शनिवार, अप्रैल 19

मन का दर्पण

बन जाता जब  मानसरोवर  मन का दर्पण
हंस तैरते हैं स्मृति के
कैलाश के उत्तंग शिखरों पर
थम जाती है जीवन चेतना
नहीं भाता जगत का कोलाहल
उहापोह अंतर की
ठहर जाता है आलोक प्रज्ञा का
अनवरत धारा बनकर
गंगा की लहरों का नर्तन
स्वर्ण रश्मियों का फैलाव
तृप्त हुआ मन
नहीं भासता अल्प अभाव
जग यह घाट सरोवर का ज्यों
जीते मरते पल पल प्राणी
रोते हंसते गाते खाते
चेहरे बदल गये हों जैसे
चलती हो कोई दीर्घ कहानी

शनिवार, अप्रैल 12

शुभकामनायें


प्रिय ब्लागर मित्रों, आने वाले त्योहारों के लिए आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें ! अगले दस-बारह दिनों के लिए मैं वाराणसी की यात्रा पर जा रही हूँ. गंगा के घाटों के कुछ चित्रों तथा किसी नई रचना के साथ पुनः आपसे भेंट होगी, तब तक के लिए विदा.

शुक्रवार, अप्रैल 11

एक मौन सन्नाटा भीतर

एक मौन सन्नाटा भीतर



सहज कभी था आज जटिल है
कृत्य कुंद जब भाव सुप्त है,
एक मौन सन्नाटा भीतर
हुई शब्दों की धार लुप्त है !

नहीं लालसा, नहीं कामना
जीवन की ज्यों गति थमी है,
इक आधार मिला नौका को
बीच धार पतवार गुमी है !

अब न कहीं जाना राही को
घर से दूर निकल आया है,
ममता के पर कटे मुक्ति का
राग हृदय को अब भाया है !

न कोई संदेश भेजना
 न ही कोई छाप छोड़ना,
लक्ष्य सभी पीछे छूटे हैं
नहीं राम को धनुष तोड़ना !

जीवन, जब जैसा मिल जाये
दोनों बाँह पसारे लेता,
 जहाँ जरूरत जो भी दिखती
अंतर को खाली कर देता !  

बुधवार, अप्रैल 9

मिला वही उजियारा बनकर

मिला वही उजियारा बनकर


अँधियारा छंट गया उसी पल
बन याद इक बसी हृदय में
 एक गीत की कड़ी सुमधुर !

नयन भिगोये कसक घनी थी
राह नजर नहीं आती थी
 मिला वही उजियारा बनकर !

हारा तम हुई विजय उषा की
 टूटे बंधन मुक्त हुआ मन
स्वप्नों को भी लगे नये पर ! 

गुरुवार, अप्रैल 3

तब और अब


तब और अब

देहें तब चमकदार हुआ करती थीं
जिनमें देवों का वास था
थी आदमी और देवता में एक आत्मीयता
और सहयोग की भावना
मनों की शक्तियाँ अकूत थीं
वनस्पतियाँ तक अपने राज खोलती थीं
ध्यान में लीन ऋषि से
गुण धर्म बोलती थीं
दूर नक्षत्रों तक सहज ही गमन करते थे ध्यानी
परमात्मा से तब तक मानव ने रार नहीं थी ठानी
धीरे-धीरे हुई विस्मृति
मद, मान और मोह ने की अवनति
देहें अब मात्र खाद्यान्न भरने का यंत्र हैं
देवों को किया देवालयों में बंद है
दोनों कभी-कभी मिलते हैं
अधिक तो उनके होने पर ही संशय करते हैं
विमुग्ध है मानव निज ज्ञान पर
वंचित है किस सुख से यह भी नहीं जानता
अपने ही स्रोत के अस्तित्त्व को नहीं मानता...

सोमवार, मार्च 31

बन जाये मन स्वयं उजास

बन जाये मन स्वयं उजास




झर जाता है कुम्हलाया पुष्प
 धरा पर आहिस्ता से जैसे
बिखर जाती है पाँखुरी-पाँखुरी
सहजता से विलग हो डाली से
पिघल जाये वैसे ही सारी उदासी
मन रहे निर्मल.. पल पल..
यही प्रार्थना है !

हर बादल बरस जाता है जैसे
निज भार से हो पीड़ित
बिखर जाती है बूँद बूँद
सहजता से धरा पर
खो जाये हर छोटी बड़ी कामना
 खिला रहे मन का आकाश..
निरभ्र नील वितान सा
यही अर्चना है !

उजाला भर जाता है जैसे
नन्हा सा एक दीया..
जल जाये दुःख के तेल में
बाती अहंकार की
बन जाये मन स्वयं उजास
यही वन्दना है !



गुरुवार, मार्च 27

जीवन में जब शुभ घटता है

जीवन में जब शुभ घटता है


व्यस्त हस्त चल रहे पाद दो
पल पल अंतर सुर बंटता है

निर्निमेष हैं मुग्ध नयन
पल-पल में अश्रु बहता है

एक गति भावों को मिलती
जीवन में जब शुभ घटता है

मुक्त हास हर पूर्ण आस तब
हरसिंगार हर रुत झरता है

अभिव्यक्ति होती है उसकी
पावनता से मन भरता है

पग में नृत्य गीत अधरों पर
सहज हुआ सा जो रहता है

माँ का हाथ सदा सर पर ज्यों
जैसे गंगा जल बहता है    


सोमवार, मार्च 24

झर जायेगा पतझड़ सारा

झर जायेगा पतझड़ सारा



सच को अनदेखा हम करते
फिर उखड़े उखड़े से रहते,
वही देखते जो मन चाहे
वरना नयन मुंदे ही रहते !

