रविवार, सितंबर 16

तलाश



तलाश 

जाने किसकी प्रतीक्षा में सोते नहीं नयन
जाने किस घड़ी की आस में
जिए चले जाता है जीवन
शायद वह स्वयं ही प्यास बनकर भीतर प्रकटा है
अपनी ही चाहत में कोई प्राण अटका है
सब होकर भी जब कुछ भी नहीं पास अपने
नहीं लुभाते अब परियों के भी सपने
इस जगत का सारा मायाजाल देख लिया
उस जगत का सारा इंद्रजाल भी चूक गया
मन कहीं नहीं टिका.. अब कौन सा पड़ाव ?
किस वृक्ष की घनी छाँव
कैसे मिलेगा मन का वह भाव
या फिर मन ही खो जाने को है
अब अंतिम सांसे गिनता है
अब यह पीड़ा भी कहनी होगी
जीने से पहले मरने की क्रीड़ा तो सहनी होगी
दिल की गहराई में जो वीणा बजती है
जहाँ से डोर जीवन की बढ़ती है
उस अतल में जाना होगा
असीम निर्जन में स्वयं को ठहराना होगा..
जब कोई तलाश बाकी नहीं रहती
तभी अक्सर खुल जाता है द्वार
जिस अनजाने लोक का...

बुधवार, सितंबर 12

प्रतीक्षा


प्रतीक्षा 

नहीं, अब कुछ भी नहीं रुचता
न ही बादलों का शोर
न नाचता हुआ मोर
न वर्षा का बरसता हुआ जल
न झरनों की कलकल
न पंछियों की टीवी टुट् लुभाती है
न ही रुत सावन की भाती है
अब तो उस श्याम की प्रतीक्षा है
जो इन घनघोर घटाओं से भी काला है
जो इन हवाओं से भी मतवाला है !

सोमवार, सितंबर 10

जलधाराओं का संगीत


जलधाराओं का संगीत 

नभ से गिरती हुई जल धाराएँ
जिनमें छुपा है एक संगीत
जाने किस लोक से आती हैं
धरा को तृप्त कर माटी को कोख से
नव अंकुर जगाती हैं
सुंदर लगती हैं नन्ही-नन्ही बूँदें
धरती पर बहती हुई छोटी छोटी नदियाँ
जो वर्षा रुकते ही हो जाती हैं विलीन
गगन में उठा घनों का गर्जन
और लपलपाती हुई विद्युत रेखा
दिन में ही रात्रि का भास देता हुआ अंधकार
 दीप्त हो जाता है पल भर को
जैसे कोई विचार कौंध जाये मन में
और पुलक सी भर जाये तन में !


शुक्रवार, सितंबर 7

जीवन अमृत बहा जा रहा



जीवन अमृत बहा जा रहा


कितनी बार चुभे हैं कंटक
कितनी बार स्वप्न टूटे हैं,
फिर-फिर राग लगाता यह दिल
कितने संग-साथ छूटे हैं !

सुख की फसल लगाने जाते
किन्तु उगे हैं दुःख ही उसमें,
धन के भी अम्बार लगे हों
भीतर का अभाव ही झलके !

ऊपर चढ़ने की खातिर जब
कर उपेक्षा छोड़ा होगा,
लौट-लौट आयेंगे वे पल
कितनों का दिल तोड़ा होगा !

फूलों की जब चाहत की थी
काँटों के जंगल बोये थे,
जगें स्वर्ग में नयन खुलें जब
चाहा, लेकिन खुद सोये थे !

कैसे जीवन पुष्प खिलेगा
कोई तो आकर सिखलाये,
जीवन अमृत बहा जा रहा
कोई क्यों फिर प्यासा जाये !

सोमवार, सितंबर 3

ऐसा दीवाना है कान्हा

ऐसा दीवाना है कान्हा 

आँसू बनकर जो बहता है 
मौन रहे पर कुछ कहता है
किसी नाम से उसे पुकारो
उपालम्भ जो सब सहता है ! 

  हो अनजाना कोई उससे 
तब भी वह रग-रग पहचाने
इक दिन तो पथ पर आएगा 
कब तक कोई करे बहाने! 

जब तक उसकी ओर न देखो 
नेह सँदेसे भेजा करता
कभी हँसा कर कभी रुलाकर 
अपनी याद दिलाया करता ! 

ऐसा दीवाना है कान्हा 
प्रीत पाश में ऐसा जकड़े
हाथ छुड़ा तब जाता लगता 
जब कोई खुद से ही झगड़े !

अँधियारी हो रात अमावस 
हीरे मोती सा वह दमके
काली यमुना उफन रही हो 
उजियारा बनकर वह चमके !


रविवार, सितंबर 2

कृष्ण जन्म


कृष्ण जन्म 

यह तन कारागार है अहंकार है कंस
पञ्च इन्द्रियाँ संतरी भीतर बंदी हंस !

बुद्धि हमारी देवकी मन-अंतर वसुदेव
इन दोनों का मिलन बना आनंद का गेह !

प्रहरी सब सो गए इन्द्रियाँ हुईं उपराम
हृदय बुद्धि में खो गया भीतर प्रकटे श्याम !

अविरति है कालिंदी पार है गोकुल धाम
मिटा मन का राग तो खुद आया घनश्याम !

