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गुरुवार, दिसंबर 18

फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा - १

    फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा

पहला भाग


१ सितम्बर २०२५ 


हमारी यात्रा अगस्त माह के अंतिम दिवस शुरू हुई।सुबह साढ़े सात बजे हम घर से चले। आरामदायक हवाई यात्रा के बाद दोपहर बाद देहरादून पहुँच गये। दीदी-जीजा जी के यहाँ सदा की तरह शानदार स्वागत हुआ। उनकी गृह सहायिका समोसे व कलाकंद ले आयी थी। हमने कुछ देर दीदी-जीजा जी के पुराने फ़ोटो देखे। दीदी के लिखे जीवन के कई पुराने प्रसंग पढ़े। बगीचे में चहलक़दमी की और फूलों की तस्वीरें उतारीं। रात्रि भोजन में कढ़ी-चावल, लौकी की विशेष सब्ज़ी और नमकीन सेवियाँ भी थीं। रह-रह कर वर्षा की टिप-टिप आरम्भ हो जाती थी, लेकिन  रात भर वर्षा रुकी रही। सुबह पाँच बजे ही हम तैयार हो गये थे। दीदी ने नाश्ता बना कर दे दिया  था। देहरादून से ऋषिकेश होते हुए सबसे पहले हम देवप्रयाग पहुँचे, जहां सतोपंथ ग्लेशियर से निकलने वाली अलकनंदा व गोमुख से निकलने वाली भागीरथी नदी का संगम होता है। इसके बाद इनका नाम गंगा हो जाता है। इसके बाद श्रीनगर आया जो अलकनंदा के तट पर बसा गढ़वाल क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण बड़ा शहर है। रुद्रप्रयाग में अलकनंदा व सुमेरु ग्लेशियर से निकलने वाली मंदाकिनी नदी का संगम होता है। पिछले दिनों रुद्रप्रयाग में बादल फटने से हुई अत्यधिक वर्षा के कारण काफ़ी नुक़सान हुआ था। जिसके कारण हमें यात्रा स्थगित करने का विचार भी आया था। अगला स्थान था कर्णप्रयाग, जो अलकनंदा व पिंडारी ग्लेशियर से आने वाली पिंडर नदी के संगम पर बसा है।नंदप्रयाग में नन्दाकिनी ग्लेशियर से आने वाली नन्दाकिनी व अलकनंदा नदी का संगम होता है। नदियों का पानी वर्षा के कारण मटमैला था, पर दूर से वेगपूर्वक आते हुए वे कभी चाँदी के समान कभी दूध की तरह श्वेत भी प्रतीत हो रही थीं। पीपलकोटि पहुँचे तो दोपहर के भोजन का समय हो गया था।नाश्ता हमने ऋषिकेश में ही कर लिया था।रास्ते में कई जगहों पर भूस्खलन के कारण मलबा पड़ा था। जिसे हटाने का कार्य भी साथ-साथ ही चल रहा था।फूलों की घाटी और हेमकुंड की यात्रा हमारे मनों में बसा एक सुंदर स्वप्न था, जो आज साकार होने जा रहा था।हमारा लक्ष्य था औली में स्थित ‘ब्लू पॉपी आवास’।वही औली, जहाँ शीतकालीन खेलों का आयोजन होता है। किंतु ड्राइवर ने बताया, किसी कारण वश ब्लू पॉपी के मैनेजर ने कार्यक्रम में थोड़ा सा बदलाव किया है, अब हमें जोशीमठ जाना है और कल औली। ग्यारह घंटे की यात्रा के बाद शाम को सवा चार बजे हम जोशीमठ पहुँचे गये।औली और जोशीमठ के बीच केवल तेरह किमी की दूरी है। 


