रविवार, जनवरी 25

आया वसंत

आया वसंत

महुआ टपके रसधार बहे
गेंदा गमके मधुहार उगे ,
महके सरसों गुंजार उठे
घट घट में सोया प्यार जगे !

ऋतू मदमाती आई पावन
झंकृत होता हर अंतर मन,
रंगों ने बिखराई सरगम
संगीत बहा उपवन उपवन !

जागे पनघट जल भी चंचल
हुई पवन नशीली हँसा कमल,
भू लुटा रही अनमोल कोष
रवि ने पाया फिर खोया बल !

जीवन निखरा नव रूप धरा
किरणों ने नूतन रंग भरा,
सूने मन का हर ताप गया,
हो मिलन, उठा अवगुंठ जरा !


शुक्रवार, जनवरी 23

वसंत पंचमी पर शुभकामनायें

सरस्वती पूजा



गा रही है वाक् देवी  
गूँजती सी हर दिशा है,
शांत स्वर लहरी उतरती
शुभ उषा पावन निशा है !

श्वेत दल है कमल कोमल
श्वेत वसना वीणापाणि,
राग वासन्ती सुनाये
वरद् हस्ता महादानी !

ज्ञान की गंगा बहाती
शांति की संवाहिका वह,
नयन से करुणा लुटाये
कला की सम्पोषिका वह !

भा रही है वाग् देवी
सुन्दरी अनुपम सलोनी,
भावना हो शुद्ध सबकी
प्रीत डोरी में पिरोनी !

जग उठे मेधा जो सोयी
अर्चना तब पूर्ण होगी,
ताल-लय जीवन में प्रकटे
साधना उस क्षण फलेगी ! 

गुरुवार, जनवरी 22

है हवा कुछ बोलती सी

 है हवा कुछ बोलती सी




गंध ले आयी सुमन की
भरे आंचल डोलती सी,
नीर नद की कुछ नमी
राज कोई खोलती सी
है हवा कुछ बोलती सी !

कर रही सरगोशियाँ ये
तोडती खामोशियाँ ये.
उड़ चली पाखी के पंखों
राह उनकी मोड़ती सी
है हवा कुछ बोलती सी !


सोमवार, जनवरी 19

शहंशाहों की रीत निराली

शहंशाहों की रीत निराली

मंदिर और शिवाले छाने
कहाँ-कहाँ नहीं तुझे पुकारा,
चढ़ी चढ़ाई, स्वेद बहाया
मिला न किन्तु कोई किनारा !

व्रती रहे, उपवास भी किये
अनुष्ठान, प्रवास अनेकों,
योग, ध्यान, साधना साधी
माला, जप, विश्वास अनेकों !

श्राद्ध, दान, स्नान पुण्य हित
किया सभी कुछ तुझे मान के,
सेवा के बदले तू मिलता
झेले दुःख भी यही ठान के !

किन्तु रहा तू दूर ही सदा
अलख, अगाध, अगम, अगोचर
भीतर का सूनापन बोझिल
ले जाता था कहीं डुबोकर !

तभी अचानक स्मृति आयी
सदगुरु की दी सीख सुनाई,
कृत्य के बदले जो भी मिलता
कीमत उससे कम ही रखता !

जो मिल जाये अपने बल से
मूल्य कहाँ उसका कुछ होगा ?
कृत्य बड़ा होगा उस रब से
पाकर उसको भी क्या होगा ?

कृपा से ही मिलता वह प्यारा
सदा बरसती निर्मल धारा,
चाहने वाला जब हट जाये
तत्क्षण बरसे प्रीत फुहारा !

वह तो हर पल आना चाहे
कोई मिले न जिसे सराहे,
आकाक्षाँ चहुँ ओर भरी है
किससे अपनी प्रीत निबाहे !

इच्छाओं से हों जब खाली
तभी समाएगा वनमाली,
स्वयं से स्वयं ही मिल सकता
शहंशाहों की रीत निराली !

रविवार, जनवरी 11

उसने कहा था

उसने कहा था


जानते हो
 क्यों भला-भला लगता है ?
निरभ्र..विस्तीर्ण गगन
निस्सीम, निस्तब्धता छू जाती है
अंतर आकाश को
जैसे कोई दो बिछुड़े मित्र मिलकर
प्रसन्न हो जाएँ !

