गुरुवार, दिसंबर 8

जीवन जैसे एक पहेली




जीवन जैसे एक पहेली 


सुख के पीछे रहे भागते 
मुट्ठी खोली दुःख ही था,
स्वप्न स्वर्ग के रहे पालते 
कदमों तले नर्क ही था !

जीवन जैसे एक पहेली 
उलझ गया कोई हो जाल,
हल न जिसका मिला किसी को  
ऐसा मुश्किल एक सवाल !

नजरें जब तक लगीं गगन पर
घर का दीप अदेखा रहता,
सपनों के पीछे जो भागा
मन पँछी वह कैद हुआ !

कर्म सफल हो चाहा इतना
किंतु सफलता रही अधूरी,
आशा का बिरवा बोया था
किसकी आस हुई है पूरी !














बुधवार, दिसंबर 7

राह देखता कोई भीतर


राह देखता कोई भीतर 

बाहर धूप घनी हो कितनी 
घर में शीतल छाँव घनेरी,
ऊबड़-खाबड़ पथरीला मग
दे आमन्त्रण सदा वही  !

लहरें तट से टकरा घायल 
घर जा पुनः ऊर्जित होतीं,
मन लहरों सा सदा डोलता 
घर जाने की सुध न आती !

राह देखता कोई भीतर 
मीलों विस्तृत नीलगगन सा,
क्लांत बटोही पा जाये ज्यों 
चिर आश्रय सुखद बसेरा !

किंतु स्वप्न में खोया अंतर 
घर से दूर निकल आया है,
भूल-भुलैया में जगती की 
स्वयं ही स्वयं को भटकाया है !










मंगलवार, दिसंबर 6

बस वही खिल मुस्कराया

बस वही खिल मुस्कराया


एक रिश्ता दोस्ती का
 फलसफा यह जिंदगी का,
खूबसूरत सा जहाँ  यह
एक नाता हो ख़ुशी का !

अजनबी बनकर रहा जो
भेंट आँसूं , दर्द पाया,
घर बनाया जग को जिसने
बस वही खिल मुस्कराया !

चाँद-तारे गा  रहे यह
फूल, पंछी भी सुनाते,
झोलियाँ भर गीत उर में
हर घड़ी वे गुनगुनाते !

बह  रहा अंतर गुहा से
एक निर्झर  प्रीत का है,
द्वार खुलते ही मिलेगा
पाहनों से जो ढका है  !

सुन रही सारी  दिशाएँ
खोल दें अरमान दिल के,
बाँह  फैलाये खड़ा वह
निकट आ जाएगा चल के !








सोमवार, दिसंबर 5

एक कोमल गीत जैसे



एक कोमल गीत जैसे 


जिंदगी हर पल नयी है 
नींव खुद हमने गढ़ी थी, 
जिन पलों की कल किसी दिन 
आज वह सम्मुख खड़ी है !

सुप्त था मन होश न था 
स्वप्न देखा बेखुदी में, 
जब मिला साकार होकर 
नींद रातों की उड़ी है !

सुखद पल जो भी  मिले हैं 
खुशनुमा से सिलसिले हैं,
ख्वाब बन कर  जो सजे थे 
उन्हीं लम्हों की लड़ी है !

एक कोमल गीत जैसे 
था छुपा अंतर कवि के 
ले रहा आकार सुंदर 
उसी रचना की कड़ी है !



रविवार, दिसंबर 4

अकेलापन और एकांत

अकेलापन



उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक
धरा के इस छोर से उस छोर तक
कोई दस्तक सुनाई नहीं देती

अटूट निस्तब्धता और सन्नाटा
अम्बर के लाखों नक्षत्रों का मौन रुदन
और चन्द्रमा का अकेलापन

क्यों हैं ?.....यह दूरियाँ
यह अलगाव यह अकेलापन
जो चुभता है दंश सा !

एकांत 

उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक 
धरा के इस छोर से उस छोर तक 
एक ही का पसारा है 

अटूट निस्तब्धता और सन्नाटा
अम्बर के लाखों नक्षत्रों का मौन सृजन 
और चन्द्रमा का एकांत 

अद्भुत हैं यह दूरियाँ
यह विस्तार यह एकांत 
जो मिलता है मीत सा !