ऋषिकेश से लगभग ढाई सौ किमी दूर तीन हज़ार साल पुराना शहर है जोशीमठ, जिसका दूसरा नाम ज्योतिर्मठ है।यह त्रिशूल पर्वत की ढाल पर अलकनंदा के किनारे बसा हुआ है। इसके दोनों ओर बद्री तथा कामत शिखर हैं। आठवीं शताब्दी में यहाँ आदि शंकराचार्य ने एक मठ की स्थापना की थी, जो उन चार मठों में से एक है, जिन्हें उन्होंने भारत की चार दिशाओं में स्थापित किया था। यह मठ बद्री भगवान का शीतकालीन निवास है। सर्दियों में आदि शंकराचार्य द्वारा ही स्थापित बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद हो जाने के बाद देवमूर्ति जोशीमठ के वासुदेव मंदिर में लायी जाती है। बद्रीनाथ से आये नंबूदरीपाद ब्राह्मण छह माह यहीं बिताते हैं।जोशीमठ से २६ किमी दूर गोविंद घाट से यात्रा का ट्रैक आरम्भ होता है जो घांघरिया तक ले जाता है।जहाँ से फूलों की घाटी व हेमकुंड जाया जा सकता है। प्राचीन ग्रंथों में जोशीमठ को कार्तिकेय पुर के नाम से भी लिखा गया है।जो कत्यूरी राजाओं के देवता हैं। यह मलारी और नीति घाटियों का प्रवेश द्वार भी है। इससे कुछ दूरी पर नंदा देवी बायोस्फ़ियर है, जो यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। 



जोशीमठ में स्थित ब्लू पॉपी रिज़ौर्ट पहुँचे तो वहाँ की सुंदरता ने हमारा मन मोह लिया। फूलों से भरे सुंदर बगीचे और हरे-भरे लॉन, कमरे की पिछली बालकनी से दिखती हिमालय की चोटियाँ और धौली व अलकनंदा नदियों का संगम स्थल ! रूई के समान बादलों के पुंज ऊपर उठे और देखते ही देखते सारे पहाड़ विलीन हो गये, केवल एक श्वेत चादर सम्मुख रह गई।पर्यटकों के लिए सभी सुविधाओं से युक्त था यह रिज़ौर्ट। हमने शाम की चाय पी और आस-पास का जायज़ा लेने निकल पड़े। 

क्रमश:

शनिवार, नवंबर 29

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक -अंतिम भाग


रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

(अंतिम भाग)

कल हम जाफना से कोलंबो के लिए रवाना हुए, यात्रा लंबी थी, लगभग ग्यारह घंटे बस में बिताने पड़े। मध्य में चार बार कुछ देर का अवकाश लिया। सुबह रेलवे स्टेशन तक टहलने गये थे, फूलों की तस्वीरें उतारीं। नाश्ते के बाद यात्रा आरम्भ हुई। मार्ग में दोनों ओर दूर तक जल ही जल था और मध्य में सीधी जाती हुई सड़क, जिसे कॉज वे कहते हैं। कॉज वे पर जाते हुए एक अनोखा अनुभव हो रहा था, मानो हम पानी की सतह पर ही यात्रा कर रहे हैं। जल में कहीं-कहीं छोटे-छोटे हरे द्वीप नज़र आते थे। दोपहर के भोजन से पूर्व माधवानंद जी ने एक-एक करके सभी यात्रियों से अपना परिचय देने को कहा, यदि संभव हो तो कोई गीत या भजन सुनाने को भी कहा। कुछ महिलाओं ने भजन सुनाये। सभी को सुनकर आश्चर्य और हर्ष हुआ, जब ज्ञात हुआ कि यात्रियों में एक नभ सेना का उच्च अधिकारी है, एक राजनीति में है, कोई बड़ा व्यापारी है और एक जन यातायात नियंत्रक भी थे। किसी सीनियर सिटीज़न होम से भी चार महिलाएँ आयी थीं। उनमें से दो के पुत्र बैंगलोर में रहते हैं, पर उन्होंने परिवार में रहने की बजाय अपने हम उम्र लोगों के साथ रहना पसंद किया।मैंने एक हिन्दी कविता तथा उसका कन्नड़ भाषा में किया अनुवाद पढ़कर सुनाया। ऐसा लग रहा था कि सभी यात्रियों में भक्ति-भावना भरी हुई थी, तभी तो वे रामायण यात्रा पर आये थे। लंच के बाद जब यात्रा फिर आरम्भ हुई तो कुछ लोग अन्ताक्षरी  खेलने लगे। एक व्यक्ति किशोर कुमार के प्रशंसक थे, उन्होंने अनेक पुराने गीत सुनाकर समां बांध दिया, तब तो सभी में एक से बढ़कर एक पुराने गाने गाने की होड़ लग गई। कन्नड़ और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में गीतों का सिलसिला चलता रहा, तब शाम की चाय का समय हो गया था। जिसके बाद नियमित संध्या करवायी गई, जिसमें नरसिंह भगवान का कीर्तन व महामंत्र का जाप हुआ।उसके बाद माधवानंद जी ने रामायण पर एक प्रश्नोत्तरी भी करवायी। जिससे इस महाकाव्य के बारे में सभी का ज्ञान बढ़ा।इस तरह आनंद पूर्वक समय बिताते हुए हम कोलंबो पहुँच गये। आज दिन में कोलंबो दर्शन करके रात को प्रेमदासा हवाई अड्डे पहुँचना है।जहाँ से रात्रि एक बजे की उड़ान से हम भारत पहुँच जाएँगे।  

