मंगलवार, मार्च 19

अगन होलिका की है पावन




अगन होलिका की है पावन

बासंती मौसम बौराया
मन मदमस्त हुआ मुस्काया,
फागुन पवन बही है जबसे
अंतर में उल्लास समाया !

रंगों ने फिर दिया निमंत्रण
मुक्त हो रहो तोड़ो बंधन,
जल जाएँ सब क्लेश हृदय के
अगन होलिका की है पावन !

जली होलिका जैसे उस दिन
जलें सभी संशय हर उर के,
शेष रहे प्रहलाद खुशी का
मिलन घटे उससे जी भर के !

उड़े गुलाल, अबीर फिजां में
जैसे हल्का मन उड़ जाये,
रंगों के जरिये ही जाकर
प्रियतम का संदेशा लाए !

सीमित हैं मानव के रंग
पर अनंत मधुमास का यौवन,
थक कर थम जाता है उत्सव
चलता रहता उसका नर्तन !


मंगलवार, मार्च 12

बिखरा दूँ, फिर मुस्का लूँ



बिखरा दूँफिर मुस्का लूँ 


खाली कर दूँ अपना दामन
जग को सब कुछ दे डालूँ, 
प्रीत ह्रदय की, गीत प्रणय के
बिखरा दूँ, फिर मुस्का लूँ !

तन की दीवारों के पीछे
मन मंदिर की गहन गुफा,
जगमग दीप उजाला जग में
फैला दूँ, फिर मुस्का लूँ !

अंतर्मन की गहराई में
सुर अनुपम नाद गूंजता,
चुन-चुन कर मधु गुंजन जग में
गुंजा दूँ, फिर मुस्का लूँ !

भीतर बहते मधुमय नद जो 
प्याले भर-भर उर पाता,
अमियसरिस रस धार जगत में
लहरा दूँ, फिर मुस्का लूँ !

हुआ सुवासित तन-मन जिससे
 भरे खजाने हैं भीतर
सुरभि सुगन्धित पावन सुखमय
छितरा दूँ, फिर मुस्का लूँ !


शनिवार, मार्च 9

सत्यमेव जयते


सत्यमेव जयते


कहा जा रहा है
जो भी कहा जाना चाहिए
न ही छिपा है और न ही थमा है
हो रहा है विरोध
जो किया जाना चाहिए
हर जुल्म के खिलाफ खड़ा है कोई न कोई डटकर
जिसका गुलशन है नहीं रह सकता कभी वह बेखबर
सुन लेता है चींटी की आवाज भी जो
भर देता है वही शोले किसी कलम में
सुलगती ज्वालायें किन्हीं दिलों में
जो निगल जाएँगी हर अन्याय को
तुम बढ़ते रहो अपनी डगर पर
होकर निडर
और नहीं सोचो एक क्षण के लिए भी
कि इंसाफ की इस राह पर तुम अकेले हो
अस्तित्त्व का हर कण भी लड़ रहा है वही युद्ध
जो किसी सुदूर कोने में लड़ा जा रहा है
किसी बेबस माँ द्वारा अपने शिशु की रक्षा के लिए
अथवा किसी खेतिहर द्वारा जमीन की रक्षा हित
उठ रही हैं आवाजें हर कोने में
और नहीं दबाया जा सकता उन्हें
पहरे कितने ही संगीन हों और
दीवारें कितनी ही अजेय
झूठ कितने ही सजीले वेश धरें
सच की ही होगी विजय !

शनिवार, मार्च 2

जिन्दगी का गीत मिलकर


जिन्दगी का गीत मिलकर


सादगी हो जिन्दगी में
दिलों में थोड़ी शराफत,
दिन कयामत अगर आये
खुशदिली से करें स्वागत !

नफरतों की बात ना हो
दूरियां मिट जाएंं दिल से,
प्यार के किस्से कहेंं फिर
फूल बन मुस्काएं खिल के !

'शुक्रिया' हर साँस में हो
 हर दिल से बन दरिया बहे,
इश्क की ही जीत होगी
हर शब्द अपना यह कहे !

सुख की ही चाहत जगे न 
दुःख से न नजरें चुराएँ,
जिन्दगी का गीत मिलकर
हर जुबां में गुनगुनाएं !

आज दिल में उठे ख्वाहिश
 दोस्ती हो जंग ना हो,
खूबसूरत इस जहाँ में
बेरुखी का रंग न हो !

बुधवार, फ़रवरी 27

भारत


भारत

आज समरांगण बना शांति प्रिय यह देश !

अहिंसा परम धर्म, हिंसा इसे न भायी
हो विवश निज रक्षा हित बंदूक उठायी

युद्ध का मैदां बना अमन का यह देश !

‘अतिथि देवो भव’ कह आगत सत्कार किया
आतंकी जब बना हो विवश प्रहार किया

रक्त रंजित हुआ प्राचीनतम यह देश !

समिधा बना जीवन हवाएं भयीं शीतल
आहुति देती समर्थ वीरसेना प्रतिपल

गौरवान्वित हुआ यह कृष्ण वाला देश !


शनिवार, फ़रवरी 23

एक जागरण ऐसा भी हो



एक जागरण ऐसा भी हो


पल में गोचर हो अनंत यह
इक दृष्टिकोण ऐसा भी हो,
जिसकी कोई रात न आये
एक जागरण ऐसा भी हो !

