शुक्रवार, अगस्त 18

स्वप्न देखे जगत सारा

स्वप्न देखे जगत सारा 

झिलमिलाते से सितारे
झील के जल में निहारें,
रात की निस्तब्धता में
उर उसी पी को पुकारे !

अचल जल में कीट कोई
कोलाहल मचा गया है,
झूमती सी डाल ऊपर
खग कोई हिला गया है !

दूर कोई दीप जलता
राह देखे जो पथिक की,
कूक जाती पक्षिणी फिर
नींद खुलती बस क्षणिक सी !

स्वप्न देखे जगत सारा
रात्रि ज्यों भ्रम जाल डाले,
कालिमा के आवरण में
कृत्य कितने ही निभा ले !


बुधवार, अगस्त 16

फूल ढूँढने निकला खुशबू

फूल ढूँढने निकला खुशबू

पानी मथे जाता संसार
बाहर ढूँढ रहा है प्यार,
फूल ढूँढने निकला खुशबू
मानव ढूँढे जग में सार !

लगे यहाँ  राजा भी भिक्षुक
नेता मत के पीछे चलता,
सबने गाड़े अपने खेमे
बंदर बाँट खेल है चलता !

सही गलत का भेद खो रहा
लक्ष्मण रेखा मिटी कभी की.
मूल्यों की फ़िक्र भी छूटी
गहरी नींद न टूटी जग की !

जरा जाग कर देखे कोई
कंकर जोड़े, हीरे त्यागे,
व्यर्थ दौड़ में बही ऊर्जा
पहुँचे कहीं न वर्षों भागे !

 चहुँ ओर बिखरा है सुदर्शन
आँखें मूँदे उससे रहता,
तृप्त न होता भिक्षु मन कभी
अहंकार किस बूते करता !

हर क्षण लेकिन भीतर कोई
बैठा ही है पलक बिछाये,
कब आँखें उस ओर मुड़ेगीं
जाने कब वह शुभ दिन आये !

सोमवार, अगस्त 14

कान्हा तेरे नाम हजारों

कान्हा तेरे नाम हजारों

जब नभ पर बादल छाये हों
वन से लौट रही गाएँ हों,
दूर कहीं वंशी बजती हो
 पग में पायलिया सजती हो !

मोर नाचते कुंजों में हों
खिले कदम्ब निकुंजों में हों,
वह चितचोर हमारे उर को,
कहीं चुराए ले जाता है !

कान्हा याद बहुत आता है !

भादों की जब झड़ी लगी थी
अंधियारी अष्टमी आयी,
लीलाधर ! वह आया जग में
पावन वसुंधरा मुस्कायी !

कितनी हर्षित हुई देवकी,
सुसफल तपस्या वसुदेव की,
टूटे बंधन जब प्रकट हुआ
मिटा अँधेरा जग गाता है !

कृष्ण सभी के मन भाता है !

यमुना की लहरें चढ़ आयीं
मथुरा छोड़ चले जब कान्हा,
लिया आश्रय योगमाया का
नन्दगाँव गोकुल निज माना !

नन्द, यशोदा, दाऊ, दामा
बने साक्षी लीलाओं के,
माखन चोरी, ऊखल बंधन
दुष्ट दमन प्रिय हर गाथा है !

जन-जन नित्य जिन्हें गाता है !

मधुरातिमधुरम वेणु वादन
 ग्वाल-गोपियाँ मुग्ध हुईं सुन,
नृत्य अनूप त्रिभंगी मुद्रा
  राधा संग बजी वंशी धुन !

चेतन जड़, जड़ चेतन होते
गोकुल, ब्रज, वृन्दावन पावन,
युग बीते तेरी लीला से
नित नवीन रस जग पाता है !

कृष्णा नव रस भर जाता है !

कान्हा तेरे नाम हजारों,
मधुर भाव हर नाम जगाए,
कानों में घोले मिश्री रस
माखन सा अंतर पिघलाए !

तेरी बातें कहते सुनते
तेरी लीला गाते सुनते
न जाने कब समय का पंछी,
पंख लगाये उड़ जाता है !

अंतर मन को हर्षाता है !


