों में उड़ान भरेगा !

मंजिल की है चाह जिन्हें भी
कदमों को किसने रोका है,
बाधाएँ भी रची स्वयं ने
सिवा उसी के सब धोखा है !

कल जो चाहा आज मिला है
कौन शिकायत करता खुद की,
निज हाथों से पुल तोड़े हैं
नौका डूब रही अब मन की !

जीवन एक विमल दर्पण सा
जस का तस झलकाता जाता,
नयन मूंद ले कोई कितने
अंतर राग बरस ही जाता !

बुधवार, जनवरी 31

लहर उठी


लहर उठी

सहज तरंगित उच्छल ऊर्जित
लहर उठी विराट सागर में,
लक्ष्य नहीं है कोई जिसका
गिर जाती विलीन हो पल में !

छूता कोई दृश्य गगन का
कभी धरा हँसती अंतर में,
निज सृष्टि शुभा देख-देख ही
मुग्ध हो रहा कोई जग में !

कर वीणा तारों को झंकृत
हर्षित हो निनाद उपजाता,
सहज जगे जब पग में नर्तन
उर के भावों को दर्शाता !

 एक सत्य ही प्रकटे सब में
भाव जगें अंतर में ऐसे,
सहज ऊर्जा रवि बिखराता
 कृत्य झरें ऐसे ही जग में !

सोमवार, जनवरी 29

एक अजाना मौन कहीं है



एक अजाना मौन कहीं है


कभी उत्तंग नभ को छूतीं
कभी क्लांत हो तट पे सोतीं,
सागर को परिभाषित करतीं 
उन लहरों का स्रोत कहीं है !

कभी बुद्ध करुणानिधि बनता
रावण सा भी व्यर्थ गर्जता,
दुनिया जिसके बल पर चलती
उस मानव का अर्थ कहीं है !

अंतर को मधु से भर जाते
जोश बाजुओं में भर जाते,
विमल संग से हृदय पिघलता
उन गीतों का मर्म कहीं है !

भू की गहराई में सोया
नभ की ऊँचाई में खोया,
उर से जिसके शब्द फूटते
एक अजाना मौन कहीं है !

शुक्रवार, जनवरी 26

जैसे चन्द्र चमकता नभ में



गणतन्त्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित 

जैसे चन्द्र चमकता नभ में


भूमंडल पर देश सैकड़ों
भारत की है बात निराली,
जैसे चन्द्र चमकता नभ में
दिपदिप भारत की फुलवारी !

जिओ और जीने दो’ का यह   
मन्त्र सिखाता सारे जग को,
योग शक्ति से खुद को पायें
राह दिखाता हर मानव को !

प्रकृति का सम्मान करें सभी
शांति पाठ का गायन निशदिन,
मूषक, मोर, बैल वन्दित हैं
हर प्राणी का स्थान है उचित !

गौरवशाली परंपरा है
देवों से साहस पाता है,
सृष्टि के कई भेद जानता
युद्धों में गीता गाता है

मेधा, प्रज्ञा, समझ जगाता
सुप्त चेतना परम जगाकर,
दुनिया में परचम लहराता
वैदिक संस्कृति को पुनः लाकर !

भारत देश जवानों का है
श्रमिकों और किसानों का है,
जागरूक महिलाओं का भी
अलबेले दीवानों का है !

गुरुवार, जनवरी 25

विवाह की वर्षगांठ पर




आज छोटी बहन के विवाह की वर्षगांठ है, यह कविता उन सभी को समर्पित है जिनके विवाह की वर्षगांठ इस हफ्ते है.

विवाह की वर्षगांठ पर शुभकामनाओं सहित 

बरसों से ज्यों चल रहे, लिए हाथ में हाथ
राज खोलते हैं यही, जन्म-जन्म का साथ

इक दूजे का हौसला, इक दूजे का मान
बन सदा दिखलाया है, दिल से अपना जान

जो माँगा पाया सदा, पूर्ण हुई हर आस
आँगन में कलियाँ खिलीं, अंतर में विश्वास

सुर-तालों की साधना, मिल करता परिवार
खुशियाँ बाँटे जगत में, पा सुख का आधार

तन-मन दोनों स्वस्थ हों, और आत्मा पूर्ण
यही दुआ इस सुदिन पर, जीवन हो सम्पूर्ण

मंगलवार, जनवरी 23

सारा आकाश मिला है




सारा आकाश मिला है


शब्दों के पंख मिले हैं
सारा आकाश मिला है,
दिल में इक विरह अनोखा
रब में विश्वास मिला है !

