गुरुवार, नवंबर 15

बचपन लौटा था उस पल में



बचपन लौटा था उस पल में



बचपन को ढूँढा यादों में
बाल दिवस पर नगमे गाये,
मन के गलियारों में कितने
साथी-संगी खड़े दिखाए !

रोते हुए किसी बच्चे के
पोँछे आँसू और हँसाया,
नन्ही सी ऊँगली इक थामी
दूर गगन में चाँद दिखाया !

बचपन लौटा था उस पल में
भीतर कोई खेल रहा था,
बाहर मुस्काती थीं आँखें
जीवन लास्य उड़ेल रहा था !

फुटपाथों पर बीते बचपन
इससे बड़ी न पीड़ा होगी,
खिल सकती थी जो बगिया में
शैशव में ही कली तोड़ दी !

होनहार बिरवान सभी हैं
जरा उन्हें सिखलाना होगा,
बचपन खो जाये न अधखिला
मार्ग सही दिखलाना होगा !

तन उर्जित है जोश भरा मन
बन कुम्हार बस गढ़ना भर है,
शिशु के भीतर छुपा युवा है
दो चार कदम बढ़ना भर है !

मंगलवार, अक्तूबर 30

जगमग दीप दीवाली के


जगमग दीप दीवाली के


कुछ कह जाते
 कुछ दे जाते
सरस पावनी
ज्योति बहाते
जगमग दीप दीवाली के !

संदेसा गर
कोई सुन ले
कही-अनकही
भाषा पढ़ ले
शीतल मधुरिम 
अजिर उजाला
कोने-कोने
में भर जाते
जगमग दीप दीवाली के !

पंक्ति बद्ध
सचेत प्रहरी से
तिमिर अमावस
का हर लेते
खुद मिट कर
उजास बरसाते
रह अकम्प
थिरता भर जाते
जगमग दीप दीवाली के !

सोमवार, अक्तूबर 29

मन माटी से जैसे कोई


मन माटी से जैसे कोई


ऊँचे पर्वत, गहरी खाई
दोनों साथ-साथ रहते हैं,
कल-कल नदिया झर-झर झरने
दोनों संग-साथ बहते हैं !

नीरव जंगल, रौरव बादल
दोनों में ना अनबन कोई,
शिव का तांडव, लास्य पार्वती
दोनों में ही प्रीत समोई !

गीत प्रीत के, सहज जीत के
चलो आज मिल कर गाते हैं,
 नित्य रचे जाता नव संसृति 
उस अनाम को जो भाते हैं !

थिर अंतर में शब्द किसी का
लहरों का वर्तुल बन चहके,
मन माटी से जैसे कोई
अंकुर फूट लता बन महके !

भीतर-बाहर एक हुआ सब
सन्नाटा आधार सभी का,
मौन अबूझ शब्द हैं सीमित
दोनों में आकार उसी का !


मंगलवार, अक्तूबर 16

रौशनी थी हर कहीं




रौशनी थी हर कहीं


कुछ कहा हमने नहीं
सुन लिया उसने कहीं,
तार कोई थी जुड़ी
देख जग पाता नहीं !

एक तितली पास आ
इक सँदेसा दे गयी,
एक बदली सूर्य से
उतार ओढ़नी गयी !

डालियाँ सजने लगीं
दूब में भी आभ थी,
कोहरे बहने लगे
रौशनी थी हर कहीं !

सरल मुद्रा में मनस
गोपियों सी सादगी,
उतर शिखरों से बहे
घाटियों सी शामनी !

रविवार, अक्तूबर 14

तुम ही हो नव भक्ति स्वरूपा



तुम ही हो नव भक्ति स्वरूपा



नाम हजारों जग जननी के
है अनंत शुभ शक्ति स्वरूपा,
दया रूपिणी ! उर अंतर में
तुम ही हो नव भक्ति स्वरूपा !

सारा जग तुमसे प्रेरित हो
गतिमय निशदिन स्पंदित होता,
तुम्हीं सृष्टि जन्माती हो माँ
तुमसे जग विस्तार पा रहा !

अष्ट भुजाओं वाली देवी
समृद्धि, सुख दे शांति भर रही,
अविरल, अविरत बहे पावनी
कृपा तुम्हारी सदा झर रही !

तुम्हीं भैरवी, रुद्राणी भी
विद्या दात्री माँ भवानी,
महालक्ष्मी, पार्वती माता
गंगा, तुलसी, तुम्हीं शिवानी !

कुष्मांडा, शैल पुत्री भी
गौरी, भद्रा, दुर्गा काली,
चन्द्र घंटा व ब्रह्मचारिणी
तुम्हीं वैष्णवी शेरों वाली !

दया, क्षमा, करुणा व सरलता
लज्जा, कांति, तुम्हीं हो मेधा,
क्षुधा, पिपासा रूप में रहो
यज्ञ तुम्हीं तुम से ही समिधा !

