गुरुवार, जुलाई 2

अस्तित्त्व और हम

अस्तित्त्व और हम 

सुकून झरता है 
उसी तरह...  जैसे जल 
हम उपेक्षा का छाता लगाए 
बच निकलते हैं 
काश ! अस्तित्व के साथ यूँ होता मिलन
जैसे टकराते हैं दो पात्र निकट आकर सहजता से 
और फ़ैल जाती है संगीत की स्वर लहरी !

मिलन तो निरन्तर घटेगा 
उसी से उपजे हैं 
उसी में रहेंगे.... 
इस मिलन से बह सकता है 
मधुर गीत 
या फूट सकती हैं ज्वालायें !

उसके साथ यदि टकराई  लहर 
जो सागर अनंत है 
तो खो जाएगी...
 चाहे तो लहराए उसके विशाल प्रांगण में 
संगीत गुंजाए.... नाचे 
सूर्य की किरणों में 
सतरँगी आभा बिखराये !

कभी निकल पड़े आकाश की यात्रा पर 
फिर बदली संग बरस जाए
मानसरोवर  या हिमालय शिखर पर
प्रकृति के साथ संघर्ष हुआ 
तो रोना ही होगा 
न जाना यह भेद तो 
हर युग में मानव को को-रोना ही होगा !

बुधवार, जुलाई 1

सूरज और चाँद

सूरज और चाँद 

‘वह’ सूरज है... 
भरी दोपहरी का 
 तपता  सूरज !
हमें चाँद की शीतल उजास ही सुहाती है  
 मुख फेर लेते हैं हम
उजाले से 
या हमारी आँखें मुंद जाती हैं !

तज प्रखर ज्योति  
 तज विस्तीर्ण गगन  
घूमता रहता मन अपनी ही गलियों में
मद्धिम ज्योत्स्ना 
ही मन को लुभाती है !

वहाँ कोई दूसरा नहीं 
यहाँ पूरा जगत है, 
वहाँ निस्तब्धता है 
यहाँ कोलाहल है !

कोई-कोई ही ‘उसका’
चाहने वाला 
मन का तो हर कोई रखवाला 
‘उसकी’ ही रौशनी प्रतिबिंबित करता  
फिर भी ‘उसके’ निकट जाने से डरता  
सूरज के उगते ही छिप जाता चाँद 
खो जाते  तारिकाओं के समूह 
वह एकक्षत्र स्वामी है नभ का 
नींद में छिप जाता है लेकिन 
 मन स्वप्न तो बुनता ही रहता  
‘उसका’ बल वहाँ नहीं चलता ! 



मंगलवार, जून 30

लिखे जो खत तुझे

लिखे जो खत तुझे 

हाथ से लिखे शब्द 
मात्र शब्द नहीं होते 
उनमें हृदय की संवेदना भी छिपी होती है 
मस्तिष्क की सूक्ष्म तंत्रिकाओं का कम्पन भी 
गहरा हो जाता है कभी कोई शब्द
कभी कोई हल्का 
कभी व्यक्त हो जाती है उनमें 
लिखने वाले की ख़ुशी 
कभी दर्द 
जो एक बूंद बन छलक जाये  
क्यों न हम फिर से लिख भेजें संदेश
स्वयं के गढ़े शब्दों से 
चाहे वे कितने ही अनगढ़ क्यों न हों 
न हो उनमें कोई दार्शनिकता या कोई सीख 
बस वे हमारे अपने हों 
क्यों न पुनः पत्र लिखें
 अपने हाथों से 
चाहे चन्द पंक्तियाँ ही
 कोरी, खालिस अपने मन से उपजी 
शुद्ध मोती की तरह पावन !


