गुरुवार, अप्रैल 9

नींद


नींद 


कल रात फिर नींद नहीं आयी 
नींद आती है चुपचाप 
दबे पावों... और कब छा जाती है 
पता ही नहीं लगने देती 
कई बार सोचा 
नींद से हो मुलाकात 
कुछ करें उससे दिल की बात 
प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा थी 
उसके आने की कहीं दूर-दूर तक आहट नहीं थी 
नींद आने से पहले ही होश को सुला देती है 
स्वप्नों में खुद को भुला देती है 
कभी पलक मूँदते ही छा जाती है खुमारी 
अब जब करते हैं उसके स्वागत की तैयारी
तो वह छल करती है 
वही तो है जो रात भर तन में बल भरती है 
चहुँ ओर दौड़ते मन को चंद घड़ी देती है विश्राम 
जहाँ इच्छाओं का जमावड़ा बना ही रहता है 
कोई न कोई अड़ियल ख्याल खड़ा ही रहता है 
जहाँ विचारों के हवा-महल बनते बिगड़ते हैं 
पल में ही मन के उपवन खिलते-उजड़ते हैं 
नींद की देवी चंद घड़ियां अपनी छाया में पनाह देती है 
पर कल रात वह रुष्ट थी क्या 
जो भटके मन को घर लौटने की राह देती है ! 


बुधवार, अप्रैल 8

सत्य होती कल्पना भी

सत्य होती कल्पना भी

स्वप्न में हम सृष्टि रचते निज भयों को रूप देते, खुद सिहरते, व्यर्थ डरते जागकर फिर खूब हँसते ! मनोमयी, भावनामयी जाग कर भी सृष्टि रचते, निज सुखों को पोषते या दुःखों की गाथा बनाते ! शब्द साझे हैं सभी के उन्हीं से हम मित्र बनते, चुन नुकीले शब्द सायक शत्रुता अथवा रचाते ! कल्पना थी जो मनों की आज उसने रूप धारा, डोलते मन व्यर्थ खुद को डाल देते अतल कारा ! हैं कहीं हथियार जैविक आदमी ने ही बनाये, सत्य होती कल्पना भी वक्त यह सबको सिखाये !

मंगलवार, अप्रैल 7

कौन भला बाहर जा भटके


कौन भला  बाहर जा भटके


छाया कैसा मौन कारुणिक 
शब्द खो गए इस पीड़ा में, 
ठहरे हैं जन जो डूबे थे  
जग की मनमोहक क्रीड़ा में  !

थमी जिंदगी सी लगती है 
दुःख है, दुःख का कारण भी है 
जूझ रहा है विश्व समूचा 
करोना का निवारण भी है ?

हाँ, पीड़ित है जन-जन इससे 
आकुल होते मन भी पूछें, 
कब तक आखिर कब तक दुनिया
आहत होकर इससे जूझे !

इक ही हल जो नजर आ रहा 
अपने-अपने घर में सिमटें,
जीवन-मरण का जहाँ सवाल  
कौन भला  बाहर जा भटके !

जाना होगा खुद के भीतर 
महाशक्ति का धाम वहीं है,
हर विपदा से पार लगाए 
देवी का वरदान वहीं है !

रविवार, अप्रैल 5

दीप जलाकर भरें उजाला


दीप जलाकर भरें उजाला 


 इक ही हो संकल्प हृदय में 
एक भावना हर अंतर में, 
दीप जलाकर भरें उजाला 
घर-घर के दर पर भारत में !

दूर रहे हर तम की छाया 
इसी आस में दीप जलाया,
भय का तम ना घेरे मन को 
सबने गीत विजय का गाया !

विपदा को हम सीख बना लें 
शुभता को दिल से अपना लें, 
काल ठहर कर इंगित करता 
‘देने’ का ही धर्म जगा लें !

कुदरत निशदिन लुटा रही है 
प्राणवायु, जीवन जल, पावक,
मोल लगाया इनका भी अब 
जाग तुरन्त ओ मानव जाग !

मिलजुल कर रहना यदि सीखें 
कोई नहीं रहेगा भूखा, 
धरा इक परिवार है सुंदर 
सत्य अटल यह सूत्र अनोखा !

