शुक्रवार, मई 17

मृत्यु एक पड़ाव भर है


मृत्यु एक पड़ाव भर है

जन्म के पीछे छिपी है मृत्यु
ज्ञानी तत्क्षण देख रहा है,
नई यात्रा पर जाना है  
मृत्यु एक पड़ाव भर है !

जग यह इक दिन खो जायेगा
धूल में मिल जायेगा सब धन,   
अंधकार में छिपा उजाला
छिपा जरा में है नव यौवन !  

होती जब धौंकनी खाली
शक्ति से फिर भर जाती,
सांसे जब बाहर जाती हैं  
तब ही तो भीतर आतीं !  

हर श्वास पर मरता मानव
हर श्वास जीवन दे देती,
जीकर मरना, मरकर जीना
दो पैरों पर होती है गति !

यहाँ जिंदगी पल-पल देती
खालीपन भी भर जायेगा,
भरा हुआ पर जो पहले से
कैसे वह कुछ भी पायेगा !

हर क्षण जग खिलता-मिटता है
प्रेम में नफरत का पुट होता,
द्वन्द्वों से ही सृष्टि चलन है
सुख मोती दुःख तार पिरोता ! 

मंगलवार, मई 14

वर्षा


वर्षा  

अमृत छलका
दानी नभ से
सिहरा रोम-रोम धरती का
जागे वृक्ष, दूब अंकुराई
शीतलता आंचल में भर
पवन लहराई.

भीगा तन पाखी का
उड़ा फड़फड़ा डैने
चहका मन भी
मस्त हुए नद-नाले पोखर
बाँट रहे जल उलीचकर.

आर्द्र हुई प्रकृति
द्रवित, कृतज्ञता-अश्रुजल से
थलचर, नभचर, वनचर भीगे
किन्तु न भीगा
मानव का उर
छिपता, बचता अमृत रस से
बंद घरों में
 डरता जल से.


बृहस्पतिवार, मई 9

अम्बर भी है बातें करता


अम्बर भी है बातें करता


एक सहज उल्लास जगायें
भीतर इक विश्वास उगायें,
प्रेम लहर अंतर को धोए
कैसे वह प्रियतम छिप पाए !

यहीं कहीं है देख न पाते  
व्यर्थ विरह के नगमे गाते,
यूँ ही हैं हम आँखें मूंदें
सम्मुख है जो नजर न आये !

वह रसधार बही जाती है
सूखी डाली हरी हुई है,
ओढ़ी थी जो घोर कालिमा
हटा आवरण ज्योति खिली है !

भीतर सरवर के सोते हैं
एक फसल उगी आती है,
चट्टानों को भेद शीघ्र ही
कल-कल स्वर से भर जाती है !

कैसा अनुपम प्रेम बरसता
कुदरत के कण-कण से झरता,
हवा कहे कुछ सहलाती जब
अम्बर भी है बातें करता !


मंगलवार, मई 7

ऐसा भी होता जीवन में


ऐसा भी होता जीवन में



छा जाता भीतर सन्नाटा
कोई शब्द न लेता श्वास,
कविता जैसा कुछ उभरेगा
नहीं जगाता कोई आस !

जैसे बंद गली हो आगे
भान हुआ तो होती खीझ,
वैसे इस मन का सूनापन
कैसे इस पर जाएँ रीझ !

जहां खिले थे कमल हजारों
आज वहाँ मटियाला सा जल,
जहां रचे थे गीत हजारों
आज वहाँ न कोई हलचल !

ऐसा भी होता जीवन में
धारा समय की रुख मोड़ती,
आज जहाँ रेतीले मंजर
कभी वहीं थी नदी गुजरती !

दूर खड़ा होकर जो देखे
इस प्रपंच से न उलझे,
वरना गुंथे हुए हैं रस्ते
कैसे इसके बल सुलझें !

शनिवार, मई 4

याद दिलाता है हर मंजर




याद दिलाता है हर मंजर

सूना-सूना घर तकता है
मालिक घर के कहाँ गये,
खाली कमरा दिक् करता है
जल्दी लौटें जहाँ गये !

हर इतवार को जिसे संवारा
पूजा का कमरा भी उदास,
बाग-बगीचा, सब्जी बाड़ी
देख रहे भर मन में आस !