आज सुबह साढ़े चार बजे हम घर लौट आये थे। वापसी की यात्रा सुखद रही। कल सुबह होटल से चेकआउट करके सबसे पहले कोलंबो के राधा-कृष्ण को समर्पित सुंदर इस्कॉन मंदिर देखने गये।पुजारी जी ने समूह का स्वागत किया और सभी आरती में सम्मिलित हुए। मंदिर में दशावतारों की सुंदर प्रतिमाएँ थीं।श्वेत अश्व पर सवार भगवान कल्कि के साथ भगवान बुद्धि की भी एक सुंदर प्रतिमा थी। कृष्ण व बलराम की एक प्रतिमा में गाय तथा मोर की प्रतिमाएँ सजीव जान पद रही थीं। मंदिर के कक्ष की छत पर भी शानदार चित्रकारी की गई थी। एक जगह रुक्मिणी और कृष्ण के विवाह की झांकी थी। एक दीवार पर बनी स्वर्ण मृग की ओर इंगित करती सीता व राम-लक्ष्मण की सुंदर मूर्तियाँ आकर्षित कर रही थीं।बल कृष्ण को रस्सी से बाँधती यशोदा और सागर पर सेतु बनाती वानर सेना के दृश्य भी मूर्ति कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। 

इसके बाद हम केलानिया स्थित बौद्ध विहार में विभीषण मंदिर देखने गये। जो श्रीलंका के प्रसिद्ध केलानिया राजा महाविहार में स्थित है।कहा जाता है कि राजा मनिअक्खिखा द्वारा आमंत्रित किए जाने पर भगवान बुद्ध बुद्धत्व प्राप्त करने के पाँच वर्षों 500 भिक्षुओं के साथ बाद यहाँ आये थे।यह श्रीलंका के सबसे प्रमुख बौद्ध मंदिरों में से एक है। मंदिर का अहाता अति विशाल है, अनेक स्थानीय जान श्वेत वस्त्रों में वहाँ नीचे बैठकर ध्यान कर रहे थे। बुद्ध की उपदेश स्थली पर एक सुंदर स्तूप बना है।कई कक्षों में बुद्ध के जीवन को सुंदर चित्रों और मूर्तियों द्वारा दर्शाया गया है। यहाँ स्थित अवलोकितेश्वर की अठारह फुट ऊँची पाषाण प्रतिमा भी अपनी भव्यता से दर्शकों को विस्मित करती है।हमने यहाँ पहुँचकर देखा, अनेक स्थानीय भक्त यहाँ श्रद्धा प्रकट करने, तेल के दीपक जलाने और कमल के फूल चढ़ाने आये हुए थे,  जबकि पर्यटक कोने-कोने में व्याप्त शांतिपूर्ण ऊर्जा और श्रीलंका की समृद्ध विरासत की ओर आकर्षित हो रहे थे।भीतरी भवन में भगवान बुद्ध की लेटी हुई विशाल मूर्ति ने सभी को एक गहन शांति का अनुभव कराया। परिसर में स्थित बोधि वृक्ष भी अति सम्मानित है, जो बोधगया से ले जाये गये वृक्ष का एक अंश है। 