जागो ! हे जगदम्बा ! उर में
मर्म साधना का हम जानें,
ज्योति जगे अंतर में दिपदिप
जीवन रहते ही पहचानें !


सोमवार, अक्तूबर 8

निज सुनहरी भाग्य रेखा




निज सुनहरी भाग्य रेखा


स्वप्न देखा,
उसी पल में खींच डाली
निज सुनहरी भाग्य रेखा !

एक अनुपम स्वप्न सुंदर
जागते चक्षु से मनहर
कांपते थे प्राण भीतर !

ख़ुशी के पीछे छिपी थी
एक शायद भीति रेखा
स्वप्न देखा !

हम करें साकार सपने
दाम उसका अक्स अपने 
वैश्य है कितना अनोखा !

हाथ में कूँची थमा वह
क्षीर सागर में बसा जा !
है अदेखा !


गुरुवार, अक्तूबर 4

खुद न जाने जागता मन


खुद न जाने जागता मन


स्वप्न रातों को बुने मन
नींद में कलियाँ चुने मन,
क्या छिपाए गर्भ में निज
खुद न जाने जागता मन !

कौन सा वह लोक जिसमें
कल्पना के नगर रचता,
कभी गहरी सी गुहा में
एक समाधि में ठहरता !

छोड़ देता जब सुलगना
इस-उसकी श्लाघा लेना,
खोल कर खिड़की के पाट
आसमा को लख बिलखना !

 एक अनगढ़ गीत भीतर
सुगबुगाता सा पनपता,
एक न जाना सा रस्ता
सदा कदमों को बुलाता !

राज कोई खुल न पाया
खोलने की फिकर छोड़ी,
कौन गाये नीलवन में ?
सुनो ! सरगम, तान, तोड़ी !


शनिवार, सितंबर 29

इन्द्रधनुष सा ही जग सारा



इन्द्रधनुष सा ही जग सारा


एक दिवस, दिन की गुल्लक से
कुछ अद्भुत पल चुरा लिए थे,
ऋतु सुहावनी थी बसंत की
मदमाती सुरभित हवा लिए !

पर्वत के ऊँचे शिखरों पर
हिम के स्वर्णिम फूल खिले थे,
देवदार के तरुओं पर भी
आभामय कुछ छंद लिखे थे !

स्फााटिक मणि सी निर्मल शीतल
जल धारा इक बहती जाती,
फूलों की घाटी थी नीचे
तितली, भ्रमरों को लुभाती !

उन अनमोल क्षणों को दिल की
गहराई में छुपा रखा था,
आज टटोला सिवा ख्याल के
कहीं नहीं थी उनकी छाया !

काल चक्र भरमाता अविरत
चुकती जाती जीवन धारा,
अभी यहीं है, अभी नहीं है
इन्द्रधनुष सा ही जग सारा !


गुरुवार, सितंबर 27

उर से ऐसे ही बहे छंद



उर से ऐसे ही बहे छंद


मुक्त गगन है मुक्त पवन है
मुक्त फिजायें गीत सुनातीं,
मुक्त रहे मन चाह यही तो
कदम-कदम पर है उलझाती !

सदा मुक्त जो कैद देह में 
चाहों की जंजीरें बाँधी,
नयन खुले से लगते भर हैं
कहाँ नींद से नजरें जागी !

भावों की हाला पी पीकर
होश गँवाए ठोकर खायी,
व्यर्थ किया पोषण उस 'मैं' का
बुनियाद जिसकी नहीं पायी !

हो निर्भार उड़ा अम्बर में
उस प्रियतम की थाह ना मिली,
छोड़ दिया तिरने को खग सा
विश्रांति हित डाल ना खिली !

तिरने में ही उसे पा लिया
उड़ेंं बादल ज्यों हो निर्बंध,
बरस गये करने जी हल्का
उर से ऐसे ही बहे छंद !

बुधवार, सितंबर 19

अंतर्प्रवाह


अंतर्प्रवाह

बहते हैं विचार... किसी सागर की तरह
सागर.. जो बहता है लहरों में या
भाप बनकर,
जब वह आकाश में उठ जाता है
संग हवाओं के !

जीवन भी बहता है
घटनाओं में या
फिर प्रेम भरी भावनाओं में
जब मन ऊपर उठ जाता है..
 यह तर्क है निरा... या
आत्मा की आवाज
कौन जानता है ?

शब्द आते हैं जाने किस स्रोत से
कौन उन्हें गढ़ता है भीतर गहराई में
किसने भरे हैं अर्थ उनमें
और क्या उनके लक्ष्य हैं ?  

जीवन का लक्ष्य भी क्या है
किसे पता है
मौन के सिवा कुछ नहीं है वहाँ
जहाँ जाकर रुक जाते हैं सब रस्ते
एक गहन सन्नाटा
और खामोशी !

क्यों फैलाया है इतना बड़ा माया का लोक
जहाँ होना भर है
विचारों की सीमा है
पर क्या है उसके पार
जहाँ से दिव्य गंध आती है
जहाँ जीवन एक सहज अनुभव है !