शुक्रवार, अगस्त 11

तिर जाओ पात से

तिर जाओ पात से

सुनो ! तारे गाते हैं
फूलों के झुरमुट.. प्रीत गीत गुनगुनाते हैं
पल भर को निकट जाओ वृक्षों के
कानों में कैसी, धुन भर जाते हैं !

देखो ! गगन तकता है
बदलियों का झुंड झूम-झूम कर बरसता है
ठिठको जरा सा.. बैठो, हरी घास पर
पा परस दिल.. कैसे धड़कता है !

बहो ! कलकल बहती है
नदिया की धारा नाच बात यही कहती है
पात से तिर जाओ नीर संग
हृदय की तृषा मिटे, छांव वह मिलती है !

जगो !  उषा जगाती है
हर भोर उसी का संदेश लेकर आती है
आतुर है प्रकृति लुटाने को
ज्योति भरे नित नवीन, अंकुर उगाती है !







शनिवार, अगस्त 5

श्रावण की पूनम

श्रावण की पूनम

गगन पर छाए मेघ
लगे हरियाली के अंबार
बेला और मोगरे की सुगंध से सुवासित हुई हवा
आया राखी का त्योहार गाने लगी फिजां !
भाई-बहन के अजस्र निर्मल नेह का अजर स्रोत
सावन की जल धाराओं में ही तो नहीं छुपा है !
श्रावण की पूनम के आते ही
याद आते हैं रंग-बिरंगे धागे
कलाइयों की शोभा बढ़ाते
आरती के शुभ थाल
अक्षत रोली से सजे भाल 
बहनों के दिल से निकलती अनमोल प्रार्थनाएं
मन्त्रों सी पावन और गंगा सी विमल भावनाएँ
चन्द्र ग्रहण कर पायेगा न कम
इस उत्सव की उजास
दिलों में बसा नेह का प्रकाश 
बहन का प्रेम और विश्वास
भाई द्वारा दिए रक्षा के आश्वास  !

गुरुवार, अगस्त 3

हर पगडंडी वहीं जा रही

हर पगडंडी वहीं जा रही

कोई उत्तर दिशा चल रहे
दक्षिण दिशा किन्हीं को प्यारी,
मंजिल पर मिलना ही होगा
हर पगडंडी वहीं जा रही !

भर नयनों में प्रेमिल आँसू
जब वे गीत विरह के गाते,
बाना ओढ़े समाधान का
तत्क्षण दूजे भी जुड़ जाते !

‘तेरे’ सिवा न कोई दूजा
कह कुछ मस्तक नहीं उठाते,
केवल खुद पर दृष्टि जिनकी
स्वयं को मीलों तक फैलाते !

कहनेवाले दो कहते हैं
राज ‘एक’ है जिसने जाना !
भेद नहीं करते तिल भर भी  
राधा, उद्धव में कभी कान्हा !


शुक्रवार, जुलाई 28

थम जाता सुन मधुर रागिनी

थम जाता सुन मधुर रागिनी

कोमल उर की कोंपल भीतर
खिलने को आतुर है प्रतिपल,
जब तक खुद को नहीं लुटाया
दूर नजर आती है मंजिल !

मनवा पल-पल इत-उत डोले
ठहरा आहट पाकर जिसकी,
जैसे हिरण कुलाँचे भरता
थम जाता सुन मधुर रागिनी !

जिसके आते ही उर प्रांगण
देव वाटिका सा खिल जाता,
हौले-हौले कदम धरे जब
मन नव कुंदन बन मुस्काता !

स्वयं ही दूर-दूर रहे हम
दुःख छाया में जन्मों बीते,
सुख बदली बन वह आता है
एक पुकार उठे अन्तर से !

रह ना पाए अनुपम प्रेमिल
पावन है वह करता पावन,
अर्पित मन को करना होगा
युग-युग से हो रहा अपावन !

आह्लादित है सृष्टि प्रतिपल
खिला हुआ वह नील कमल सा,
धरे धरा बन छाँव गगन की
पंछी सा नव सुर में गाता !

कोई उसका हाथ थाम ले
बरबस कदमों में झुक जाये,
दूरी नहीं भेद नहीं शेष
तृप्त हुआ सा डोले गाये !