गंगा की लहरों से खेलना
युगों से लुभाता रहा है क्यों हमें ?
सागर की उत्ताल लहरों का स्पर्श
कर जाता है रोमांचित
क्योंकि नाच उठता है
भीतर का जल तत्व उसके साथ
उन पलों में होकर एकाकार !

अग्नितत्व भी हो जाता है तरंगित
निहार उठती हुई लपटों को
थिरक उठते हैं कदम तभी
होलिकादहन और लोहरी के उत्सवों में !

हो जाता होगा तन्मय वायुतत्व भी
सहला जाता है जब हवा का झोंका हौले से
और.... भला-भला लगता है माटी का स्पर्श
क्यों कुम्हार को ?
किसान घंटो गुजारता है उसके अंग-संग
उनके भीतर की माटी भी लेती है कोई आकार
पंच तत्वों से बने मानव
उन्हीं से जुड़कर होते हैं
वास्तव में आनंदित, प्रफ्फुलित !


शुक्रवार, जनवरी 9

एक अनोखा बचपन

एक अनोखा बचपन

नन्हा पुनः आकाश को एकटक देखता पाया गया, माँ ने जब सारा घर छान लिया तो उसे ध्यान आया कि कहीं पिछली बार की तरह वह बगीचे में घास पर लेट कर आकाश की नीलिमा में तो नहीं खो गया I आहट पाते ही वह चौंक कर उठ बैठा, काले लम्बे व घने केशों से सजा उसका साँवला चेहरा व बड़ी-बड़ी आंखें सभी को मंत्र मुग्ध कर लेती थीं I
“बेटा, तू आकाश में क्या खोजता फिरता है?
“माँ, मैं आकाश के पार जाना चाहता हूँ, जाने क्या है उसके पार, तुम जानती हो क्या?”
माँ खिलखिला कर हँस पड़ी. “वहाँ कुछ भी नहीं है बेटा, यह नीला रंग भी तो आभास मात्र है I”
“नहीं, वहाँ कुछ है, जरूर कुछ है, एक दिन मैं उसको ढूँढ निकालूँगा I”
ठीक है, अभी तो तुझे स्कूल के लिये तैयार होना है I
स्कूल पहुंचा तो मित्रों ने घेर लिया, आज भी उसे दो छात्रों के बीच मध्यस्थता करानी थी I उसका निर्णय सब आँख मूंद कर मानते थे I अध्यापक भी उसकी निर्दोष आंखों और तीव्र बुद्धि से प्रभावित थे I एक वर्ष में दो कक्षाएं पास करता हुआ वह आठ साल की उम्र में छठी का विद्यार्थी था I बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी भी उससे बातें करते अक्सर देखे जा सकते थे I जब कोई उससे पूछता वह बड़ा होकर क्या करेगा तो सदा एक ही जवाब वह मुस्कुराते हुए देता था, मैं दूर देशों तक लोगों से मिलने जाऊँगा, वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं I पूछने वाला चकित हो जाता तो वह हँस पड़ता, बच्चे के मुँह से निकली बात को महत्वहीन समझ कर लोग भुला देते I
छोटी बहन उसकी सबसे बड़ी प्रशंसिका थी, जब तक वह घर में रहता आगे-पीछे घूमती रहती, फिर भी कभी-कभार उनमें झगड़ा हो जाता तो वह चुपचाप अपने काम में लग जाता जैसे कुछ हुआ ही न हो I बहन थोड़ी देर मुँह फुलाए रखती फिर खुद ही धीरे से आकर बात करने लगती क्योंकि वह तो तब तक झगड़े की बात भूल ही चुका होता था I दोनों मिल कर खेलों की नई-नई योजनाएँ बनाने लगते I वह जब ध्यान मग्न होता तो बहन उसका चेहरा देखती रह जाती, उसे छोटी उम्र से ही अहसास हो गया था कि उसका भाई अन्य सब बच्चों से अलग है I जब बच्चे बिना किसी जरूरत के फूल-पत्ती व टहनियाँ तोड़ते हुए निकल जाते वह पूजा के लिये फूल तोड़ने में भी झिझकता था, एक चींटी तक को मारना भी उसे मंजूर नहीं था, स्कूल में पैर की ठोकर से फुटबाल उछालते समय जब अन्य छात्रों को खुशी से भरे देखता तो उसका कोमल हृदय कांप जाता, वह अपने पैरों की ओर देख कर सोचता इनसे किसी को ठोकर मारना तो दूर हल्की सी चोट भी नहीं लगाई जा सकती I जब दूसरे बच्चे मैदान में धमा-चौकड़ी मचाते वह नयन मूंदे जाने क्या सोचा करता नहीं तो निकट के मंदिर के पुजारी की गतिविधियों को ध्यान से देखा करता I कभी-कभी मुहल्ले के बच्चे खेल खत्म कर उसके निकट आ बैठते और वह उन्हें काल्पनिक मूर्ति की पूजा करना सिखाता, ध्यान करना सिखाता I कई श्लोक उसे कंठस्थ थे अपनी मधुर आवाज में जब गाता सब मौन हो सुनने लगते I