केलनिया के इस बौद्ध मंदिर परिसर में विभीषण का एक सम्मानजनक स्थान है। मान्यता है कि यह वही स्थान है जहाँ पूर्व काल में विभीषण का महल था।यहां विभीषण के राज्याभिषेक को दर्शाने वाले भित्तिचित्र भी बने हैं।विभीषण को श्रीलंका के चार संरक्षक देवताओं में से एक माना जाता है।हमने एक विशाल कक्ष में स्थापित विभीषण के एक सुंदर चित्र का दर्शन किया। जिसके एक ओर भगवान कार्तिकेय  तथा दूसरी ओर भगवान विष्णु के चित्र थे। संपूर्ण परिसर में श्रीलंका के राष्ट्रीय वृक्ष ‘ना’ वृक्ष लगे हुए हैं, जिन्हें सीलोन आयरनवुड भी कहा जाता है।ये देश के वर्षावनों में प्राकृतिक रूप से उगते  हैं और इनकी  कठोर लकड़ी से भारी निर्माण कार्य होता है।बौद्ध धर्म में भी इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है।मंदिर के एक कक्ष की बाहरी दीवार पर विभीषण के राज्याभिषेक के दृश्यों को दर्शाया गया गया है। 

इसके बाद हम कोलंबो स्थित पंचमुखी हनुमान का मंदिर देखने गये। यह मंदिर लंका युद्ध के दौरान अहिरावण के वध के लिए भगवान हनुमान के अवतार से जुड़ा है। इसे श्रीलंका का पहला अंजनेयार मंदिर माना जाता है। लंका युद्ध के दौरान, अहिरावण ने राम और लक्ष्मण को पाताल लोक में बंदी बना लिया और उन्हें मारने के लिए पांच दीपक जलाए, जिनकी लौ बुझाई नहीं जा सकती थी।इन दीपकों को एक साथ बुझाने और राम-लक्ष्मण को बचाने के लिए, हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया।उन्होंने पूर्व में वानर मुख,  पश्चिम में गरुड़ मुख, उत्तर में वराह मुख, दक्षिण में नृसिंह मुख, आकाश की ओर अश्व मुख (हयग्रीव) धारण किया। इस मंदिर में आने वाले भक्त यह मानते हैं कि उन्हें हर रोग और कष्ट से मुक्ति मिल जाती है, तथा मन में शक्ति का संचार होता है। 

श्रीलंका की इस यात्रा के बाद किसी भी भारतीय के मन में रामायण के इतिहास होने में कोई संदेह नहीं रह जाता है। इतिहास का अर्थ है ऐसा हुआ था, इसका अर्थ है रामायण में वर्णित घटनाएँ वास्तव में हुई थीं। आज जो भारत हम देखते हैं, भौगोलिक रूप से हज़ारों वर्ष पूर्व  उससे अति विशाल था।दक्षिण एशिया के कई देश तब भारत का अंग थे, जिसमें आज का श्रीलंका भी शामिल है।  


सोमवार, नवंबर 24

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक - ४

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक

भाग - ४

आज सुबह हम जल्दी उठ गये थे, साढ़े पाँच बजे समुद्र तट पर सूर्योदय देखने जाना था। बादलों के कारण सूर्यदेव के दर्शन तो नहीं हुए, पर हमने समुद्र स्नान का आनंद लिया। तट पर योगासन किए और भ्रमण  के साथ दौड़ भी लगायी। वृक्ष के एक तने पर बैठे हुए एक-दूसरे की तस्वीरें खींचीं।अब समूह के कुछ लोगों से परिचय बढ़ रहा है। साढ़े नौ बजे हम होटल से निकले तो पहला पड़ाव था भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित त्रिंकोमाली का लक्ष्मी नारायण पेरूमल कोविल मंदिर, जो एक भव्य मंदिर है।यह मंदिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित है और अपनी जटिल द्रविड़ वास्तुकला और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। इस मंदिर में हिंदू पौराणिक कथाओं को दर्शाने वाली विस्तृत नक्काशीदार मूर्तियाँ हैं।मंदिर का वातावरण शांत और आध्यात्मिक था।इसके विशाल प्रांगण में हमने कुछ समय बिताया। 

