सोमवार, दिसंबर 22

उजाले से पीठ

उजाले से पीठ


पूर्व दिशा में ही उगा था ज्ञान का सूरज
जो आया इधर उसने जगमगा लीं अपनी राहें !
क्यों अँधेरे में रहे चले जाते हैं कुछ लोग
नहीं कि उन्हें जरूरत नहीं है रौशनी की
या कि चुंधिया जाती हैं उनकी आँखें
उजाले की चमक से
बस अभ्यास हो गया है उन्हें अन्धेरों का
वे छोड़ नहीं पाते काले लिबास
जिसपर कितने ही धब्बे लगें दिखाई नहीं देते
भय लगता है उन्हें श्वेत परिधान से
जिस पर लगा एक छींटा भी
कर सकता है उन्हें शर्मिंदा
अमरत्व की विरासत मिली है जिन्हें
मारकर दूसरों को कहलाते स्वयं को जिन्दा !

शुक्रवार, दिसंबर 19

मन को जरा पतंगा कर ले

मन को जरा पतंगा कर ले

तू ही मार्ग, मुसाफिर भी तू
तू ही पथ के कंटक बनता,
तू ही लक्ष्य यात्रा का है
फिर क्यों खुद का रोके रस्ता !

मस्ती की नदिया बन जा मिल
तू आनंद प्रेम का सागर,
कौन से सुख की आस लगाये
तकता दिल की खाली गागर !

सूर्य उगा है नीले नभ में
खिडकी खोल उजाला भर ले,
दीप जल रहा तेरे भीतर
मन को जरा पतंगा कर ले !

मन की धारा सूख गयी है
कितने मरुथल, बीहड़ वन भी,
राधा बन के उसे मोड़ ले
खिल-खिल जायेंगे उपवन भी !

एक पुकार मिलन की जागे
खुद से मिलकर जग को पाले,
सहज गूंजता कण कण में जो
उस पावन मुखड़े  को गाले !


मंगलवार, दिसंबर 16

पलट गया है मन

पलट गया है मन



तृप्ति की शाल ओढ़े
सिमट गया है मन
दौड़-भाग बंद हुई
खत्म हुआ खेल सब
देखो कैसे मौन हुआ
खुल गयी पोल जब
बातें बड़ी बनाता था
सपने दिखाता था
स्वयं ही बना कर महल
खुद ही गिराता था
घर का पता मिल गया
लौट गया है मन
झूठी थीं शिकायतें
झूठे ही आरोप सब
कुर्सी बचाने को
लगाये प्रत्यारोप सब
राई का पर्वत बना
स्वयं भला बना कभी
दूजों की टांग खींची
बाल की खाल भी
राज सारे खुल गए
पलट गया है मन !

शुक्रवार, दिसंबर 12

इक अकुलाहट प्राणों में

इक अकुलाहट प्राणों में


इक दर्द की चाहत की है
जो मन को बेसुध कर दे,
कुछ कहने, कुछ न कहने
दोनों का अंतर भर दे !

इक पीड़ा मांगी उर ने
जो भीतर तक छा जाये,
फिर वह सब जो आतुर
है, आने को बाहर आये !

इक बेचैनी सी हर पल
मन में सुगबुग करती हो,
इस रीते अंतर्मन का
कुछ खालीपन भरती हो !

इक अकुलाहट प्राणों में
इक प्यास हृदय में जागे,
सीधे सपाट मरुथल में
चंचल हरिणी सी भागे !


बुधवार, दिसंबर 10

जिन्दगी


जिन्दगी

खुद से खुद की पहचान हो गयी
जिन्दगी सुबह की अजान हो गयी

जिनको पड़ोसियों से भी गुरेज हुआ करता था
सारे जहान से जान-पहचान हो गयी

आंसुओं से भीगा रहता था दामन
हर अदा अब उनकी मुस्कान हो गयी

दिलोजां लुटे जाते हैं जमाने पर
दिल से हर शिकायत अनजान हो गयी

फासले खुद से थे हर दर्द का सबब
सुलह खुदबखुद सबके दरम्यान हो गयी



सोमवार, दिसंबर 8

दुःख की ही गाथा बनती है

दुःख की ही गाथा बनती है



मौन हुए स्वर, सूना अंतर
फिर भी सब पाया लगता है,
अब जब लिखने की फुर्सत है
मन का घट खाली लगता है !