गिरे हुए हैं कई आमले
ग्राहक नजर नहीं आता,
लाल टमाटर पक-पक झरते
कोई उनको नहीं उठाता !

मधुर ध्वनि शंख की अब तो
सुबह नहीं देती है सुनाई,
रामायण का पाठ न होता
अखबार भी बंद कराई !

स्वाद दाल का कोई न भूला
कटहल भी आया है घर,
बिना आपके कुछ न भाता
याद दिलाता है हर मंजर !

सभी याद करते हैं पल पल
मीरा, शिव भी राह निहारें,
हरसिंगार के फूल झरे हैं
याद सदा करती हैं बहारें !

कितनी खुशियाँ बाट जोहतीं
नतिनी की शादी है सिर पर,
एक यात्रा भी करनी है
बुला रहा बनारस का घर !

शक्ति दाता देगा शक्ति
भोलेबाबा भला करेंगे,
भीतर जो ऊर्जा छिपी है
उसे जगा के स्वस्थ करेंगे !

(पिताजी कुछ दिनों से अस्पताल में हैं.)
मीरा, शिव - नैनी के बच्चे 
दाल- वे अच्छी बनाते हैं 
कटहल- उन्हें पसंद है 





मंगलवार, अप्रैल 30

वृद्धावस्था




वृद्धावस्था 

नहीं भाता अब शोर जहाँ का
अखबार बिना खोले पड़ा रह जाता है
टीवी खुला भी हो तो दर्शक
सो जाता है
गर्दन झुकाए किसी गहन निद्रा में
आकर्षित नहीं कर पाते मनपसंद पकवान भी
नहीं जगा पाते ललक भीतर
न ही भाता है निहारना आकाश को
कुछ घटता चला जाता है अंतर्मन पर
ऊर्जा चुक रही है
शिथिल हो रहे हैं अंग-प्रत्यंग
दर्द ने अब घर बना लिया है स्थायी...
झांकता ही रहता है किसी न किसी खिड़की से तन की
छड़ी सहचरी बनी है
कमजोरी से जंग तनी है
दवाएं ही अब मित्र नजर आती हैं
रह-रह कर बीती बातें यद आती हैं
जीवन की शाम गहराने लगी है
नीड़ छोड़ उड़ गए साथी की पुकार भी
अब बुलाने लगी है
रंग-ढंग जीवन के फीके नजर आते हैं
कोई भाव भी नजर नहीं आता सपाट चेहरे पर
कोई घटना, कोई वाकया नहीं जगाता अब खुशी की लहर
क्या इतनी बेरौनक होती है उसकी आहट
इतनी सूनी और उदास होती है
रब की बुलाहट
क्यों न जीते जी उससे नाता जोड़ें
आखिरी ख्वाब से पहले उसकी भाषा सीखें
मित्र बनाएँ उसे भी जीवन की तरह
तब उसका चेहरा इतना अनजाना नहीं लगेगा
उसका आना इतना बेगाना नहीं लगेगा !






शुक्रवार, अप्रैल 26

ऐसी हो अपनी पूजा


ऐसी हो अपनी पूजा


लक्ष्य परम, हो मन समर्पित
 हृदयासन पर वही प्रतिष्ठित !

शांतिवेदी, ज्ञानाग्नि प्रज्वलित
भावना लौ, प्रेम पुष्प अर्पित !

पुलक जगे अंतर, उर प्रकम्पित
सहज समाधि, अश्रुधार अंकित !

छंटें कुहासे, करें ज्योति अर्जित
आनंद प्रसाद पा, बीज प्रस्फुटित !

मिले समाधान, लालसा खंडित
सुन-सुन धुन, मन प्राण विस्मित !

