मंगलवार, सितंबर 2

गंगा बहकर जाये सागर

गंगा बहकर जाये सागर


घोर घटाओं में विद्युत् जब
चमक चमक लहरा कर गाती,
गिरने लगतीं बूंदें तड़ तड़
गर्जन घन की नहीं डराती !

घटाटोप सा छाता नभ पर
खो जाती वह शुभ्र नीलिमा,
दूर कहीं से हंसों की इक
पंक्ति फर से उड़ती जाती !

पवन भीग कर थिर हो जाता
हौले-हौले पात डोलते,
चहबच्चों में भर जाता जल
बूँदें गिर कर वृत्त बनातीं !

कुछ निशब्द घास पर गिरतीं
धातु पर कुछ शोर मचातीं,
ध्वनि अनेक जल धार एक है
हर शै उसकी गाथा गाती !

वृष्टि का क्रम चलता अविरत
धरा लहक लहक मुस्काती,
गंगा बहकर जाये सागर
सागर से ही जल भर लाती !




सोमवार, सितंबर 1

कौन हो तुम

कौन हो तुम 

मृत्यु पाश में पड़ा
एक देह छोड़
अभी सम्भल ही रहा था...
कि गहन अंधकार में बोया गया
नयी देह धरा में
शापित था रहने को
उसी कन्दरा में
बंद कोटर में हो जाये ज्यों पखेरू
कैद पिंजर में हो जाये कोई पशु
एक युग के समान था
वह नौ महीनों का समय...

...और फिर आया.. मुक्ति का क्षण..
अपार पीड़ा के बाद
हुआ प्रकाश का दर्शन
मुंद-मुंद जाती थीं आँखें
और तब पेट में पहली बार
उठी वह मरोड़..
मांग हुई भोजन की
कोमल स्पर्श, ऊष्मा और गर्म पेय
पाकर तृप्त हुआ तन
और पड़ा मन पर एक नया संस्कार
रख दी गयी थी नींव उसी क्षण..
एक और जन्म की..
स्मृतियाँ पूर्व की
होने लगीं गड्ड मड्ड
पहचान में आने लगे नए चेहरे
बाल... किशोर.. युवा होते होते
मन ने छोड़ दिया आश्रय मेरा
जैसे छोड़ जाते हैं घरौंदा, पक्षी शावक
हो गया कैद अपने ही कारावास में
जिसकी दीवारें थीं
ऊँची और ऊँची होती हुई महत्वाकांक्षाएं..
कामनाओं.. और लालसाओं.. की छत के नीचे
विषय रूपी चारे को चुग कर
फंसता गया जाल में वह एक नादान पंछी की नाईं
जैसे किसी निर्जन द्वीप पर अकेला फेंक
दिया गया हो
कैद था मन अपने ही भीतर
और यहाँ बात कुछ महीनों की नहीं थी...
जैसे वीणा के टूटे तार
व्यर्थ हैं, व्यर्थ है खाली गागर
व्यर्थ ही बुन रहा था
जाल सपनों के...
और एक दिन..
वह चुप था बेखबर अपने आप से
मैंने झाँका..
उसे खबर तक न हुई मेरे आने की
वरना झट धकेल दिया जाता
मैं उसके साम्राज्य से
मैंने पीछे से समेट लिया उसे
सकपकाया सा बोला, क्या करते हो ?
बुद्धि भी चकराई
उसे यह हरकत पसंद न आई
मैंने सुनी अनसुनी कर दी
क्योकि मन पिघल रहा था मेरे सान्निध्य में
कुछ देर ही चला यह खेल
फिर मैं लौट आया
लेकिन अब मुझे जब-तब सुनाई देती एक पुकार
मन की पुकार
जो पहली बार तृप्त हुआ था मुझसे मिलकर
तुम कौन हो ?
कौन हो तुम ?
कहाँ हो ?
फुसफुसाता हूँ मैं, सुनो
मैं तुम हूँ
मैं वही चेतना हूँ
जो विचार बन कर दौड़ रही है
श्वास बन कर जीवित है
मैं अनंत प्रेम, अनंत शांति और अनंत आनंद हूँ...
लेकिन मेरी आवाज नहीं सुन पाता मन...
कोई सुख बिना कीमत चुकाए नहीं मिलता
प्रतिष्ठा बढ़ाने को बोले गए झूठ
किये गए फरेब
कर्मों के जाल में कैद हुआ
व्यर्थ के मोह जाल में फंसा
असूया के पंक में धंसा
सुख पाने की आकांक्षा में
बोता गया दुःख के बीज...
मन द्वन्द्वों का दूसरा नाम है..
कभी कभी थक कर पुकार लेता है मुझे
और पश्चाताप कर हो जाता है नया
पुनः एक नया खेल खेलने के लिये...
मैं प्रतीक्षा रत हूँ
कब थकेगा वह
कब लौटेगा मुझ तक
कब ..?