इसके बाद हम शिव का प्रसिद्ध थिरुकोनेश्वर मंदिर देखने गये, यहाँ शंकरी देवी शक्ति पीठ भी है। इस स्थान को दक्षिण कैलाश भी कहते हैं।वहाँ शिव की अति सुंदर भव्य और विशाल प्रतिमा थी। ऐसी मान्यता है कि रावण ने इसका निर्माण कराया था। एक पौराणिक कथा के अनुसार पार्वती ने भवन निर्माण के लिए इस स्थान का चुनाव किया था। गृहप्रवेश की पूजा के लिए पार्वती ने रावण को आमंत्रित किया। रावण इस भव्य इमारत को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया और दक्षिणा स्वरूप इस भवन की मांग कर दी। देवी पार्वती ने उसकी इच्छा पूर्ण की, पर बाद में उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने देवी से क्षमा मांगी तथा  प्रार्थना की कि वे यह स्थान छोड़ कर न जाएँ। पार्वती शंकरी देवी के रूप में यहीं स्थिर हो गयीं। भगवान शिव उनके संग यहाँ थिरुकोनेश्वर अर्थात पर्वतों के देव के रूप में निवास करते हैं।

इसी मंदिर के निकट एक ऐसी जगह और है जिसका नाम रावण से जुड़ा है।इसे रावण वेट्टा कहते हैं ।ऐसा माना जाता है कि रावण ने अपनी तलवार से इस चट्टान को काटा था। मंदिर के पीछे एक स्थान पर लकड़ी के कई छोटे छोटे पालने लटक रहे थे।माधवानंद जी ने बताया,  संतान प्राप्ति के लिए लोग यहाँ मन्नत माँगते हैं। 

शंकरी देवी मंदिर थिरुकोनेश्वर मंदिर के परिसर में ही स्थित है। वह चतुर्भुजी खड़ी मुद्रा में हैं। उनके चरणों के निकट ताम्बे का दो आयामी श्री चक्र है। वहीं उनकी प्रतिमा के सामने तीन आयामी श्री चक्र खड़ा है।ऐसी मान्यता है कि सती का एक पैर यहाँ गिरा था। आदि शंकराचार्य ने अपने एक स्तोत्र में अठारह शक्ति पीठों में सर्वप्रथम इसी शक्ति पीठ का उल्लेख किया है।हमने काफ़ी समय इस मंदिर के प्रांगण में बिताया और देवी की आरती में भी भाग लिया।दीवारों पर विभिन्न देवी-देवताओं की सुंदर आकृतियाँ बनी थीं। 

कुछ आगे जाकर हमने भद्रकाली मंदिर के दर्शन भी किए, जो नगर के मध्य स्थित था। बाहर से यह किसी  दक्षिण भारतीय मंदिर के समान दिखाई दे रहा था। प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करते ही कक्ष में चारों ओर तीन आयामी मूर्तियाँ दिखायी देती हैं। समूह के सभी लोग उन्हें देखकर आश्चर्य से भर गये।अनेक विचित्र आकार की मूर्तियाँ छत पर भी बनी थीं। चौखटों, दीवारों और स्तंभों पर भी रंग-बिरंगी देवी-देवताओं व प्राणियों की आकृतियाँ बनी हुई थीं। यह मंदिर चोल वंश से पूर्व का है। इसका अर्थ है, मंदिर हज़ार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है।

अंत में हम कन्निया उष्ण जल-स्त्रोत देखने गये, जो प्रकृति का एक करिश्मा जान पड़ता है। वहाँ कई माताएँ अपने बच्चों को गर्म जल से स्नान करवा रही थीं। पास-पास बने कुछ सात चौकोर जल कूप थे। जिनकी गहराई अधिक नहीं थी। उनके भीतर गुनगुने से लेकर विभिन्न तापमान का जल भरा था। एक दूसरे के समीप स्थित कुल ७ चौकोर कुँए हैं जिनमें विभिन्न तापमान के गर्म जल स्त्रोत हैं। इनकी गहराई अधिक नहीं है। केवल ३ से ४ फीट हो सकती है। इन कुओं के समीप खड़े होकर भीतर झांकने पर इनके तल स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। इनके भीतर पर्यटकों ने अनेक सिक्के डाले हुए हैं।ऐसी मान्यता है कि रावण ने अपनी माँ के अंतिम संस्कार के लिए इन जल स्रोतों को उत्पन्न किया था। यह भी कहा जाता है कि रामायण में इसका उल्लेख गोकर्ण तीर्थ के एक भाग के रूप में किया गया है। त्रिंकोमाली खाड़ी का एक अन्य नाम गोकर्ण भी है। 