पलकों में मोती पलते
नयनों में दीप संवरते,
अधरों पर गीत मिलन के
राहों में रहे बिखरते !

अंतर में अभिलाषा है
खिलने की शुभ आशा है,
बाहर आने को आतुर
बचकानी सी भाषा है ! 

शुक्रवार, जनवरी 12

कदमों में भी राहें हैं



कदमों में भी राहें हैं

अभी जुम्बिश भुजाओं में
कदगों में भी राहें हैं,
अभी है हौसला दिल में
गंतव्य पर निगाहें हैं !

परम  दिन-रात रचता है
जगती नित नूतन सजती,
नींदों में सपन भेजे
जागरण में धुनें बजतीं !

चलें, हम थाम लें दामन
इसी पल को अमर कर लें,
छुपा है गर्भ में जिसके
उसे देखें, नजर भर लें !

अभी झरने दें शब्दों को
प्रस्तर क्यों बनें पथ में,
सृजन का स्रोत है अविचल
बहाने दें सहज जग में !

अभी मुखरित तराने हों
विरह के भी प्रणय के भी,
किसी के अश्रु थम जाएँ
वेदना  से विजय के भी !

नहीं रुकना नहीं थमना
अभी तो दूर जाना है,
जिसे अपना बनाया है
उसे जग में लुटाना है !


मंगलवार, दिसंबर 26

नया वर्ष आने वाला है



नया वर्ष आने वाला है

शब्दों में यदि पंख लगे हों
उड़ कर ये तुम तक जा पहुँचें,
छा जाएँ इक सुख बदली से
भाव अमित जो पल-पल उमगें !

एक विशाल लहर सागर सम
अंतरिक्ष में नाद उमड़ता,
हुआ तरंगित कण-कण भू का
आह्लाद अम्बर तक फैला  !

आगत का स्वागत करने को
 उत्सुक हैं अब दसों दिशाएं,
करें सभी शुभ अभिलाषा जब
कंठ कोटि मंगल ध्वनि गायें !

हर पल मन अभिनव हो झूमे
नित नूतन ज्यों भोर सँवरती,
बाँध सके नहीं कोई ठौर
कहाँ कैद कुसुमों में सुगन्धि !

मंगलवार, दिसंबर 19

जो कहा नहीं पर सुना गया

जो कहा नहीं पर सुना गया


शब्दों में ढाल न पाएँगे
जो जाम पिलाये मस्ती के,
कुदरत बिन बोले भर देती
मृदु मौन झर रहा अम्बर से !

मदमस्त हुआ आलम सारा
कुछ गमक उठी कुछ महक जगी,
तितली भँवरों के झुंड बढ़े
कुसुमों ने पलकें क्या खोलीं !

नयनों से कोई झाँक रहा
जाने किस गहरे अन्तस् से,
कानों में पड़ी पुकार मधुर
इक अनजानी सी मंजिल से !

जो कहा नहीं पर सुना गया
इक गीत गूँजता कण-कण में
जो छिपा नहीं पर प्रकट न हो
बाँधें कोई उस बंधन में !

वह पल होते अनमोल यहाँ
खो जाये मन जब खुद ही में,
मिटकर पा लेता कुछ ऐसा
झलके जीवन की गरिमा में !

शुक्रवार, दिसंबर 15

कितनी धूप छुए बिन गुजरी


कितनी धूप छुए बिन गुजरी


कितना नीर बहा अम्बर से
कितने कुसुम उगे उपवन में,
बिना खिले ही दफन हो गयीं
कितनी मुस्कानें अंतर में !

कितनी धूप छुए बिन गुजरी
कितना गगन न आया हिस्से,
मुंदे नयन रहे कर्ण अनसुने
बुन सकते थे कितने किस्से !

कितने दिवस डाकिया लाया
कहाँ खो गये बिन बाँचे ही,
कितनी रातें सूनी बीतीं
कल के स्वप्न बिना देखे ही !  

नहीं किसी की राह देखता
समय अश्व दौड़े जाता है,
कोई कान धरे न उस पर
सुमधुर गीत रचे जाता है !