शनिवार, दिसंबर 3

लघु जो भी है झर जायेगा

लघु जो भी है झर जायेगा


शाम हुई पुष्प झर जाता  
पात पुराना मुरझा जाता,
निज झोली में बाँधें गाँठें 
मन अतीत के नगमे गाता   !

परम सदा ही खिला-खिला है
वर्तमान में मिला-मिला है,
अच्युत है वह अटल अभी
मन काहे फिर हिला हिला है !

दृष्टि जब ऊपर उठती हो
 लघु जो भी है झर जायेगा,
आहिस्ता से कदम बढ़ा तो  
 लक्ष्य स्वयं सम्मुख आएगा !


शुक्रवार, दिसंबर 2

चलो चलें उस तट हो आएं


चलो चलें उस तट हो आएं 

एक शमा जलती रहती है 
एक नदी बहती रहती है,
एक ध्वनि मद्धिम-मद्धिम सी 
कानों में धुन सी बजती है !

चलो चलें उस तट हो आएं 
स्वयं भी एक ज्योति बन जाएँ,
भँवरा बन गुंजाएं आलम 
मन की तितली यह कहती है !

कुसुमों ने ज्यों गन्ध छुपायी 
सागर में मोती रहता है,
स्वर्णिम आभा भावों में भर 
पलकों से धारा बहती है !

गगन समेटे अनगिन तारे 
मीन बसे लहरों में रंगीं,
जीवन कितने राज छुपाये 
पल-पल यह सृष्टि गहती है !

बुधवार, नवंबर 30

जागरण


 जागरण 

सोयी हुई देशभक्ति भी 
जाग  रही है दिल में सबके,
खोयी हुई आस्था जागी 
मूल्यों के प्रति हर अंतर में !

तप कर सोना कुंदन बनता 
जनता तप हेतु तैयार,
घण्टों पंक्ति में लगकर भी 
कम न होता दिल में प्यार !

भारत नए दौर में पहुँचा 
नई ऊर्जा नई  लहर है,
पारदर्शिता लेन-देन में 
नई चेतना डगर-डगर है !

 नहीं  रुकेगी यह यात्रा 
अब स्वर्णिम युग की आहट  है 
जो न इसके संग चल रहे 
उन कदमों में घबराहट है !

दुनिया देखे परिवर्तन को  
देश नई करवट लेता है,
नव गति, नव उल्लास समेटे 
'सत्यमेवजयते' गाता  है !






मंगलवार, नवंबर 29

मौन


मौन 

सिमट गयी है कविता 
या छोड़ दिया है खजाना शब्दों का 
उस तट पर 
मंझदार ही मंझदार है अब 
दूसरा तट कहीं नजर नहीं आता 
एक अंतहीन फैलाव है और सन्नाटा 
किन्तु डूबना होगा सागर की अतल गहराई में 
शैवालों  के पार....
जहाँ ढलना है ऊर्जा को सौंदर्य और भावना में 
जीवन की सौगात को यूँ ही नहीं लुटाना है 
कवि के हाथों में जब तक कलम है 
और दिल में शुभकामना है उसे 
वक्त के हर अभिशाप को वरदान में ढालना है !

रविवार, नवंबर 27

घुटने का दर्द

घुटने का दर्द 

उम्र की सीढ़ी चढ़ते चढ़ते 
दर्द की इक सौगात मिली,
जितना जितना किया इलाज 
मर्ज को उतनी हवा मिली 

बचपन का वह कोमल सा तन 
युवा काल का गठा बदन,
प्रौढ़ावस्था भी जाने को 
वृद्ध हुआ न माने मन !

चाल में तेजी वही पुरानी 
नहीं आत्मा कभी बदलती,
शौके-फितरत कायम रहता 
सदा जवां यह भरम पालती !

उसी जुनूँ  ने दर्द दिया यह 
गहरी चोट लगी घुटने में,
चलने-फिरने पर बन्दिश है 
जीवन सिमटा है बस  घर में !

दफ्तर आना-जाना छूटा 
हर दिन ही मानता है संडे,
समय बिताने के सार्थक 
सीख लिए हैं कितने फंडे  !

देह भले न मोबाइल हो 
किन्तु हाथ में मोटोजी  है,
फेसबुक पर हाल बताया 
लाइक  की लंबी  लिस्ट है !

फुर्सत ही फुर्सत है अब तो 
जब भी चाहें तानें लंबी,
घण्टों लैपटॉप पर बैठें 
 मूव न हों पर देखें मूवी !