टूटी जब से दुःख की गागर
गीत विरह के भी छूटे,
चाह मिटी जब अंतर मन से
स्वप्न हृदय के सब रूठे !

दुःख की ही गाथा बनती है
सुख तो खाली हाथ खड़ा,
कलम थमी अब शब्द न मिलते
भीतर है आराम बड़ा !

नहीं शिकायत कोई जग से
अब क्या शायर गजल कहे,
मीत छिपा है अपने घर में
अब क्यों बिरहन पीर सहे !

अब तो चैन पड़ा है दिल को
कागज कोरा ही रह जाता,
तृप्त हुआ है पंछी मन का,
अब न कहीं दौड़ा जाता !

गुरुवार, दिसंबर 4

विश्व विकलांग दिवस पर



मृणाल ज्योति – एक आश्वास

दुलियाजान, कुमुद नगर स्थित गैर सरकारी संस्था मृणाल ज्योति आज एक चिर परिचित नाम है, जो पिछले पन्द्रह वर्षों से विशेष बच्चों की सहायता में जीजान से संलग्न है. इस समय यहाँ के स्कूल में एक सौ चालीस बच्चे पढ़ते हैं. जिनमें से सतासी छात्र तथा चौसठ छात्राएँ हैं. यहाँ मानसिक रूप से अविकसित विद्यार्थियों की संख्या छियासठ है तथा सुनने-बोलने में बाधित उन्नीस बच्चे हैं. चार छात्र ऐसे हैं जिन्हें शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार की बाध्यता है. सतावन सेरीब्रल पालसी से बाधित हैं.  चार ऑटिस्टिक हैं   तथा एक  लोकोमोटर बाध्यता से ग्रस्त है. इन सभी प्रकार के बच्चों के पूर्ण विकास के लिए हर सम्भव प्रयास किया जाता है. उन्हें रोजमर्रा के कार्यों के योग्य बनाया जाता है. उन्हें स्वच्छता तथा सामान्य व्यवहार की शिक्षा दी जाती है. कला तथा नृत्य के माध्यम से उनमें आत्मविश्वास जागृत किया जाता है. विभिन्न हुनर सिखाकर उन्हें भविष्य में आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी जाती है. यहाँ कक्षा आठ तक की शिक्षा का प्रबंध भी है. जो बच्चे सामान्य स्कूल में जाने के योग्य हो जाते हैं उन्हें स्थानांतरित कर दिया जाता है. अठारह वर्ष तक उन्हें यहाँ रखा जा सकता है, इसके बाद वे यदि चाहें तो कुछ वर्ष और भी रुक सकते हैं. माता-पिता का सहयोग मिले तो ये बच्चे भविष्य में अपना रोजगार भी शुरू कर सकते हैं और किसी हद तक एक सम्मानजनक सामान्य जीवन जी सकते हैं. किन्तु देखा गया है जब इस स्कूल में सीख कर बच्चे अपना दैनिक क्रियाकलाप करने योग्य हो जाते हैं तो माता-पिता उन्हें स्कूल भेजना बंद ही कर देते हैं और कुछ ही दिनों में बच्चे सीखा हुआ भी भूल जाते हैं और पुनः उसी स्थिति में पहुंच जाते हैं जहाँ वे पहले-पहल आए थे. इसलिए मृणाल ज्योति ने समय-समय पर माता-पिताओं को भी प्रशिक्षण देना आरम्भ किया है.
बदलते हुए समय के साथ आज समाज में इनके जैसे व्यक्तियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता. यदि इन्हें अपने अधिकारों से रूबरू कराया जाये और सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर प्रदान किये जाएँ तो ये बच्चे भी बहुत कुछ कर के दिखा सकते हैं. देखा जाये तो कमी किस इन्सान में नहीं है. समाज में कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जो शारीरिक व मानसिक रूप से पूरे सक्षम हैं पर समाज पर बोझ हैं, यदि वे किसी नशे की आदत के शिकार हैं या अपराधी प्रवृत्ति के हैं. जबकि ये बच्चे यदि इन्हें विशेष शिक्षा दी जाये समय पर उचित सहायता दी जाये तो राष्ट्र के विकास में अपनी भूमिका निभा सकते हैं. यह सही है कि समाज से विकलांगता को पूरी तरह मिटाया तो नहीं जा सकता पर इसे अभिशाप समझने की मानसिकता से बचा अवश्य जा सकता है. किसी भी कीमत पर इन्हें हीन भावना का शिकार नहीं होने देना है. प्यार और स्नेह से इन्हें सींचना है और बदले में इनके प्रेम को महसूस करना है. हर तरह से प्रोत्साहित करना है न कि इन्हें उपहास का पात्र समझना है. शारीरिक अक्षमता का यह अर्थ नहीं कि कोई मानसिक रूप से भी अक्षम है, इनमें भी भावनाएं हैं. इन्हें भी बराबरी से जीने का हक है.