पिता एक सरकारी दफ्तर में अधिकारी थे, उनका सामान बैठक में बड़ी मेज पर एक छोटी अटैची में रखा रहता था, कुछ फाईलें, जरूरी कागजात, पेन, चश्मा तथा चाबियाँ यही सब था उस सामान में I उसने देखा कि पिता जब दफ्तर के लिये तैयार होते हैं तो सारा घर उनके आगे पीछे घूमता है, माँ खाना बनाते-बनाते उनके कपड़े आदि रख जाती, नौकर जूते पॉलिश कर ले आता I पिता गम्भीर मुद्रा में सब पर हुकुम चलाते I एक दिन सोने से पहले उसने अटैची से सारा सामान निकाल कर अपने खिलौने उसमें रख दिए, पिता ने अगले दिन रोज की तरह अटैची उठाई व दफ्तर चले गए I वहाँ अपने सामान की जगह खिलौने देख पहले तो सकपका गए पर साथियों को हँसते देख खुद भी हँसने लगे I घर आने तक सोचते रहे कि उनके बेटे ने ऐसा क्यों किया, शायद वह उन्हें समझाना चाहता था कि जिन फाइलों को लेकर वह इतने गम्भीर हो जाते हैं, वे खिलौनों से बढकर कुछ नहीं I काम को अति महत्व देने से जीवन हाथ से छूट जाता है I घर आकर बालक को बुलाया तो वह चुपचाप आकर खड़ा हो गया, इशारे से उन्होंने पूछा, मेरा सामान कहाँ है? वह हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गया, जहाँ सलीके से सारी फाइलें व अन्य चीजें रखीं थीं I पुत्र की मासूमियत देख वह मुस्कुरा दिए I जीवन का एक सूत्र आज इस नन्हे बालक ने उन्हें पकड़ा दिया था I
उसे दादी से बहुत लगाव था पर उनकी कुछ बातोँ का विरोध करने से वह नहीं चूकता था, चाहे इसके लिये उनके कोप का भाजन भी बनना पड़े I ग्वाले को घर में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं थी क्योंकि वह एक हरिजन था I वह जानबूझ कर उसके साथ खेलता कभी उसके घर भी चला जाता I बाद में इसके लिये दादी की डाँट सहनी पड़ती I घर में काम करने वाली छोटी बालिका के साथ भी उसकी सहानुभूति थी, दिन भर उसको काम करते देख उसका मन करुणा से भर जाता I भगवदगीता के श्लोक उसे केवल याद ही नहीं थे वह जीवन में उनका पालन भी कर रहा था I दादी रोज संध्या बेला में एक आसन बिछा कर पूजा की थाली लिये भगवान की प्रतीक्षा करती थी, जाने किस रूप में वह आ जाएँ, इसलिए हर अतिथि को आदर सहित खिलाती व उपहार देती, उसे इस खेल में बहुत मजा आता I परमात्मा के प्रति उसका सहज प्रेम उसके जीवन की हर बात से जाहिर हो रहा था I
उस दिन वह जल्दी-जल्दी स्कूल से लौटा, सुबह उसकी पूजा व ध्यान अधूरा रह गया था क्योंकि घर में कुछ काम था I पर उसने कमरे में जाते ही देख लिया पूजा का स्थान खाली था, माँ ने फिर सब सामान हटा दिया था, माँ भोजन लाई तो उसने मुँह फेर लिया, थोड़ी देर बाद वह सारा सामान ताजे फूलों के साथ रख कर जाने लगी तो उसने कनखियों से उसकी नम आँखों को देखा और वह दौड़ कर उसके गले से लिपट गया I उसे याद आया पिछले हफ्ते ही उसने माँ को नाराज किया था जब स्कूल टूर से लौटने पर उसका खाली बैग देख कर माँ ने पूछा था “तेरे कपड़े कहाँ हैं, ओढ़ने व बिछाने की चादरें व शाल कहाँ हैं?”
कुछ और पूछने का मौका न देते हुए वह मुस्कुरा कर बोला, “मेरे मित्रों को तुम्हारी पसंद बहुत भाती है, मेरा सब कुछ तुम्हीं तो लाती हों माँ I”
पर माँ रोज-रोज की इस लुटाऊ वृत्ति से तंग आ चुकी थी सो खूब डाँट सुनायी I लेकिन दोनों जानते थे कि इस डाँट का असर ज्यादा दिन तक रहने वाला नहीं है I माँ को भय था कि इतना वैराग्य कहीं उसे घर से दूर न ले जाये I ध्यान में डूबे अपने पुत्र को देख कभी उसके शैशवकाल कि वह घटना याद आ जाती जब छत में लगी छड़ से लोहे की भारी जंजीरों सहित उसका लकड़ी का पालना नीचे आ गिरा था वह तो बेहोश ही हो गई थी पर नन्हा शिशु मुस्का रहा था I थोड़ा सा बड़ा होने पर जब वह भाषा का ज्ञान सीख गया उसकी कही हर बात मानता था, वही बालक अब सारा समय मंदिरों, मसजिदों, व चर्चों के चक्कर लगाता रहता था I
माँ पुत्र के इस व्यवहार से चिंतित हो जाती तो वह उसे आश्वस्त करता, माँ के कहने पर उसने पढ़ाई जारी रखी तथा भविष्य में नौकरी के लिये इंटरव्यू देने के लिये भी मान गया, पर उसके जीवन का उद्देश्य स्पष्ट था, वह सरे विश्व के लोगों के जीवन को खुशियों से भर देना चाहता था I