शनिवार, अप्रैल 4

सदियों से हम वहीं खड़े थे

सदियों से हम वहीं खड़े थे 

सदा मानव ने स्वयं को श्रेष्ठ माना
अपने अस्तित्त्व को बनाये रखने 
और फलने-फ़ूलने के लिए 
प्रकृति की अन्य सन्तानों को दांव पर लगाया 
पंछियों से उनका आश्रय छीना
पशुओं को बेघर किया 
कीट नाशकों का कर निर्माण 
अनेकों प्रजातियों को विलुप्त ही कर दिया !

नदियों को नालों में बदल दिया 
समन्दरों को कचराघरों में 
भर दिया, आकाश को अंतहीन ध्वनियों से 
 मिटा दिया, आवश्यकता और विलासिता के मध्य की रेखा को ही 
देव संस्कृति और असुर संस्कृति का 
ऐसा घेलमाल किया 
कि सर्वे भवन्तु सुखिनः के स्थान पर 
‘मैं सुखी होऊं’ का मन्त्र गूँजने लगा !

मानव की भोगलिप्सा का मुख
 सुरसा की तरह बढ़ता ही गया 
जिसमें वह लील गया 
लाखों निरीह प्राणियों को जिंदा ही 
एक दिन तो चक्र घूमना ही था 
अब नारायण का चक्र उल्टा चल रहा है 
मानव सिमट रहे हैं 
जीव-जगत प्रसारित हो रहा है 
नदियां श्वास ले रही हैं 
सागर उत्तंग लहरें उठा रहे हैं !

प्रकृति स्वयं को संवार रही है स्वयं ही 
मानव देवी की मूर्तियों को सजाता है 
फिर उससे भी जल को दूषित करता है 
जीती-जागती माँ  है यह प्रकृति 
उसका श्रृंगार करने की न मानव में सामर्थ्य है न इच्छा ही
जहाँ ज्ञान हो शुभ, वहाँ शुभेच्छा जगेगी 
मानव को ज्ञान का अमृत पीना होगा 
 इस दुनिया में धरती पुत्र बनकर जीना होगा 

यह विषाणु का बीज मानव ने ही बोया है 
अब भी यदि वह सोया है तो रोना ही पड़ेगा 
क्योंकि कोरोना में ही छुपा है रोना !  

 मानव श्रेष्ठ है... इसलिए 
कि वह सभी को साथ लेकर चले 
देखे, कि हर प्राणी, हर फूल-पौधा भी खिले !

शुक्रवार, अप्रैल 3

देर है वहां अंधेर नहीं

देर है वहां अंधेर नहीं 


देर है वहां अंधेर नहीं 
तभी पुकार सुनी धरती की 
सूक्ष्म रूप में भू पर आके 
व्यवस्था काल लगा है लाने 
कामना और आवश्यकता का अंतर समझाने 
बेघरों को आश्रय दिलवाने 
बच्चों और बुजुर्गों को उनका समय दिलाने 
वरना आज का युवा सुबह से निकला रात को घर आया 
मनोरंजन के साधन खोजे, भोजन भी बाहर से मंगवाया 
परिवार में साथ रहकर भी सब साथ कहाँ थे 
सब कुछ था, पर ‘समय’ नहीं था 
न अपने लिए न अपनों के लिए 
घर चलते थे सेवक-सेविकाओं के सहारे 
भूल ही गए थे घर में भी होते हैं चौबारे 
सुबह की पूजा, दोपहर का ध्यान, शाम की संध्या 
तीनों आज प्रसन्न हैं 
जलता है घर में दीया, योग-प्राणायाम का बढ़ा चलन है 
हल्दी, तुलसी, अदरक का व्यवहार बढ़ा है 
स्वच्छता का मापदंड भी ऊपर चढ़ा है 
शौच, संतोष, स्वाध्याय... अपने आप 
यम-नियम सधने लगे हैं 
भारत की पुण्य भूमि में अपनी संस्कृति की ओर
लौटने के आसार बढ़ने लगे हैं 
‘तप’ ही यहां का मूल आधार है 
ब्रह्मा ने तप कर ही सृष्टि का निर्माण किया 
शिव ने हजारों वर्षों तक ध्यान किया 
कोरोना को भगाने के लिए हमें तपना होगा 
 जीवन के हर क्षण को सद्कर्मों से भरना होगा ! 