सच को जो सच ही मानता
बन द्रष्टा मन लीला जाने,
वही मुक्त होकर रह पाता
पल-पल उसके बने सुहाने !

झर जायेगा पतझड़ सारा
नूतनता हर पल झलकेगी,
कोई भर देगा अमृत भी
गागर जब पूरी निखरेगी !

प्रकृति प्रेम लुटाना जाने
दीवाने हम खुद में खोये
 नजर उठाकर नहीं निहारें
चंदा तारे नभ में सोये !

छोटे-छोटे इम्तहान से
पल भर में ही घबरा जाते
असल परीक्षा शेष अभी है
मिलें मृत्यु से हंसते गाते !  

शुक्रवार, मार्च 21

जब शासक वह बन जाता है


जब शासक वह बन जाता है


दायित्वों का बोझ उठाना
कर्त्तव्यों को ठीक निभाना,
स्वयं तक सीमित रह जाता है
सेवक बन के जो आता है.

जब शासक वह बन जाता है !

प्रेम के पथ से है अनजाना
सेवा में सुख वह क्या जाने,
न नीति न शेष राज है
 राजनीति वंचित दोनों से !

दुःख ही बस फैला जाता है !

ईर्ष्या, भय, शंका, अभिमान
यही सम्भाले चलता रहता,
शक्ति व अधिकार मिले जो
निज सुख हेतु उन्हें भुनाता.

पतन ही मंजिल पर पाता है !

कितनी मुस्कानें ओढ़ी हों
निर्मलता अंतर की कुचल दे,
स्वप्न भी उसके कम्पित करते
जो विवेक को ताक पे रख दे.

सच से नजर चुरा जाता है !  



मंगलवार, मार्च 18

कौन है वह


कौन है वह



दिल की गहराई जो जाने
उसके सम्मुख ही दिल खोलें

जन्मों का जो मीत पुराना
मन की बात उसे ही बोलें

दूर तलक जो साथ चलेगा
पथ में उसके संग ही डोलें

काँटों को जो फूल बना दे
संग उसके ही स्वप्न पिरो लें

अंतर वीणा को जो गा दे
उसके ही नयनों को तोलें  

सम्भव सब है इस चोले में
मानव हो हर दुःख को धो लें

जो भी इर्द - गिर्द फैला है
उत्सव बनकर उसमें खो लें




शुक्रवार, मार्च 14

वही


वही  


अस्तित्त्व की गहनतम पुकार
हवा और धूप की तरह जो
 बिखरा है चारों ओर
पर फिसल-फिसल जाता है
मुट्ठी से जलधार की तरह..
सूक्षतम इकाई भी अस्तित्त्व की
 जो सीख लेता है देना
 जान ही लेगा वह पाने का राज भी
 जीत की चाह गिर जाती है जिस क्षण
हार भी छोड़ देती है रास्ता
सुख की तलाश खत्म होते ही  
हो जाता है हर दुःख बेगाना....

सोमवार, मार्च 10

नीलमणि सा कोई भीतर

नीलमणि सा कोई भीतर



कितने दर्द छिपाए भीतर
 ऊपर-ऊपर से हँसता है,
 कितनी परतें चढ़ी हैं मन पर
 बहुत दूर खुद से बसता है !

जरा उघेड़ें उन परतों को
 नीलमणि सा कोई भीतर,
जगमग चमचम दीप जल रहा
झलक दिखाने को आतुर !

कभी लुभाता जगत, यह जीवन
छूट न जाये भय सताता,
कभी मगन हो स्वप्न सजाये
भावी सुख के गीत बनाता !

इस पल में ही केवल सुख है
जिसने अब तक राज न जाना,
आशा ही बस उसे जिलाती
जिसने खुद को न पहचाना !

जीना जिसने सीख लिया है
कुछ भी पाना न शेष रहा,
हर क्षण ही तब मुक्ति का है
लक्ष्य न कोई विशेष रहा !   

मंगलवार, मार्च 4

आना वसंत का

आना वसंत का

जब नहीं रह जाती शेष कोई आशा
 निराशा के भी पंख कट जाते हैं तत्क्ष्ण !
जब नहीं रह जाती ‘मैं’ की धूमिल सी छाया भी
उसकी झलक मिलने लगती है उसी क्षण
निर्भर, निर्मल वितान सा जब फ़ैल जाता है
मन का कैनवास
 प्रेम के रंग बिखेर जाता है कोई अदृश्य हाथ
माँ की तरह साया बन कर चेताती चलती है
छंद मयी हो जाती है कायनात !
छूट जाते हैं जब सारे आधार
तब ही भीतर कोई कली खिलती है
बज उठते हैं मृदंग और साज
जुड़ जाते हैं जाने किससे अंतर के तार !
जब पक जाता है ध्यान का फल भी
झर जाता है जन्मों का पतझड़
और उतर आता है चिर वसंत जीवन में !



शनिवार, मार्च 1

वर्षा को भी मची है जल्दी

वर्षा को भी मची है जल्दी


टिप-टिप बूंदें दूर गगन से
ले आतीं संदेश प्रीत के,
धरा हुलसती हरियाली पा
खिल हँसती ज्यों बोल गीत के !

शिशिर अभी तो गया नहीं है
 रुत वसंत आने को है,
मेघों का क्या काम अभी से
 फागुन माह चढ़ा भर है !

वर्षा को भी मची है जल्दी
उधर फूल खिलने को आतुर,
मोर शीत में खड़े कांपते
 अभी नहीं जगे हैं दादुर !

मानव का ही आमन्त्रण है
उथल-पथल जो मची गगन में,
बेमौसम ही शाक उगाता
बिन मौसम फल-फूल चमन में !