शुक्रवार, अगस्त 31

उन सभी युवाओं को समर्पित जो विवाह बंधन में बंधने वाले हैं




 यह बंधन तो प्रेम का बंधन है 

बचपन से किशोर फिर युवा होते तन
फिर भी रहे वही बच्चों वाले प्यारे से मन
उन्हीं मासूम मनों के बंधन में बंधे हो तुम दोनों
एक-दूसरे का सम्बल बनकर
देखभाल और परख कर
खूबियाँ और कमियां
सहकर छोटी-बड़ी कमजोरियां
संग-संग चलने का निर्णय है तुम्हारा
बनना चाहते हो हर सुख-दुःख में
इकदूजे का सहारा
निष्ठा और समर्पण
 इन दो स्तम्भों पर टिका है यह बंधन
कुछ अधिकारों और कुछ कर्त्तव्यों का करना है निर्वाह
मैत्री और साझेदारी का नाम है विवाह
सुनहरे भविष्य की नींव है यह प्रथा
मिटाती है दिलों से अधूरेपन की व्यथा
दो नहीं अबसे एक हो तुम
दो ‘मैं’ से मिलकर बना है एक समर्थ ‘हम’
विवाह की पावनता को बरकरार रखना
सदा दूजे को दिया करार रखना
थोड़े में कहें तो अधरों पर मुस्कान
और दिल में ढेर सारा प्यार रखना !


शनिवार, अगस्त 25

सपनीला मन


सपनीला मन


शब्दों का एक जखीरा
बहा चला आता है
जाने कहाँ से...
शब्द जो ठोस नहीं हैं
कितने वायवीय पर कितने शक्तिशाली
देह दिखती है
मन नहीं दिखता
विचार जो नहीं दिखता आज
कल देह धरेगा
सूक्ष्म से स्थूल की यात्रा चलती रहेगी...
देह के बिना भी हम हैं
शब्द क्या ये नहीं बताते
शब्द.. जो एक ऊर्जा हैं
जिन्हें आकार हम देते हैं...
अव्यक्त को व्यक्त करते आये हैं हम युगों से
अब वापस लौटना है
स्थूल से सूक्ष्म की ओर....
हम देह की तरह रहते हैं
और मन..
 अनजाना ही बना रहता है जीवन भर
खुद की पहचान किये बिना
गुजर जाती है उमर
देह से जुड़ी है हर बात
सुबह से शाम तक
मन नींद में मुखर हो जाता है
सपनों में घटता है आधा जीवन
जिसे सपना ही तो है.. कहकर
भुला देते हैं हम !


गुरुवार, अगस्त 23

पाया परस जब नेह का



पाया परस जब नेह का


तेरे बिना कुछ भी नहीं
तेरे सिवा कुछ भी नहीं,
तू ही खिला तू ही झरा
तू बन बहा नदिया कहीं !

तू लहर तू ही समुन्दर
हर बूंद में समाया भी,
सुर नाद बनकर गूँजता
गान तू अक्षर अजर भी !

है प्रीत करुणा भावना
सपना बना तू भोर में,
छू पलक तू ही जगाता
सुख सम भरा हर पोर में !

तुझसे हृदय की धड़कनें
मृत्यु है तेरी गोद में,
श्रद्धा, सबूरी, अर्चना,
नव चेतना हर शब्द में !

भीतर मिला हर स्वर्ग बन
जीवन का सहज मर्म तू,
खोयी कहीं दुःख की अगन
हर नीति औ’ हर धर्म तू !

कतरा-कतरा विदेह बन
डूबा सरल उर भाव में,
पाया परस जब नेह का
मन खो गया इस चाव में !

कण-कण पगा रस माधुरी
भीगा सा मन वसन हिले,
तेरी झलक जब थिर हुई
उर में हजार कमल खिले !

मद मस्त हो उर गा उठा
जीवन बिखरता हर घड़ी,
तू ही निखरता भोर में
तू ही सजा तारक लड़ी !

तू ही गगन में चन्द्रमा
तू ही धरा पर मन हुआ,
रविकर हुआ छू ले जहाँ
तू ही खिला बन कर ऋचा !


सोमवार, अगस्त 20

पुनः पुनः मिलन घटता है




पुनः पुनः मिलन घटता है



निकट आ सके कोई प्रियतम
तभी दूर जाकर बसता है !

श्वास दूर जा नासापुट से
अगले पल आकर मिलती है,
आज झरी मृत हो जो कलिका
पुनः रूप नया धर खिलती है !

बार–बार घट व्याकुल होकर
पाहुन का रस्ता तकता है,
उस प्रियजन का निशिवासर जो
नयनों में छुपकर हँसता है !

घर से दूर हुए राही को
स्वप्नों में आंगन दिसता है,
मेघ चले जाते बिन बरसे
मरुथल में सावन झरता है !

शुक्रवार, अगस्त 17

भारत रत्न अटल जी



 भारत रत्न अटल जी

बड़े दिवस पर जन्म लिया था
अति विशाल कवि मानस पाया, 
अंतर समर्पित राष्ट्र हित हो
जूझ आंधियों में मुस्काया !

तेरह मास, पांच वर्षों  का
सफर बड़ा ही कठिन गुजारा,
किन्तु नहीं आया फिर से वह
गौरवशाली समय दुबारा !

जनसंघ के संस्थापक बने
बीजेपी को भी जन्म दिया,
स्वयं सेवक बनकर संघ के
पांचजन्य का नाद भी किया !

चौबीस दलों को साथ मिला
एक नई सरकार बनाई,
इक्यासी मंत्री थे जिसमें
भारत को नई कीर्ति दिलाई !

भारत परमाणु सम्पन्न हो
पड़ोसी से संबंध सुधाार,
समर कारगिल का भी जीता
कवि हृदय भरी करुणा अपार !

भारत के चारों कोने जुड़ 
अटल मार्ग से आज मिले हैं,
पटु वक्ता ओजस्वी नेता
पाकर भारत भाग्य खिले हैं !