गुरुवार, अप्रैल 2

दुनिया बदल रही है


दुनिया बदल रही है 


दुनिया बदल रही है 
पुलिस पकड़ा रही है गुलाब 
आरती उतारती है 
टीका लगाती है माथे पर 
क्योंकि नहीं हुआ है टीकाकरण अभी तक कोरोना के खिलाफ 
गरीबों के प्रति अति संवेदनशील हो गयी हैं
 सरकारें और सामान्य जन भी 
खुल गए हैं लंगर और भोज.. 
दूर - दूर पांत में बिठाकर परोसा जाता है 
नेता और अभिनेता दे रहे हैं दान दिल खोल कर 
आज हर जीवन निर्भर है दूसरे के जीवन पर 
दान का महत्व, आज तक किताबों में पढ़ा था 
निर्धनों की सेवा का भाव कभी क्या मन में जगा था !

टीवी पर नहीं होती गलाफाड़ बहसें 
नहीं लगते आरोप-प्रत्यारोप एक-दूसरे पर 
कांग्रेसी और बीजेपीयन में भेद नहीं करता वायरस 
न हिन्दू और मुस्लिम में 
मिटता जा रहा है हर भेद अब 
खो गया है अतीत मानवता का 
ट्रम्प को चुनाव का भय नहीं सताता
भविष्य से रह गया है जैसे दूर का कोई नाता 

उतर गया है बच्चों के सिर से परीक्षा का बोझ 
खिल गए हैं उनके चेहरे, निखर आयी है सोच  
ज्ञान के प्रति सहज आकांक्षा जगी है 
रटकर कापी पर उगलने के लिए नहीं 
वे सीखने के लिए पुस्तकें खोलते हैं 
सुंदर कलाओं के माध्यम से महामारी के खिलाफ जंग छेड़ते हैं 
नदियों में मछलियाँ नहीं कुलबुलातीं 
पशु - पंछी मुक्त हैं.. सड़कों पर, मैदानों में 
खुले गगन में, जहाँ लोहे की मशीनें 
शोर करती हुईं नजर नहीं आतीं 

क्या वाकई बदल रही है दुनिया ! 

रविवार, मार्च 29

गाँव बुलाता आज उन्हें फिर

गाँव बुलाता आज उन्हें फिर 


सुख की आशा में घर छोड़ा 
मन में सपने, ले आशाएँ, 
आश्रय नहीं मिला संकट में 
जिन शहरों में बसने आये !

गाँव बुलाता आज उन्हें फिर 
टूटा घर वह याद आ रहा,
वहाँ नहीं होगा भय कोई 
माँ, बाबा का स्नेह बुलाता !

कदमों में इतनी हिम्मत है 
मीलों चलने का दम भरते, 
इस जीवट पर अचरज होता  
क्या लोहे का वे दिल रखते !

एक साथ सब निकल पड़े हैं 
नहीं शिकायत करें किसी से,
भारत के ये अति वीर श्रमिक 
बचे रहें बस कोरोना से !

दिहाड़ी मजदूर

दिहाड़ी मजदूर 


सिर पर छोटी से इक गठरी रखे 
जिसमें दो जोड़ी कपड़े भी न समाएं 
वही है कुल जमा पूंजी उनकी 
तेज धूप में तपती सड़क पर 
चले पड़े हैं वे अपने घर की ओर
जो एक दो नहीं, दूर है सैकड़ों मील
दूसरे शहर में... नहीं, दूसरे राज्य में 
दिहाड़ी मजदूर के सिर पर छत नहीं है 
जिसने न जाने कितनी अट्टालिकाएं खड़ी कर दीं 
उनके पास रहने को ठिकाना नहीं 
जो दूसरों के लिए आशियाना सजाते हैं 
जीवट से भरे, कोरोना  के मारे ये मजदूर 
अपनी राह खुद बनाते हैं !