सोमवार, जून 29

तकनीक और प्रकृति

तकनीक और प्रकृति 

 रिश्ता निभाने का साधन मान लिया है 
मोबाइल को, आज की पीढ़ी ने 
न कागज की छुअन 
न कलम से दिल का हाल लिखना 
जिसमें सच्चाई झलकती थी 
मन कागज पर उतर जाता था 
उन शब्दों के साथ 
जो केवल और केवल 
उस व्यक्ति विशेष के लिए होते थे 
आज वे ही संदेश जो हजारों पढ़ चुके हैं 
जिनमें कोई सच्चाई नहीं है 
वे भेज दिए जाते हैं 
खोखले शब्द... जो उधार के हैं 
क्षण भर के लिए होता होगा शायद 
जिनका असर
अगले ही पल व्यर्थ हो जाते हैं  
हाँ, खोखले हो गए हैं आज रिश्ते 
क्योंकि व्यक्ति खाली है भीतर 
भावों में डूबना ही भूल गया है 
एक आभासी दुनिया में ही जीता है 
पर्दे पर चलती तस्वीरों को ही सच मानता
वास्तविक स्पर्श से भी वंचित कर दिया गया है 
प्रकृति से उसे यह दंड ही तो मिला है 
सिकुड़ गया है हर कोई अपने खोल में 
छोटे से यन्त्र में डूबा है 
न जाने किस की कमी पूर्ण करता है यह 
जो थमा दिया है बच्चों के हाथों में 
अब शिक्षा का साधन बना है 
नहीं, मानव का भविष्य इसमें नहीं है 
इसे हटाना होगा 
असली संवाद को लाना होगा 
और व्यक्त करना होगा प्रेम 
तब नहीं मरेंगे असमय 
अकाल मृत्यु से युवा और किशोर 
जो सूखी जाती है 
नहीं टूटेगी जीवन की वह डोर !


शनिवार, जून 27

व्यक्त-अव्यक्त


व्यक्त-अव्यक्त 

जीवन !
कितना सार्वजनिक हो गया है आज 
कितना खुला-खुला  
पर उतना ही ढकना पड़ता है उसे 
छिपाना पड़ता है 
जब कम उघड़ा था  
तब भीतर कम छिपा था 
यह नियम है 
पेड़ जितना ऊपर जायेगा 
उसकी जड़ें उतनी गहरी होंगी 
आज हम व्यक्त कर देते हैं 
जितनी आसानी से 
आभासी दुनिया पर प्रेम 
उतना ही छुपा रहता है भीतर अप्रेम 
जब प्रेम भी अव्यक्त रहता था 
तब कुछ छुपाने को कहाँ थी जगह 
तब भरा रहता था दिल उसी भाव से 
अब छलका फिरता है सरे राह 
तो भीतर भरने को जो भी मिलेगा 
भर जायेगा 
क्यों कि यहां नहीं रहता कभी शून्य 
उसमें कुछ न कुछ झर जायेगा !

शुक्रवार, जून 26

प्रकाश और अंधकार

प्रकाश और अंधकार 

अंधकार  की एक लम्बी श्रृंखला... 
प्रकाश मिल मिलकर भी खो जाता है, 
युगों से इस जगत रूपी सुरंग में चलते हुए 
निकास द्वार कहीं नजर नहीं आता है !

खुला आकाश निमन्त्रण देता 
धरा से पाँव बंधे हैं 
मुक्ति का गीत मन गाए भी 
पर, बंद पिंजरे में ही 
पंख फड़फड़ाता है !

‘मैं’ का होना ही अँधेरा 
‘तू’ ही प्रकाश पुंज घनेरा 
तेरे प्रकाश की ही छाया है यह जग
तुझसे ही जीवन पाता है !

अँधेरा भी प्रकाश के बल पर इतराता 
लुप्त होता पल में 
उसके आने पर
मन यही भेद ही तो बेखुदी में 
अक्सर भूल जाता है !

गुरुवार, जून 25

पुकार

पुकार 

यूँ तो हजारों खड़े हैं कतारों में 
उसके द्वार वही जाता है 
जिसे वह बुलाता है !
लाख प्रमाण दिए प्रह्लाद ने 
नास्तिक पिता नकारे जाता है !
जल को अधरों से लगाते हम हैं 
पर अपनी प्यास तो वही जगाता है !
सुरीले गीतों को सुन झूम उठती है दुनिया 
गाते वही आ कण्ठ में जिनके सुर समाता है 
चढ़ते हैं दूर शिखरों पर आरोही वे ही 
पर्वत जिन्हें अपने पास बुलाता है !
हाँ, यह बात और है कि 
पर्वतों के आमन्त्रण को स्वीकार करे 
ऐसा जिगर कोई-कोई ही पाता है !
यानि मंजिल बुलाये तब भी 
कुछ कदम नहीं बढ़ते 
कोई उसकी पुकार पर दौड़ा चला जाता है !
एक लेन-देन अनोखा चल रहा 
झोली सिली है जिसकी 
वह मेहर को समेटे जाता है !

बुधवार, जून 24

योगी

योगी 

प्रमाद की नींद पर 
कभी सुदिन खड़ा नहीं होता 
यह सही है, जब जाग जाए मन 
तभी उसके लिए सवेरा होता !