कुदरत निशदिन जाग रही है
अंधकार में बीज पनपते,
गहन भूमि के अंतर में ही
घिसते पत्थर हीरे बनते !

राह मिलेगी उसी कसक से
होश जगाने जो आती है,
धूप घनी, कंटक पथ में जब
एक ऊर्जा जग जाती है !

प्रीत चाहता उर यदि स्वयं तो

अप्रीति के करे न साधन,
मंजिल की हो चाह हृदय में
अम्बर में उड़ने से विकर्षण ?


डोर बँधी पंछी पग में जब
कितनी दूर उड़ान भरेगा,
सुख स्वप्नों में खोया अंतर
दुःख की पीड़ा जाग सहेगा !





बुधवार, फ़रवरी 20

नभ झाँके जिस पावन पल में


नभ झाँके जिस पावन पल में



सुखद खुमारी अनजानी सी
‘मदहोशी’ जो होश जगाए,
सुमिरन की इक नदी बह रही
रग-रग तन की चले भिगाए !

नीले जल में मन दरिया के
पत्तों सी सिहरन कुछ गाती,
नभ झाँके जिस पावन पल में
छल-छल कल-कल लहर उठाती !

छू जाती है अंतर्मन को
लहर उठी जो छुए चाँदनी,
एक नजर भर देख शशी को
छुप जाती ज्यों पहन ओढ़नी !


मंगलवार, फ़रवरी 19

सुख की परछाई है पीड़ा




सुख की परछाई है पीड़ा

सुख की चादर ओढ़ी ऐसी
धूमिल हुई दृष्टि पर्दों में,
सच दिनकर सा चमक रहा है
किन्तु रहा ओझल ही खुद से !

सुख मोहक धर रूप सलोना
आशा के रज्जु से बांधे,
दुःख बंधन के पाश खोलता
मन पंछी क्यों उससे भागे ?

सुख की परछाई है पीड़ा
दुःख जीवन में बोध जगाता,
फिर भी अनजाना भोला मन
निशदिन सुख की दौड़ लगाता !

क्यों उस सुख की चाह करें जो
दुःख के गह्वर में ले जाये,
अभय अंजुरी पीनी होगी
तज यह भय सुख खो ना जाये !


शनिवार, फ़रवरी 16

ऐसा है वह अनंत


ऐसा है वह अनंत

चादर की तरह लपेट लिया है काँधे पर
उसने नीले आकाश को
मस्तक पर चाँद की बिंदी लगाये
धार लिया है सूरज वक्षस्थल पर गलहार में
आकाश गंगाएं उसकी क्रीडा स्थली हैं
सितारों को पहन लिया है कानों में
बादलों में छिपी बूँदें
बन गयी हैं पाजेब पैरों की
दिशाओं को भर लिया है हाथों में
ऐसा है वह अनंत
उसे कोई भी नाम दो
हर रोज उतरता है धरा पर
साथ जागरण के
हर रात झांकता है नींद में !

शुक्रवार, फ़रवरी 15

तृष्णा दुष्पूर है


तृष्णा दुष्पूर है

कश्मीर को भारत से
अलग करने की तृष्णा की आग में
जलता हुआ पाकिस्तान
बाँट रहा है वही हिंसा की आग
 विश्व देख रहा है विनाश के इस पागलपन को
कभी धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला
 कश्मीर आज जल रहा है
और जल रहे हैं अमन बहाल करने वाले वीर
महर्षि कश्यप की तप स्थली रही यह घाटी
जो वेदों के गान से गुंजित थी
रक्त रंजित है आज
जो कभी सम्राट अशोक के साम्राज्य का भाग थी
विक्रमादित्य के कदम भी पड़े थे जहाँ
मौजूद हैं जहाँ गणपति और भवानी के मन्दिर
महाभारत काल से
ऋषि परंपरा और सूफी इस्लाम की
शांति पूर्ण सहभागिता से पोषित
सिखों के महाराजा हरिसिंह की पावन धरा
 आज पुकारती है इंसाफ के लिए
दम घुटता है उसका
बमों और हथियारों के साये में
जीने को विवश हैं जहाँ लोग
भारत की शान और मान
पूछती है काश्मीर की यह घाटी
न जाने कितने वीरों को और बलिदान देना होगा
न जाने कब यहाँ शांति का फूल खिलेगा
प्रश्न ही प्रश्न हैं उत्तर कौन देगा ..?


बुधवार, फ़रवरी 13

तू महासूर्य मैं एक किरण




तू महासूर्य मैं एक किरण


तू महासूर्य मैं एक किरण
तू सिंधु अतल हूँ लहर एक,
मैं भ्रमर बना डोला करता
शुभ खिला हुआ तू कमल एक !

मैं श्वेत श्याम घन अम्बर का
तू विस्तारित नील आकाश,
मैं गगन तारिका जुगनू सम 
तू ज्योतिर्मया महा प्रकाश !

तू महा आरण्य चन्दनवट
मैं कोमल डाली इक वट की,
तू ज्वाला का इक महाकुंड
मैं लघु काया इक चिंगारी !

तू अन्तरिक्ष है अंतहीन
छोटा सा ग्रह मैं घूम रहा,
तू महाप्रलय सा दीर्घ पवन
मैं मंद समीरण बन बहता !