गुरुवार, मार्च 26

प्रकृति और मानव

प्रकृति और मानव 

एक मास्टर स्ट्रोक मारा उसने 
और बता दिया... कौन है मालिक ?
चेतावनी दी थी 
सुनामी भेजी, कई तूफान भेजे
भूमिकम्प में भी राज खोला था 
इबोला में भी वही बोला था 
पर हमारे कान बहरे थे 
नहीं सुनी हमने प्रकृति की पुकार 
जो लगा रही थी वह बार बार 
जारी रखा अपनी कामनाओं का विस्तार 
भूल गए अपने ही स्रोत को 
भूल गए कि.. हम प्रकृति के स्वामी नहीं 
हैं उसका ही अंग  
सुविधाओं के लोभ में  निरंकुश दोहन कर, 
कर रहे खुद से ही जंग  
जंगल खत्म हो रहे और 
हवा में घुलता जा रहा था जहर 
 सागरों की अतल गहराई तक प्लास्टिक का कचरा 
अब बैठे हैं अपने-अपने घरों में 
नहीं भर रहे नालियों में पॉलीथिन, प्लास्टिक के ग्लास और कटोरे 
बन्द है पार्टियों में व्यर्थ का आडम्बर 
कुछ दिनों के लिए ही सही 
जो भी व्यर्थ है, वह हमसे छुड़वाया जा रहा है 
कोरोना के बहाने हमें दर्पण दिखाया जा रहा है !

बुधवार, मार्च 25

कुदरत यही सिखाने आयी

कुदरत यही सिखाने आयी 


घर में रहना भूल गया है 
बाहर-बाहर तकता है मन, 
अंतर्मुख हो रहे भी कैसे ?
नहीं नाम का सीखा सुमिरन !
  
घर में रहने को नहीं उन्मुख 
शक्ति का जहाँ स्रोत छुपा है,
आराधन कर उस चिन्मय का 
जिसमें तन यह मृण्मय बसा है !

कुदरत यही सिखाने आयी 
कुछ पल रुक कर विश्राम करो,
दिन भर दौड़े-भागे फिरते 
अब दुनिया से उपराम रहो !

हवा शुद्ध होगी परिसर की 
धुँआ छोड़ते वाहन ठहरे,
पंछी अब निर्द्वन्द्व उड़ेंगे 
आवाजों के लगे न पहरे !

धाराएँ भी निर्मल होंगी 
दूषित पानी नहीं बहेगा,
श्रमिकों को विश्राम मिलेगा 
उत्पादन यदि अल्प घटेगा !



मंगलवार, मार्च 24

इतिहास

इतिहास 

इतिहास दोहराता है स्वयं को बार-बार 
महामारी का दंश झेला है 
 पहले भी, दुनिया ने कई बार
शायद हम ही थे... 
जब अठाहरवीं शताब्दी में प्लेग फैला था 
या उन्नीसवीं शताब्दी में दुर्भिक्ष... 
हम लौटते रहे हैं बार-बार  
किसी वस्तु.. किसी व्यक्ति के आकर्षण में 
या घटनाओं की पुनरावृत्ति हमें भाती है 
तभी हर बार मानवता वही भूल दोहराती है 
आज विज्ञान का युग है 
दुनिया जुड़ी है आपस में 
जैसे पहले कभी नहीं जुड़ी थी 
आज रोग भिन्न है उसके निदान भी 
यह व्यक्तिगत युद्ध नहीं है 
यह सामूहिक लड़ाई है 
जिसमें स्वास्थ्य कर्मी सेनापति 
और हर नागरिक सिपाही है 
जंग जीतकर जब हम आगे बढ़ें 
तो अपने आप से यह प्रण करें 
सुख लेने में नहीं देने में छुपा है 
यहाँ हम सभी का भाग्य जुड़ा है 
कहीं कोई द्वीप नहीं बचा 
सारी दुनिया एक मैदान बन गयी है 
इस देश की हवा उस देश में पहुँच गयी है 
तो सारी सीमाएं मनों की मिटा दें
और बने रहें अपने-अपने घरों में !