रविवार, अगस्त 31

कोई सागर रहता है

कोई सागर रहता है



नयनों से जो खारा पानी
हर्ष-विषाद में बहता है,
खबर सुनाता, सबके भीतर
कोई सागर रहता है !

सुनना होगा उन लहरों को
अंतर में जो बांच रहीं,
देख आत्मा के चंदा को
देखो कैसे नाच रहीं !

सागर तट पर रहते आये
गहराई में चमचम मोती,
डूब गया मन जिसका उसमें
स्वर्णिम, स्वर्गिक मिलती ज्योति !

शंका और समर्पण जब तक
दो पतवार रहेंगी संग-संग,
डांवाडोल रहेगी नौका
जीवन सागर के जल में !




शनिवार, अगस्त 30

साझीदार


साझीदार


परमात्मा को हटा दें तो
इस जगत में बचता ही क्या है ?
उसका ऐश्वर्य !
उसकी विभूतियाँ और अनंत साम्राज्य !
मानव चाहे तो बन सकता है
उसका साझीदार
अन्यथा रह सकता है मात्र पहरेदार !
चुनना है उसे
मान अपना निहारना
या पुकारना
(जैसे कि वह कहीं दूर हो)
भीतर झाँकते ही द्वार खुलने लगता है
जैसे जल में डोलती नौका को
 मिल जाता है आधार
अथवा तो कम्पित उर को
आश्वस्ति भरा स्वीकर
प्रेम को हटा दें तो
जीवन में बचता ही क्या है ?
उसका अपनापन ! आत्मीयता और दुलार !
उसका अनंत फैलाव
मानव चाहे तो खो सकता है
अपना अहंकार
अन्यथा करता रह सकता है
संबंधों में व्यापार !

शुक्रवार, अगस्त 29

गणपति का आगमन


गणपति का आगमन



जब ठहर जाएगा मन अपने आप में
जब मिलन होगा शक्ति का शिव से
तब गणपति का आगमन होगा भीतर
अभी तो दौड़ रहा है हजार-हजार रूपों में बाहर  
एक दिन तो थक जायेगा
उसके बाद भी हवाएं स्पर्श करेंगी पर उसमें
शुभता की खबर होगी
पंछी बोलेंगे पर उसमें विघ्नहर्ता का स्तवन होगा
स्वाद मोदकों का मधुतर हो जाएगा
उनमें उसका स्वाद भी मिल जायेगा
तब जीवन का अर्थ मिलता है
जब किसी के अंतर में यह मिलन घटता है !


गुरुवार, अगस्त 28

वर्तन सृष्टि का

वर्तन सृष्टि का


माँ की गोद की तरह थामे है धरा
आकाश सम्भाले है पिता के हाथ की मानिंद
मखमली गलीचों से बढ़कर
कोमल दूब का स्पर्श
जो भर जाता है एक अहसास आनिंद !
स्वर्ग और कहाँ होगा कभी ?
नाचते हुए मोर देखे हैं अभी  
सुनी है पंछियों की रुनझुन
रंगो का यह अनोखा फैलाव
सागर का उतार और चढ़ाव
झुकता हर शाम लाल फूल
पर्वतों के पीछे उन अदृश्य चरणों पर
अनुपम है चमकीले सितारों का झुरमुट
कैसा अनोखा यह वर्तन सृष्टि का
खो जाता संसार और हर तरफ
है जलवा उसी का !  

बुधवार, अगस्त 27

ये जो सामने

ये जो सामने

नीला आकाश दिख रहा है
श्वेत हल्के मेघों से आवृत
जिसमें अभी-अभी एक पंछी तिरता हुआ
निकल गया है
जिसको छूने की होड़ में
बढ़ती चली जाती है
धरा की कोख से उगी हरियाली
ऊंचे वृक्षों की कतारें
रोकती हैं दृष्टि पथ
क्षितिज का
जिसके नीचे मंडरा रही हैं
 तितलियाँ सुमनों पर
ये गवाह है
अनगिनत सृष्टियों का
अथवा तो घट रहा है इसके नीचे
हर युग.. एक साथ.. अभी इस क्षण !
क्यों कि अनंत है आकाश
कालातीत और भविष्य द्रष्टा भी !