सरकार ने भी ऐसे बच्चों के लिए कई योजनाये बनायी हैं. समान अवसर देना, अधिकारों की रक्षा करना और पूर्ण सहभागिता विकलांग व्यक्ति अधिनियम के अंतर्गत आते हैं. समय-समय पर सरकार द्वारा सहायक उपकरण प्रदान किये जाते हैं, छात्र वृत्तियाँ और पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं. शासकीय नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था भी है. समाज का कर्त्तव्य है कि इनमें आत्मविश्वास जगाकर आत्मनिर्भर बनाने में मदद करे और सामान्य जीवन जीने का जज्बा पैदा करे. मृणाल ज्योति संस्था इनके पुनर्वास के लिए अनथक काम कर रही है और भविष्य में भी करती रहेगी.      

मंगलवार, दिसंबर 2

शांत झील के दर्पण पर

शांत झील के दर्पण पर



जैसे कोई फूलों वाली
डाल अचानक झर जाए,
या फिर तपती भू पर बादल
बरबस यूँ ही बरस जाए !

हो निस्तब्ध रात्रि बेला
बिखरी हो ज्योत्स्ना मधुरिम,
शांत झील के दर्पण पर या
सोया हो पंकज रक्तिम !

नील गगन में ओढ़े बदली
लुक-छुप नाज दिखाए चंदा,
भोर अभी होने को ही हो
पंछी का हो स्वर मंदा !

वैसा ही उसका आना है
बरसों जिसे पुकारा पाहुन,
उर उपवन दिप-दिप कर झूमे   
मदमाता मन का प्रांगण !

शनिवार, नवंबर 29

मुट्ठी में सिमटी रेत ज्यों

मुट्ठी में सिमटी रेत ज्यों


हर कहानी है अधूरी
हर मन यहाँ कुछ खोजता,
रहता सदा अपूर्ण जग
मंजिल मिलेगी सोचता !

सीलें इधर सीलें उधर
पैबंद ही हैं हर तरफ,
पांव सिकोड़ें सिर खुले
धुंधले पड़ें जीवन हरफ !

मुट्ठी में सिमटी रेत ज्यों
थामें इसे, वह छूटता,
सोना नहीं पीतल था वह
हर भ्रम यहाँ है टूटता !

मिलती नहीं जग में कभी
जिस जीत की तलाश है
अपने ही भीतर झांक लें
खोलें उसे जो पाश है !


सोमवार, नवंबर 24

चम्पा सा खिल जाने दें मन

चम्पा सा खिल जाने दें मन

चलो उठें, अब बहुत सो लिये
सुख स्वप्नों में बहुत खो लिये, 
दुःख दारुण पर बहुत रो लिये
अश्रु से पट बहुत धो लिये !

उठें, करवटें लेना छोड़ें
दोष भाग्य को देना छोड़ें,
नाव किनारे खेना छोड़ें
दिवा स्वप्न को सेना छोड़ें !