बुधवार, नवंबर 16

बदल रहा है देश

बदल रहा है देश

लोग निकल रहे हैं घरों से
छोटे-बड़े सब समान होकर खड़े हैं लम्बी-लम्बी कतारों में
जिन्हें एक नहीं कर पाये सद उपदेश और भगवान
उन्हें एक ही कतार में ले आया है इस देश का संविधान
आखिर प्रधानमन्त्री को चुना है जनता ने
उसका संवैधानिक हक है
जनता को जागरूक बनाना
देश से भ्रष्टाचार मिटाना
अब किसी को हिम्मत नहीं होगी
नोटों से भरे तिजोरी
या फिर बेहिसाब कमाई में से करे कर चोरी
अब इस देश का कोई माईबाप है
जिसको देना हर किसी को जवाब है
देश बदल रहा है
हमको भी बदलना है
न कि ‘सब चलता है’ का मन्त्र जपना है
अब यहाँ बेईमानी नहीं चलेगी
अभी तो गंदगी फ़ैलाने वालों की नकेल भी कसेगी
स्वच्छ भारत का सपना अब हकीकत बन रहा है
वाकई देश बदल रहा है !

गुरुवार, नवंबर 3

कविता झुलस रही है

 कविता झुलस रही है 

कविता झुलस रही है उस आग में
लगा रहा है जो कोई सिरफिरा
अनगिनत स्वप्न और निशान नन्हे कदमों के
 दफन हो गये जिसकी राख में
उन कक्षाओं की चहकती आवाजें
खो गयीं जैसे बियाबान में
स्कूल की घंटी से बढ़
क्या हो सकता है कोई गीत किसी बच्चे के लिए
जिसमें गाता है उसका भविष्य
सारी समझ आदमी ने
गिरवी रख दी है जैसे
जो जमीन के एक टुकड़े की खातिर
मार रहा है इंसानियत की जागीर
कितना कठिन है वक्त का दौर
जब मर रहे हैं लोग
और दिखाई जाती है उनकी तस्वीर !


बुधवार, अक्तूबर 19

जिंदगी का गीत यूँ ही

जिंदगी का गीत यूँ ही

सोचते ही आज बीता
कल कभी आता कहाँ,
जिंदगी का गीत यूँ ही
छिटक ही जाता रहा !

डर छुपाये जी रहा जग
धुधं, कोहरा या धुआं सा,
मांगता रब से दुआएं
कंप रहा मन पात सा !

नींद में जो स्वप्न देखे
जागते ही खो गये वे,
जग उठे भीतर उजाला
स्वप्नवत होगा जगत ये !

मुस्कुराती जिन्दगी तब 
बाँह फैलाये मिलेगी,
हर कदम पर खिलखिलाती 
गंग धारा सी बहेगी !

मंगलवार, अक्तूबर 18

मन

मन

भर जाता भीतर उत्साह
गायत्री मन्त्र का उच्चार
स्यात् सवितादेव की तरह बंटना चाहता है 
करता आह्लादित युगों-युगों से
गंगा की लहरों का स्पर्श अंतर को
आत्मसागर की ओर बहना चाहता है 
थम जाते कदम देख फूलों का झुरमुट
बियाबान जंगल में भी
बन सुगंध दिग-दिगंत में उड़ना चाहता है 
लुभाती हर दीप की लौ 
 बनकर ज्योति की सुवास मिटना चाहता है
बिखरना सीखा पारिजात से जिसने
सदा ताजा ही रहेगा बन
तोड़ दी सीमाएं, पंछी सा 
 गगन में उड़ेगा ही वह मन !

शुक्रवार, अक्तूबर 14

जो भी राह दिखाने आया

जो भी राह दिखाने आया

एक मुखौटा ओढ़ा सुंदर
चेहरे पर मुस्कान पहन ली,
दिल में चाहे आग सुलगती  
शीतल सी पहचान ओढ़ ली !

हालचाल सब ठीकठाक है
जग को जब विश्वास दिलाया,
 मदमाती जीवन की राह है
दिल ने खुद को भी समझाया !  

जो भी राह दिखाने आया
उसको अपना दुश्मन माने,
छलता जो मन पहले जग को
खुद को ही बंधन में डाले !

मूल छिपा ही रहता भीतर
माया के पर्दे पर पर्दे,
स्वप्नों की इक आड़ खड़ी है
उम्मीदों के जाल बड़े !