मंगलवार, अगस्त 26

ये नन्ही नन्ही चिड़ियाएँ


ये नन्ही नन्ही चिड़ियाएँ


श्वेत और श्याम पर हैं जिनके
चुन-चुन कर लाती है घास की लतरें
छोड़ आती हैं एक घन वृक्ष की
शाखाओं और पत्तियों में
एक नीड़ का फिर निर्माण हो रहा है
सृष्टि चक्र यूँ ही बहा जा रहा है
तांक-झांक करता है काग एक वहाँ आकर
जाने क्यों चिड़ियाएँ अगले ही पल नजर नहीं आतीं
शायद गयी हैं दूर लम्बी उड़ान पर
अथवा तो खोज में किसी कीट या पदार्थ के ! 

रविवार, अगस्त 24

सत्य से पहचान

सत्य से पहचान 



झूठ से ही परिभाषित करते हैं  
‘स्वयं’ को जब हम
तब छले जाते हैं बार-बार
“जो है” जब उस पर नजर नहीं जाती
‘जो होना चाहते हैं’ की चाह में जले जाते हैं
“जो है” शुभ है, सुंदर है, सत्य है
इसे भुलाकर
घेर लेते हैं अपने चारों पर एक असत्य
व्यर्थ ही कैद होते हैं पिंजरों में
और झूठी आशा में जिए जाते हैं  
 ‘स्वयं’ को करते सीमाओं में कैद
 मन, कभी अहंकार के हाथों
अपने ही मूल को डसते हैं
जाने कैसा रोग लगा है
‘जो है’ स्वीकार करना नहीं सीखा
सच के आईने में स्वयं को अभी नहीं देखा
मृण्मय है जो माया
उसको तो हमने बहुत सजाया
सम्मान के लोभ में  
खुद को कहीं पीछे छोड़ आये
एक बेहोशी के आलम में
स्वप्नों की दुनिया बसाना चाहते हम
सत्य से हर बार बच कर निकल आये 
समिधा बनेगा अंतर का हर भाव 
यहाँ तक कि हर दुराव व छिपाव 
स्वयं की अग्नि तभी होगी दीप्त 
छा जायेंगे मेघ चिदाकाश में 
सत्य बरसेगा !
अतीत, वर्तमान, व भविष्य 
गायेंगे जब समवेत स्वरों में 
जीवन की ऋचाएं 
मन वर्तिका जलेगी ज्ञानाग्नि में 
यज्ञ पुरुष सत्य बन प्रकटेगा !




शुक्रवार, अगस्त 22

जब

जब



औघट राह टूटा कगार
थाह नहीं पाए कोई,
कंटक पथ पथराये नैना
पार कहाँ जाये कोई !

मति कुंठित सोया विवेक
जब, कुंद हुई दृष्टि सबकी,
हित अनहित भी नहीं सूझता
क्षार हुई सृष्टि मन की !

हृदय भ्रमित गान अधूरा
स्वप्न खंडित सा कोई,
कहाँ जाना ? किसे जाना ?
जानता यह कहाँ कोई ! 

गुरुवार, अगस्त 21

जगे नयना इस जतन में

जगे नयना इस जतन में

शब्द चुन-चुन के सजाए
भाव के दीपक जलाए,
पहर बीते सो न पाए
गीत एक जन्मा था तब !

कुछ घटेगा आस मन में
तम छंटेगा इस चमन में,
जगे नयना इस जतन में
प्रीत इक जन्मी थी तब !

है नहीं जो वही तो है
शै दिखे जो यही तो है,
जिसे ढूँढे कहीं तो है
विश्वास इक जन्मा था तब !  


बुधवार, अगस्त 20

फिर भी अनछूया ही रहता



फिर भी अनछूया ही रहता


हर शब्द तुझे इंगित करता
हर भाव तुझे मन में भरता,
हर भाषा तुझे ही गाती है
फिर भी अनछूया ही रहता !

साँझ-सवेरे, विपिन घनेरे
पंकज पादप, मानुष चेहरे,
सब तेरी ही कथा सुनाते
दिवस मनोहर घोर अँधेरे !

मलयज बन वन-वन डोल रहा
शशि मुख से बदली खोल रहा
तू पुहिन बिंदु बन कर ढुलका
जल में जीवन रस घोल रहा !