सोमवार, जनवरी 5

कोई मतवाला मंजिल तक

कोई मतवाला मंजिल तक



फूल उगाये जाने किसने
गंध चुरायी है सबने,
स्वेद बहाया जाने किसने
स्वप्न सजाये हैं सबने !

कोई मतवाला मंजिल तक
जाने का दमखम रखता,
पीछे चले हजारों उसके
घावों पर मरहम रखता !

राह बनायी जाने किसने
कदम अनेकों के पड़ते,
देख उसे ही तृप्त हो रहे
पहुँचेगे, किस्से गढ़ते !

एकाकी ही लक्ष्य बेधता
भीड़ें सभी बिखर जातीं,
जीवन को सतह पर छूकर
तृप्त हुईं निज घर जातीं !

स्वर्णिम कलश सा कोई चमके
आभा मंडित सब होते,
उसको हमने भी देखा है
दर्शन पाये यह कहते !

शुक्रवार, जनवरी 2

वह

पिछले वर्ष के अंतिम सप्ताह में मैं दिल्ली में भाई के घर में थी, उसी कड़ाके की सर्दी में यह यथार्थ कागज पर उतारा था.

वह  

बाहर है कोहरे की घनी चादर
ठंड के कारण शायद न आये वह
आज इतवार भी तो है !
भर जाती है भाभी के मन में आशंका
और जब नहीं आती वह दस बजे तक
मोबाइल फिर उठाया जाता है   
नहीं मिलता संतोषजनक कोई जवाब
जब-जब बजती है घंटी दरवाजे की
लगता है आ गयी है वही
पर पहले था सोसाइटी का चौकीदार
दूसरी बार निकला जमादार
तीसरी बार दूधवाला और
उम्मीदों पर पानी फेर देता है धोबी चौथी बार..  
फिर आधा घंटा किया बेसब्री से इंतजार
कुछ कहा-सुना फिर फोन पर
आयी है ‘वह’ तब जाकर
भाभी ने राहत की साँस ली है
‘उसने’ हाथ में जब झाड़ू थाम ली है...

मंगलवार, दिसंबर 23

नये वर्ष की इबादत

प्रिय ब्लॉगर मित्रों, एक सप्ताह के लिए इस वर्ष की अंतिम यात्रा पर आज ही निकलना है, उत्तर भारत में भीषण सर्दी है इसके बावजूद..नये वर्ष की शुभकामनाओं के साथ विदा. नये वर्ष के लिए आप सभी को उपहार स्वरूप कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं.
 नये वर्ष की इबादत


जाते हुए बरस की हर घड़ी यही तो नहीं कह रही
बीत गया वसंत एक और आस ज्यों की त्यों रही

दस्तक दे नई भोर, उससे पहले
अधूरे स्वप्नों को फिर से सजाना है
नये वर्ष में यकीनन हर किसी को
गीत जिन्दगी का गुनगुनाना है !