सोमवार, जुलाई 24

कविता हुंकारना चाहती है

कविता हुंकारना चाहती है

छिपी है अंतर के गह्वर में
या उड़ रही है नील अंतरिक्ष की ऊँचाईयों में
घूमती बियाबान मरुथलों में
या डुबकी लगाती है सागर की गहराइयों में
तिरती गंगा की शांत धारा संग
कभी डोलती बन कावेरी की ऊंची तरंग
खोज रही है अपना ठिकाना
झांकती नेत्रों में... नहीं उसके लिए कोई अजाना
 घायल हो सुबकती हिंसक भीड़ देख
पड़ जाती मस्तक पर नहीं मिटने वाली रेख
 पूछती कितने सवाल
क्यों धर्म, जाति और देश की
हदों के नाम पर इतना बवाल
तोड़ कर हर घेरा झाँकना चाहती है
जातीयता की संकीर्ण दीवारों के पार
शांति की मशाल बन जलना चाहती है
बरसना चाहती है शीतल फुहार बनकर
जला दिए जिनके स्कूल
चंद सिरफिरे वहशी दरिंदों ने
उन मासूमों के गाँव पर
उनके जमीरों के भीतर भी ढूँढना चाहती है
इंसानियत की एक खोयी किरण
सोये हुए लोगों को जगाने के लिए
अमन और चैन की हवा बहाने के लिए
आंधी बनकर घुमड़ना चाहती है
गरज-गरज कर
कविता हुंकारना चाहती है !

शनिवार, जुलाई 15

उन अँधेरों से डरें क्यों

उन अँधेरों से डरें क्यों


खो गया है घर में कोई चलो उसे ढूँढ़ते हैं
बह रही जो मन की सरिता बांध कोई बाँधते हैं

आँधियों की ऊर्जा को पाल में कैसे समेटें 
उन हवाओं से ही जाकर राज इसका पूछते हैं

इक दिया, कुछ तेल, बाती जब तलक ये पास अपने
उन अँधेरों से डरें क्यों खुद जो रस्ता खोजते हैं

हँसे पल में पल में रोए मन शिशु से कम नहीं है
दूर हट के उस नादां की हरकतें हम देखते हैं

कुछ नहीं है पास खुद के बाँस जैसी खोखली जो
उस अकड़ को शान से चेहरे बदलते देखते हैं  

बुधवार, जुलाई 12

गाना होगा अनगाया गीत

गाना होगा अनगाया गीत


गंध भी प्रतीक्षा करती है
उन नासापुटों की, जो उसे सराहें
प्रसाद भी प्रतीक्षा करता है
उन हाथों की, जो उसे स्वीकार लें
जो मिला उसे बांटना होगा
होने को आये जो हो जाना होगा
गाना होगा अनगाया गीत
लुटाना होगा वह कोष भीतर छुपा   
पलकों में बंद ख्वाबों को,
रात्रि का अँधकार नहीं सुबह का उजाला चाहिए
अंतर में भरी नर्माहट को शब्दों का सहारा चाहिए
गर्माहट जो सर्दियों की धूप गयी थी भर 
अलस जो भर गयी तपती दोपहर,
उन्हें उड़ेंलना होगा
बचपन में मिले सारे दुलार को
किस्सों में सुने परी के प्यार को
चाँद पर चरखा कातती बुढ़िया
रोती-हँसती सी जापानी गुड़िया
देख-देख कर जो मुस्कान की कैद हृदय में
उसे बिखराना होगा
बारिश की पहली-पहली बौछार में
भीगने का वह सहज आनंद
हृदय में लिए नहीं जाना होगा
इस जग ने कितना-कितना भर दिया है
मनस को उजागर कर दिया है
पिता की कहानियों का वह जादूगर
जो उगाता था सोने के पेड़ और चाँदी के फल
जीवन में पाए अनायास ही वे अमोल पल
अंतहीन वक्त की कोरी चादर पर
कुछ अमोल बूटे काढ़ने हैं
राह दिखाएँ भटके हुओं को
ऐसे कई और दीपक बालने हैं !