दूर बहुत दूर कहीं
आदमी बेबस हुआ
पर कहाँ मानता है
खुद को बचाने हेतु
और को मारता है !
क्या है ? जानता नहीं
खो गयी याद सारी
जानना नहीं चाहे
भटका कोई प्राणी
अपना ही घात करे
चेतना ही सो गयी
स्वयं से चला आया
दूर बहुत दूर कहीं
वापसी का पथ नहीं
कैसी यह माया है
मर रहे हैं जन यहाँ
महामारी नहीं कम
आत्मघाती बन रहे
ना जाने क्या है गम
जीवन की कदर नहीं
छीन लिया जायेगा
कुदरत का यही नियम
जिसको ना मान दिया
वही छोड़ जायेगा !