वे  विलग हैं,अनोखे हैं 
 स्वार्थ उन्हें नहीं चलाता
उनकी ऊर्जा का स्रोत अहंकार से नहीं 
परमात्मा से है आता !

भय से भाग खड़े हों
या क्रोध से करें सामना 
यह सामान्य जन करते होंगे 
विपदा आने पर, 
वे योगारूढ़ हो 
शांत मन से करते हैं मुकाबला 
भीतर ठहर कर !

न लाभ की चिंता है उन्हें 
लोभ नहीं डुलाता
निमित्त बने हैं किसी के, कर्ता वही है 
 उसका काम करना भाता !

ध्यान और समर्पण की गंगा 
जहाँ दिन-रात बहती है, 
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के पीछे 
तुरीया स्वतः ही रहस्य खोल देती है !
अँधेरे में जग जल रहा हो 
जब अज्ञान के हाथों 
ज्ञान की आँख ही उसको 
बचा सकती है !  

मंगलवार, जून 23

भाव और अभाव

भाव और अभाव
 
जो भी दुःख है...  अभाव से उपजा है 
जो भी इच्छा है...  उस अभाव को दूर करने की है 
जो भी कर्म है...  उस इच्छा को पूरा करने के लिए है 
समीकरण सीधा है 
अभाव का अनुभव ही कर्म में लगाता है 
 
सिर पर छत हो 
घर में दाने हों 
तन ढका हो 
तब तो गिर जायेगा अभाव ?
 
नहीं, मन एक नया अभाव उत्पन्न करेगा 
 
 सुंदर सन्तान हो 
 प्रिय का संग हो 
समाज में नाम हो 
तब तो मिट जायेगा न अभाव ?
 
नहीं, मन कुछ और अभाव जगा देगा 
 
बैंक में नामा हो 
तन भी स्वस्थ हो 
सुख का हर साधन हो 
तब ? 
 नहीं, अभाव उत्पन्न करना ही मन का स्वभाव है 
 
और जीवन के अंतिम क्षण तक 
उसे पूरा करते रहना मानव की विवशता 
जब तक वह यह जान न ले 
कि अधूरा मन नहीं वास्तव में 
वह पूर्ण है ! 
 
तब हर कर्म पूर्णता से उपजेगा 
वही होगा कृष्ण का निष्काम कर्म 
जो अभाव से नहीं भाव से होता है आयास
बाँधता नहीं बाँटता है जग में निज सुवास ! 

सोमवार, जून 22

घटे जागरण

घटे जागरण 

कंस ने द्वेष किया कृष्ण से 
फिर उसी को मन में बसाया 
जिस पर भी रोष किया मानव ने 
अंतर को उसी का घर बनाया !
जिस मन की गहराई में 
सारा ब्रह्मांड बसता है 
पादप, पंछी, पशु, गोलोक तक का विस्तार है 
चाहे यदि जो अनंत की 
उड़ान भर सकता है 
वह व्यर्थ ही क्या नहीं 
छोटा सा अहंकार लिए फिरता है !
एक सूक्ष्म विषाणु जिसका अस्त्र बना 
संहारक है जो बढ़ते हुए लोभ का 
जग को गहरी नींद से जगाया है 
प्रकृति पर होते अत्याचार 
के प्रति चेताया है 
गणेश को पूजने वाला समाज 
बना है हाथी का हत्यारा 
बेदखल कर पशुओं को 
उनके आश्रयों को हथिया लिया 
किया गया है विवश भीतर झाँकने को 
यदि जीवन ही न रहा तो 
क्या रह जायेगा उसे मांगने को !
सुख आशा और दुःख निराशा में 
कोई चुनाव नहीं है यहाँ 
एक के साथ दूजा बिन मांगे चला आता 
काश ! यह अटूट सत्य नजर आ जाता ! 


रविवार, जून 21

योग तभी घटता जीवन में


योग तभी घटता जीवन में 



टुकड़ा-टुकड़ा मन बिखरा जो 
जुड़ जाता जब हुआ समर्पित 
योग तभी घटता जीवन में 
सुख-दुःख दोनों होते अर्पित ! 

योगारुढ़ हो युद्ध करो तुम 
कहा कृष्ण ने था अर्जुन को, 
जीवन भी जब युद्ध बना हो 
योगी हर मानव क्यों ना हो ? 