सोमवार, मार्च 23

महामारी

महामारी 


कितना अलग मिजाज है आजकल दुनिया का 
न कोई किसी से मिलता है 
न कहीं आता जाता है 
झूठ-मूठ लड़ाई का बहाना बनाकर 
बैठे हैं अलग-अलग कमरों में 
नजरबंद हैं विदेश से आये लोग 
कोई नहीं पूछता, मेरे लिए क्या लाये 
बल्कि मौन रहकर ही सवाल उछालता है
इटली क्यों गए थे, भला यह भी कोई समय है 
स्पेन घूमने जाने का 
सोसाइटी में होने लगी है खुसर-पुसर 
फलां नम्बर में रात कोई आया है 
जाने कोरोना अपने साथ लाया हो ! 
सड़कें सूनी हैं, बच्चे हैरान हैं 
घर में बैठे रहने का मिला फरमान है 
जितना चाहे खेलो पर घर पर ही 
लेकिन आँख बचाकर वे निकल जाते हैं 
वीरान गलियों में साइकिल चलाते हैं 
कोरोना के भय से नींदें उड़ गयी हैं 
प्रधानमंत्री के शब्द जैसे मरहम लगाते हैं 
भीतर सोया जोश जगाते हैं 
हाँ,  लगेगा जनता कर्फ्यू 
और बजेंगी थालियाँ भी 
उन जांबाजों के लिए जो बने हैं रक्षक 
समाज और राष्ट्र के प्रहरी 
कुछ न बिगाड़ पाएगी भारत का
निगोड़ी  यह महामारी !  

रविवार, मार्च 22

हम साथ हैं

हम साथ हैं


हमें मिली है मोहलत 
चन्द दिनों की, चन्द हफ्तों की या चन्द महीनों की 
हम नहीं जानते 
पर हम साथ हैं उनके
जो लड़ रहे हैं जंग 
कोरोना के खिलाफ !

जिन्हें नहीं मिली पूर्व चेतावनी 
जो धकेल दिए गए अनजाने ही 
मृत्यु के मुख में 
या जो सह रहे हैं पीड़ा आज भी 
हम दुआ करते हैं उनके लिए !

वुहान के किसी पशु बाजार से 
किसी निरीह की देह से आया यह वायरस 
एक सूक्ष्म हथियार की तरह 
छुप गया एक मानव देह में 
उसने खबर भी दी अपने होने की 
किया सचेत भी
पर नहीं समझा कोई भी 
उस चेतावनी को 
और... एक से दूसरे  तक 
फैलता गया इसका प्रकोप 
पहले एक शहर से दूसरे शहर 
फिर एक देश से दूर देश 
एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप 
और अब सारा विश्व इसकी चपेट में है
हजारों ने देह त्याग दी 
लाखों सह रहे हैं पीड़ा 
सैकड़ों लगे हैं उन्हें बचाने में और 
करोड़ों भयभीत हैं 
लेकिन साथ हैं !

घरों में बंद वे नहीं बनेंगे 
वाहक वायरस के 
और जब थककर 
एक दिन दम तोड़ देगा 
आखिरी वायरस भी 
उस दिन के इंतजार में 
भारत के लोग कह रहे हैं 
सारे विश्व से 
हम साथ हैं !


शनिवार, मार्च 21

जब राज खुलेगा इक दिन यह

जब राज खुलेगा इक दिन यह 


जो द्रष्टा है वह दृश्य बना 
स्वप्नों में भेद यही खुलता,
अंतर बंट जाय टुकड़ों में 
फिर अनगिन रूप गढ़ा करता !

सुख स्वप्न रचे, हो आनन्दित 
दुःख में खुद नर्क बना डाले,
कभी मुक्त मगन उड़ा नभ में 
कभी गह्वर, खाई व नाले !

जो डरता है, खुद को माना
जो डरा रहे, हैं दूजे वे, 
खुद ही है कौरव बना हुआ 
बाने बुन डाले पांडव के !

जब राज खुलेगा इक दिन यह 
मन विस्मित हो कुछ ढगा हुआ, 
स्वप्नों से जगकर देखेगा
मैं ही था सब कुछ बना हुआ !

मैं ही हूँ, दूजा यहाँ नहीं 
यह मेरे मन की माया थी, 
वे दुःस्वप्न सभी ये सुसपने 
केवल अंतर की छाया थी !