अभी कुछ देर पहले हम नार्थ गेट होटल पहुँचे हैं। जो जाफना में स्थित है। कई वर्षों पूर्व यहाँ गृह युद्ध चल रहा था, पर अब पूर्णत: शांति है। कल हमें एक और शक्ति पीठ नाग द्वीप देखने जाना है। 


रविवार, जनवरी 12

हादसा

हादसा 


बढ़ती जाती है भीड़ मंदिरों में 

सैकड़ों, हज़ारों अब लाखों की 

दिलों में आस और विश्वास लिए 

कि जो गुहार लगायी 

वह सुनी जाएगी 

पर अचानक हो जाने वाले हादसों में 

गुहार लगाने वाला ही नहीं बचता 

भगदड़ में सदा के लिए गुम हो जाता  

 कुछ हो जाते हैं घायल 

देवता भी सिहर जाते होंगे 

शायद राह दिखाते हों 

मृतात्माओं को 

कहते होंगे 

जब अनेक बार आ चुके, 

अनेक बार फिर आना है 

क्या जल्दी है आगे जाने की 

परमात्मा तो हर जगह है 

कुछ न कुछ पाने की 

कुछ न कुछ बनने की 

होड़ में लगा मानव 

ख़ुद को गँवा देता है 

भीड़ में दबकर विदा लेने से 

बुरा, भला और क्या हो सकता है ! 


गुरुवार, फ़रवरी 15

नैनीताल की एक छोटी सी यात्रा

नैनीताल की एक छोटी सी यात्रा 

१९ नवम्बर 

परसों सत्रह तारीख़ की सुबह हम बंगलुरु से लखनऊ पहुँचे थे। लखनऊ हवाई अड्डे का टर्मिनल-२ अभी भी दीपावली की सजावट के कारण बहुत आकर्षक लग रहा था। जूम कार से होटल पहुँच गये। जहां भतीजी की शादी होनी थी। मेंहदी का कार्यक्रम आरंभ होने वाला था। सुंदर सजावट के मध्य तीन कलाकार पारंपरिक पोशाक में मेंहदी लगाने के लिए भी तैयार बैठे थे। युवा इवेंट मैनेजर सारा प्रबंध देख रही थी। ढोल बजने लगे और राजस्थानी लोक गीत गाया गया। अन्य लोगों के साथ भावी दुल्हन ने भी कार्यक्रम में सुंदर नृत्य किया। सभी रिश्तेदार आपस में बातें करते रहे, आपस में मिलने का यही तो मौक़ा होता है।अगला कार्यक्रम रात को था, सो शाम को हम अंबेडकर पार्क देखने चले गये।अत्यंत विशाल और अपने आप में अजूबा यह पार्क मायावती द्वारा २००२ में बनवाया गया था।रात नौ बजे विवाह का अगला कार्यक्रम आरम्भ हुआ। पंडित जी ने मन्त्रोच्चारण के मध्य सगन की रस्म पूरी करवायी। चुन्नी चढ़ाने की रस्म के बाद वर-वधू के मध्य अंगूठी का आदान-प्रदान हुआ। कई रिश्तेदारों के साथ उन दोनों भी नृत्य किया। दूसरे दिन दिन में हल्दी की रस्म भी पूरे विधिविधान और गाजे-बाजे के साथ हुई, रात को विवाह संपन्न हुआ और सुबह तारों की छाँव में विदाई। 