जागें दिन चढ़ने को आया
श्रम सूरज बढ़ने को आया,
नई राह गढ़ने को आया
देव हमें पढ़ने को आया !

होने आये जो हो जाएँ
अब न खुद से नजर चुराएँ,
बल भीतर है बहुत जगाएँ
झूठ-मूठ न देर लगाएँ !

नदिया सा बह जाने दें मन
हो वाष्प उड़ जाने दें मन,
चम्पा सा खिल जाने दें मन
लहर लहर लहराने दें मन ! 

शुक्रवार, नवंबर 21

कोई दूर खड़ा दे आमन्त्रण

कोई दूर खड़ा दे आमन्त्रण



हर मिलन अधूरा ही रहता
हर उत्सव फीका लगता है,
कितना ही भरना चाहा हो
तुझ बिन घट रीता लगता है !

ज्यों बरस-बरस खाली बादल
चुपचाप गगन में खो जाते,
कह-सुन जीवन भर हम मानव
इक गहन नींद में सो जाते !

कितनीं मनहर शामें देखीं
कितनी भोरों को मन चहके,
सूनापन घिर-घिर आता फिर
कितने हों वन –उपवन महके !

कोई दूर खड़ा दे आमन्त्रण
पर नजर नहीं वह आता है,
जाने किस लोक का वासी है
जाने किस सुर में गाता है !

पलकें हो जाती हैं भारी
नीदों में स्वप्न जगाते हैं,
इक भ्रम सा होता मिलने का
जब भोर जगे मुस्काते हैं !

   

मंगलवार, नवंबर 18

हरियाली का गांव अनोखा

हरियाली का गांव अनोखा



खिले गुलाब, मालती, बेला, फुदक रहा खगों का मेला
रह-रह गूंजे कलरव मद्धम, कहीं भ्रमर का अविरत सरगम I

हरियाली का गांव अनोखा
अंतरिक्ष में नील झरोखा
गौरेया उड़ आती ऐसे
शीतल कोई हवा का झोंका

आड़े-तिरछे डाल वृक्ष के, झुरमुट कहीं दीर्घ बांस के
हल्की-हल्की तपन पवन में, छुपा सूर्य घन पीछे नभ में 

अनगिन फूल हजारों वर्ण
भांति-भांति के धारे पर्ण
अमलतास का पीतवर्ण लख
रक्तिम स्वाद गुलमोहर का चख

प्रकृति मोहक भरी दोपहरी, सुंदरता हर सूं है बिखरी
रह-रह मौन टूटता प्रहरी, गूंज उठे कोई स्वर लहरी 

नन्हा सा एक नील पुष्प भी
कह जाता सब मौन खड़ा सा
पोखर से उगती कुमुदिनी
या फिर कोई कमल बड़ा सा

गोल, नुकीले, सूक्ष्म, कंटीले, धानी, हरे, बैंगनी, पीले
जाने कितने आकारों में, पत्र वृक्ष के ह्ज्जारों में 

कोमल स्पर्श कभी तीक्ष्ण भी
शीतल मौसम कभी उष्ण भी
प्रकृति का भंडार अपरिमित
अनंत वहाँ सब, कुछ न सीमित

लुटा रहा दोनों हाथों से, दूर कहीं से कोषाध्यक्ष
नहीं खत्म होने को आता, पुरुष छुपा प्रकृति प्रत्यक्ष 

शनिवार, नवंबर 15

तृषा जगाये हृदय अधीर

तृषा जगाये हृदय अधीर


वरदानों की झड़ी लगी है
देखो टपके मधुरिम ताप,
अनदेखा कोई लिपटा है
घुल जाता हर इक संताप !

गूँज रहे खग स्वर अम्बर में
मदिर गंध ले बहा समीर,
पुलक जगी तृण-तृण में कैसी
तृषा जगाये हृदय अधीर !

मौन हुआ है मेघ खो गया
नील सपाट हुआ नभ सारा,
तुहिन बरसता दोनों बेला
पोषित हर नव पादप होता !

प्रकृति अपने कोष खोलती
हुई खत्म मेघों की पारी,
गंध लुटाने, पुष्प खिलाने
आयी अब वसुधा की बारी !