योगी का मन एक शिला सा 
दुई में जीता है संसार, 
मंजिल एक, एक ही रस्ता 
लेकर जाए योग भव पार !

देह की हर वेदना जाने 
मन के स्पंदन को भी पढ़ता,
योगी कुशल कर्म में होकर 
हुआ साक्षी निज में रहता !

नित्य-अनित्य का संज्ञान है 
सुख के पीछे दुःख को लख ले, 
मैत्री, करुणा, मुदिता आदि  
अंतर के कण-कण में भर ले !




शनिवार, जून 20

हानि-लाभ

हानि-लाभ 

कदाचित हर इच्छा लोभ से उपजती है 
हर भय हानि की आशंका से 
सुख की आशा ही लोभ है 
दुःख का दंश ही भय है !

कुछ और मिल जाये 
कहीं कुछ खो न जाये 
इन दो तटों के मध्य ही 
बहती है जीवन सरिता !

योगक्षेम का ख्याल रखा जायेगा 
कृष्ण का यह आश्वासन भी काम नहीं आता 
वरना दुनिया में इतना संघर्ष बढ़ता नहीं जाता !

कुछ लोग उतरे हैं सड़कों पर कुछ पाने को 
रत हैं कुछ दूसरों के भय को भुनाने को !

कोरोना की सुरसा सी बढ़ती भूख को 
समझदारी ही शांत कर सकती है 
जीवन यदि प्रिय है तो 
 परिवर्तन की धारा ही जिला सकती है 
चिकित्सक भी उतना ही मानव है 
जीवन दे नहीं दे सकता 
अपने ही हाथों में है भविष्य 
ऐसे मोड़ पर खड़ी है सभ्यता !

शुक्रवार, जून 19

सच की तलाश


सच की तलाश 

सच है खाली आकाश सा... 
शून्य !
तभी उसे भरा जा सकता है झूठ अथवा मिथ्या से 
जैसे नींद में जब सब खो जाता है मन से 
तो स्वप्न उसे भर देते हैं 
जो मिथ्या होते हुए भी 
देते हैं सच का आभास !

सच कोरे कागज सा है 
जिस पर शब्दों को अंकित करें तो 
पढ़ना होता है खाली जगह में 
दो शब्दों के मध्य सच को !

संगीत के स्वरों में जो अंतराल है 
जिसका कोई उत्तर नहीं 
सच ऐसा सवाल है !

 बिखरा है चहुँ ओर
पर उसे महसूस करना हो तो 
मिथ्या का साधन चाहिए 
जहाँ से तीर चलाती है माया 
उस इच्छा का कारण भी !

 दीवारें उठ गयी हों 
कितनी ही ऊँची 
सच को बाँध नहीं पातीं 
झांकता रहता है हर दरार से सच 
बस उस ओर नजर नहीं जाती ! 


गुरुवार, जून 18

तू और मैं

तू और मैं 


जैसे कड़ी से कड़ी जुड़ी है इस तरह 
कि कोई जोड़ नजर नहीं आता 
‘तू’ जुड़ा है’मैं’ से उसे भेद जरा नहीं भाता 
‘मैं’ को यह ज्ञात नहीं 
 निज संसार बसाता है
सृष्टि के अहर्निश गूँजते संगीत में 
अपनी ढपली अपना राग सुनाता है 
कभी सुर मिल जाते हैं संयोग से तो 
फूला नहीं समाता
जब बेसुरा लगता है संगीत तो 
अश्रु बहाता है 
  भुला जड़ें गगन में फूल खिलाता है 
 तज भाव तर्क में प्रवीण हुआ जाता है 
 हो सकती है पृथक सुरभि पुष्प से ?
तपन अगन से या किरण सूर्य से ?
पर ‘मैं’ असंभव को संभव कर दिखाना चाहता है !

मंगलवार, जून 16

अनगाया यदि रहा गीत

अनगाया यदि रहा गीत 


अनगाया यदि रहा गीत जो 
गाने आये थे हम भू पर, 
खिला नहीं यदि सरसिज उर में 
मिले नहीं उड़ने को दो पर !

मधुऋतु अगर न मन में उतरी 
फूटी नहीं हृदय की गागर, 
सूना रहा घाट उर सर का 
मन्दिर के द्वारे तक जाकर !

अंतर में यदि नहीं लालसा 
चाह नहीं यदि जगी मिलन की,
कैसे कारागार खुलेगा 
कैसे गूँजेंगे अनहद स्वर !