कल रात्रि अर्थात अठारह नवम्बर को हम बाघ एक्सप्रेस से लखनऊ से रवाना हुए। चारबाग़ स्टेशन से ट्रेन एक घंटा देरी से चली।आज सुबह दस बजे हम काठगोदम पहुँच गये। ड्राइवर दीप लेने आया था। बचपन से सुनते और पढ़ते आ रहे थे कि नैनीताल उत्तराखण्ड के कुमायूँ क्षेत्र का एक सुंदर पर्यटक स्थल है; ग्रीष्मकालीन अवकाश में यह नगरी पर्यटकों से पूरी तरह भर जाती है। शीतऋतु में यहाँ हिमपात देखने भी लोग आते हैं; पर कभी जाने का अवसर नहीं मिला था।होटल पहुँचने तक गूगल पर कुछ जानकारी एकत्र की, समुद्र तल से नैनीताल की ऊँचाई छह हज़ार फ़ीट से कुछ अधिक है। इस अंचल में अनेक मनोरम झीलें हैं। इनमें से प्रमुख नैनी झील है। यह झील चारों और से बर्फ से ढके पर्वतों से घिरी है, इसकी कुल परिधि लगभग दो मील है।रास्ते में हनुमान गढ़ी के सुंदर मंदिर में रुके। हनुमान जी के साथ ही यहाँ भगवान राम और शिव के मंदिर भी हैं। यह मंदिर बाबा नीब करौली के आदेशानुसार 1950 के आसपास बनाया गया था।यह स्थान अपने सूर्यास्त के दृश्य के लिए भी प्रसिद्ध है। नैनी झील की शोभा दिखाते हुए ड्राइवर हमें होटल ‘नैनी रिट्रीट’ले आया है। झील में रंग-बिरंगी नावें चल रही थीं, पर्वतों पर खड़े ऊँचे वृक्षों तथा गगन में विचरण करते बादलों का प्रतिबिंब जल में शोभित हो रहा था।।झील के उत्‍तरी किनारे को मल्‍लीताल और दक्षिणी किनारे को तल्‍लीताल कहते हैं।स्कंद पुराण के अनुसार अत्रि, पुलत्स्य और पुलह ऋषि ने इस झील में मानसरोवर का जल भरा था। 



आज भारत-आस्ट्रेलिया के मध्य क्रिकेट का फ़ाइनल खेला जा रहा है। भारत ने २४० रैन बनाये हैं। करोड़ों लोगों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। दोपहर को पौने दो बजे ही नहा-धो कर तैयार हो गये।इस होटल में बेगोनिया के कई रंगों के फूल खिले हैं।होटल में ही कुछ देर टहलने व फ़ोटोग्राफ़ी करने के बाद नीचे उतरकर ‘नैना देवी’ का मंदिर देखने गये।
नैनी झील के उत्‍तरी किनारे पर नैना देवी का भव्य मंदिर स्थित है। माना जाता है कि जब शिव सती की मृत देह को लेकर स्थान-स्थान पर जा रहे थे, तब जहाँ  उनके शरीर के अंग गिरे वहाँ शक्तिपीठों की स्‍थापना हुई। नैनी झील के स्‍थान पर देवी सती की आँख गिरी थी। हर वर्ष माँ नैना देवी का मेला नैनीताल में आयोजित किया जाता है।पास ही एक गुरुद्वारा भी है, उसमें एक महिला ग्रंथी पाठ कर रही थी तथा दो अन्य महिलाएँ उसे दोहरा रही थीं। एक भव्य मस्जिद भी निकट ही दिखायी दी, जिसकी वास्तुकला का जवाब नहीं है।हमने नैनी झील में नौकायन का आनंद भी लिया। नाविक ने बहुत ही धैर्य से  सभी प्रश्नों का जवाब दिये। झील के एक ओर स्थित है मॉल रोड‍ जिसे अब गोविंद बल्‍लभ पंत मार्ग कहा जाता है। पर्यटकों के लिए यह रोड आकर्षण का केंद्र है। झील के दूसरी ओर की सड़क को ठंडी सड़क कहते हैं। यह  मॉल रोड जितनी व्‍यस्‍त नहीं रहती। यहां पाषाण देवी का मंदिर भी है। ठंडी रोड पर वाहनों को लाना मना है।मंदिर से निकल कर भूटिया मार्केट से गुजरते हुए हम मॉलरोड पर आ गये। जहां तीन-चार वस्तुएँ ख़रीदीं। घर के लिए लकड़ी की एक नाम पट्टिका ख़रीदी, जो कारीगर ने हाथों हाथ बना कर दी। कल हमें मुक्तेश्वर जाना है। 

क्रमशः 





शुक्रवार, जनवरी 12

जब अनंत को सांत बनाया


जब अनंत को सांत बनाया 

त्रेता युग में प्रकटे थे वह 

मर्यादापुरुषोत्तम राम,  

युग-युग से भजता आया जग 

पावन अतीव मनोहर  नाम !