अव्यक्त व्यक्त कर, अंतर हर्षित
दृष्टा को दृश्य बना, आत्मा शोभित 

बुधवार, अप्रैल 24

जिंदगी अनमोल मोती सी जड़ी है


जिंदगी अनमोल मोती सी जड़ी है


मर गए जो वे सहारा ढूंढते हैं
जिंदगी तो पांव अपने पर खड़ी है

इक पुराना, इक नया कल बाँधता
जिंदगी इस पल में जीने को अड़ी है

क्यों गंवायें रंजिशों में फुरसतें
पास अपने कुल मिला कर दो घड़ी है

एक दिन उसका भी होगा सामना
मौत भी तो जिंदगी की इक कड़ी है

एक लम्हा ही इबादत का सहेजें
पास उसके एक जादू की छड़ी है

मुस्कुराहट का कवच पहना भले हो
इक नुकीली पीर अंतर में गड़ी है

स्वप्न सजते थे सुहाने जिसमें कल
उस नयन में अश्रुओं की इक लड़ी है

दूर तक पसरा है आंचल प्रीत का
जिंदगी अनमोल मोती सी जड़ी है

सोमवार, अप्रैल 22

जैसे कोई गीत सुरीला


जैसे कोई गीत सुरीला


शशि, दिनकर नक्षत्र गगन के, धरा, वृक्ष, झोंके पवन के
बादल, बरखा, बूंद, फुहारें, पंछी, पुष्प, भ्रमर गुंजारें

लाखों सीप अनखिले रहते, किसी एक में उगता मोती
लाखों जीवन आते जाते, किसी एक में रब की ज्योति

उस ज्योति को आज निहारें, परम सखा सा जो अनंत है
जीने की जो कला सिखाता, यश बिखराता दिग दिगन्त है

जैसे कोई गीत सुरीला, मस्ती का है जाम नशीला
तेज सूर्य का भरे ह्रदय में, शिव का ज्यों निवास बर्फीला

कोमल जैसे माँ का दिल, दृढ जैसे पत्थर की सिल
सागर सा विस्तीर्ण है जो, नौका वही, वही साहिल

नृत्य समाया अंग-अंग में, चिन्मयता झलके उमंग में
दृष्टि बेध जाती अंतर मन, जाने रहता किस तरंग में

लगे सदा वह मीत पुराना, जन्मों का जाना-पहचाना
खो जाता मन सम्मुख आके, चाहे कौन किसे फिर पाना

खो जाते हैं प्रश्न जहाँ पर, चलो चलें उस गुरुद्वार पर
चलती फिरती चिंगारी बन, मिट जाएँ उसकी पुकार पर

जैसे शीतल सी अमराई, भीतर जिसने प्यास जगाई
एक तलाश यात्रा भी वह, मंजिल जिसकी है सुखदाई

नन्हे बालक सा वह खेले, पल में सारी पीड़ा लेले
अमृत छलके मृदु बोलों से, हर पल उर से प्रीत उड़ेंले

वह है इंद्रधनुष सा मोहक, वंशी की तान सम्मोहक
है सुंदर ज्यों ओस सुबह की, अग्नि सा उर उसका पावक

मुस्काए ज्यों खिला कमल हो, लहराए ज्यों बहा अनिल हो
चले नहीं ज्यों उड़े गगन में, हल्का-हल्का शुभ्र अनल हो

मधुमय जीवन की सुवास है, अनछुई अंतर की प्यास है
पोर-पोर में भरी पुलक वह, नयनों का मोहक उजास है

प्रिय जैसे मोहन हो अपना, मधुर-मधुर प्रातः का सपना
स्मृति मात्र से उर भीगे है, साधे कौन नाम का जपना

धन्य हुई वसुंधरा तुमसे, धन्य-धन्य है भारत भूमि
हे पुरुषोत्तम! हे अविनाशी! प्रज्वलित तुमसे ज्ञान की उर्मि

शुक्रवार, अप्रैल 19

रत्नाकर की थाह कौन ले


रत्नाकर की थाह कौन ले



 सागर ने  जिस क्षण से स्वयं को
 लहरें होना मान लिया,
बनना, मिटना, आहत होना
उस पल से ही ठान लिया !

माना लहरें भरे ऊर्जा  
मीलों दूर चली आती हैं,
खाली सीपों के खोलों को
संग रेत बिखरा पाती हैं !

लहरों से ही जो पहचाने  
सागर उसे कहाँ मिलता है,
दूर अतल गहराई में ही
जीवन का मोती खिलता है !

भ्रम ही हो सकता सागर को
लहरों के आकर्षण से, 
कहाँ छिपेगी  ढेर संपदा
जागे लहर विकर्षण से !

थम जाती हैं  लहरें जिस पल
सागर स्वयं में टिक जाता ,
देख चकित होता फिर पल पल 
स्वयं की थाह नहीं पाता !