साफ रखना है अपनी गली का हर कोना
गौरैया को दाना चुगाना है,
अधूरा रह गया था जो ख्वाब वर्षों पहले
इस बार तो उसे अंजाम पर पहुँचाना है !

दरियाओं को और नहीं पाटना
जहर फिजाओं में नहीं मिलाना है,
चैन की नींद सो सकें माँ-बाप घरों में
बेटियों को किसी हाल नहीं सताना है !

खिला सके हर बच्चा अपनी शख्सियत को
सूरज तालीम का उगाना है
दम न तोड़े यौवन अंधेरों में
किरदार अपने हिस्से का सबको निभाना है !

छंट जाएँ आतंक के कोहरे वतन के आसमां से
हर जुल्मो सितम से छुड़ाना है,
घरों से दूर हुए नौनिहाल खो गये
बिछुड़े हुओं को फिर से मिलाना है !

जंगलों को काट बेघर कर रहे बाशिंदों को
निज स्वार्थ हित नहीं उन्हें मरवाना है
दरिंदों के चंगुल से निकाल मासूमों को
सुकून से जीने का हक दिलाना है !

नया वर्ष दस्तक दे उससे पहले कुछ नई रस्में बना लें
छूट गये जो पीछे साथी उन्हें साथ चलने को मना लें !

सोमवार, दिसंबर 22

उजाले से पीठ

उजाले से पीठ


पूर्व दिशा में ही उगा था ज्ञान का सूरज
जो आया इधर उसने जगमगा लीं अपनी राहें !
क्यों अँधेरे में रहे चले जाते हैं कुछ लोग
नहीं कि उन्हें जरूरत नहीं है रौशनी की
या कि चुंधिया जाती हैं उनकी आँखें
उजाले की चमक से
बस अभ्यास हो गया है उन्हें अन्धेरों का
वे छोड़ नहीं पाते काले लिबास
जिसपर कितने ही धब्बे लगें दिखाई नहीं देते
भय लगता है उन्हें श्वेत परिधान से
जिस पर लगा एक छींटा भी
कर सकता है उन्हें शर्मिंदा
अमरत्व की विरासत मिली है जिन्हें
मारकर दूसरों को कहलाते स्वयं को जिन्दा !

शुक्रवार, दिसंबर 19

मन को जरा पतंगा कर ले

मन को जरा पतंगा कर ले

तू ही मार्ग, मुसाफिर भी तू
तू ही पथ के कंटक बनता,
तू ही लक्ष्य यात्रा का है
फिर क्यों खुद का रोके रस्ता !

मस्ती की नदिया बन जा मिल
तू आनंद प्रेम का सागर,
कौन से सुख की आस लगाये
तकता दिल की खाली गागर !

सूर्य उगा है नीले नभ में
खिडकी खोल उजाला भर ले,
दीप जल रहा तेरे भीतर
मन को जरा पतंगा कर ले !

मन की धारा सूख गयी है
कितने मरुथल, बीहड़ वन भी,
राधा बन के उसे मोड़ ले
खिल-खिल जायेंगे उपवन भी !

एक पुकार मिलन की जागे
खुद से मिलकर जग को पाले,
सहज गूंजता कण कण में जो
उस पावन मुखड़े  को गाले !


मंगलवार, दिसंबर 16

पलट गया है मन

पलट गया है मन



तृप्ति की शाल ओढ़े
सिमट गया है मन
दौड़-भाग बंद हुई
खत्म हुआ खेल सब
देखो कैसे मौन हुआ
खुल गयी पोल जब
बातें बड़ी बनाता था
सपने दिखाता था
स्वयं ही बना कर महल
खुद ही गिराता था
घर का पता मिल गया
लौट गया है मन
झूठी थीं शिकायतें
झूठे ही आरोप सब
कुर्सी बचाने को
लगाये प्रत्यारोप सब
राई का पर्वत बना
स्वयं भला बना कभी
दूजों की टांग खींची
बाल की खाल भी
राज सारे खुल गए
पलट गया है मन !