जब अनंत को सांत बनाया 

 अवतार लिया महाविष्णु ने, 

किंतु  राम रहे कहाँ सीमित

भारत भू की सीमाओं में !


राम नाम के मधुर जाप ने 

सारी दुनिया को गुंजाया, 

है हरि अनंत कथा अनंता 

युग-युग ने गीत यही गाया  !


जन्मस्थल पर सुंदर मन्दिर 

स्वप्न आज यह पूर्ण हुआ है,  

राम राज्य भी लौटा लाएं   

वर्तमान यह माँग रहा है  ! 


हो स्थापना परम  मूल्यों की 

 राजाराम चले थे जिन पर,

दुनिया को शुभ मार्ग दिखाया  

आदर्श पुत्र, प्रिय भाई बन  !


माँ सीता का नाम सदा ही  

राम ने आगे ही लगाया,  

सहने पड़े अनेक अपवाद   

सदा सत्य को ही अपनाया !


मंगलवार, अक्टूबर 4

जितना खुद को बाँटा जग में

जितना खुद को बाँटा जग में 

 

जितना  ‘मैं’ ‘तुझमें’ रहता है 

उतने से ही मिल पाता है, 

खुद की ही तलाश में हर दिल 

 दूजों  के घर-घर जाता है !

 

जितना खुद को बाँटा जग में 

उतने पर ही होता हक़ है, 

बिन  बिखरे बदली कब बनती 

 इसमें नहीं मेघ  को शक है !

 

प्रियतम प्रेमी मिलने ख़ातिर  

रूप हज़ारों धर लेते हैं,  

खुद को मंदिरों में सजाया 

खुद ही सजदे कर लेते हैं !

 

कोई नहीं सिवाय उसी के 

जिससे तिल भर का नाता है, 

भेद कभी खुल जाए जिसका 

कुदरत  का कण-कण  भाता है !

 

सहज हुआ वह बंजारा फिर 

बस्ती-बस्ती गीत सुनाता , 

मुक्त हो रहो बहो पवन से 

सुख स्वप्नों के  गाँव बसाता !

सोमवार, अप्रैल 25

तीन विचार


तीन विचार

अब 

मंदिर तोड़े गए 

पुस्तकालय जलाए गए 

अधिकारों से वंचित किया गया 

मारा गया 

कठोरता की सीमाएँ लांघी गयीं 

ग़ुलाम बनाया गया, बेचा गया 

अब बहुत हुआ, अब और नहीं 

अब परिवर्तन अवश्यंभावी है !


मन 

शिकायतों का पुलिंदा बना अगर मन 

अपनी बस अपनी ही चलाए जाता, 

चीजें जैसी हैं वैसी कहाँ देखे 

महज ज़िद का मुलम्मा चढ़ाए जाता !


छिपा इश्क का समुंदर गहराई में

न भीगे खुद उसमें न जग को डुबाए, 

बना महरूम अपने ही ख़ज़ानों से 

अपने ही हाथों से खुद को सताए  !


परिवार 


दो में होता है प्यार 

पर तीन से बनता है परिवार 

दो बिंदु जुड़ते हैं

तो एक पंक्ति का जन्म होता है 

पर तीसरा बिंदु बना सकता है वृत्त 

जिसमें भ्रमण करती है  ऊर्जा 

माता-पिता और संतान के प्रेम की  

पिता देता है असीम प्रेम माँ को

संतान माँ के वात्सल्य से सिंचित होती है 

और देती है सारा निर्दोष प्रेम पिता को 

और इस तरह एक वलय में घूमता है स्नेह 

प्रीत का जो वृक्ष लगाया था युगों पूर्व 

शिव और पार्वती ने 

उसकी शाखाएँ आज भी पल्लवित हो रही हैं  !