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गुरुवार, अक्टूबर 30

वही थाम लेता राहों में

वही थाम लेता राहों में 


कोई लिखवा जाता है ज्यों 

जहाँ कलम, कागज सम्मुख है, 

अक्षर भरते से जाते हैं 

मौन सदा, जो जगत प्रमुख है !


वही शब्द है वही अर्थ भी 

वही गीत प्राणों में भरता, 

वही श्वास बन आता जाता 

वही स्वयं से जोड़े रखता !


जिसके होने से ही हम हैं 

एक पुलक बन तन में दौड़े, 

वही थाम लेता राहों में 

व्यर्थ कहीं जब मन यह दौड़े ! 


 होकर भी ना होना जाने 

उसके ही हैं हम दीवाने, 

 जिसे भुला के जग रोता है 

याद करें हम लिखें तराने !


जो भी उसकी याद दिलाये 

वही गुरू सम पूजा जाये, 

सपनों की अब कौन सुने? जब 

नींदों को ही हर ले जाये !


सोमवार, मई 26

चुनाव

चुनाव 


 गा रहे पंछी 

 बह रही हवा 

घूम रही धरा  

 हो रहा अपने आप सब कुछ !


चल रही श्वास  

 बढ़ रही उम्र  

 दौड़ रहा मन  

 हो रहा अपने आप सब कुछ !


 साक्षी

भूताकाश व चित्ताकाश का 

जिस पर  

टिकी है सारी सृष्टि 


अकर्ता 

वह अनुमंता 

हर चुनाव 

जिसके हाथ में  !


बुधवार, जून 26

प्रेम

प्रेम 


 

बाँटने से बढ़ता है प्रेम

 भीतर भरा है प्रेम का जो स्रोत

उसे लुटाने का 

अवसर ही जीवन है 

बन जाता तब तुम्हारा मन

ईश्वर का आँगन है 

वही बहता है शिराओं में रक्त बनकर 

वही श्वास के साथ फेरा लगाता है 

उसकी याद में बहाया एक-एक अश्रु 

महासागरों की गहराई भर जाता है 

प्रेम कोई शब्द नहीं 

न ही भाव या भावना कोरी 

नहीं कृत्य या चाहत कोई 

यह तुम हो 

तुम्हारे होने का प्रमाण है 

यही तो धरा को धारने वाला आसमान है 

प्रेम श्रद्धा और विश्वास है 

किसी को कुछ देने की आस है 

हज़ार ख़ुशियों के फूल उगाने वाली बेल है 

प्रेम बना देता हर आपद को खेल है 

इसकी एक किरण भी उतर जाये मन में 

बिखेर देना किसी महादानी की तरह 

प्रेम में होना ही तो होना है 

यही बीज दिन-रात मनु को बोना है ! 


सोमवार, दिसंबर 18

इक लहर उठी श्वासों की



 इक लहर उठी श्वासों की

ओउम् की पुकार उठी 
हुई जागृत रग-रग तन की,
रेशा-रेशा लहराया
मन की हर विस्मृति टूटी !
  
उड़ चली डोर श्वासों की
मन ह्रदय पतंग हो उठा,
तोड़ सभी तन के बंधन  
  चिदाकाश में उड़ा किया !

इक लहर उठी श्वासों की
मानस धवल  हंसा हुआ,
 मृदु भावों के सरवर में
वह अनवरत तिरता रहा !

 इक पटल बना श्वासों का 
घिस-घिस कर चमकाया मन
जाग उठा चिन्मय झिलमिल 
  झलकाये अंतर दर्पण  !

 पुल बना सहज श्वासों का
जब मानस की धारा पर,
परम अनंत की खोज में
चल पड़ा ह्रदय  यायावर !
 
दीप जलाया श्वासों का
हुआ नूर भीतर-बाहर,
मन माणिक जगमगाया
अकम्पित उजली लौ पर  !

माला गुंथी श्वासों की
 शुभ सुमनों से ओंउम् के,
 प्रियतम की खोज में मनस
 ले  चला थाम हाथों में  !

डाली समिधा श्वासों की 
 हवन कुंड मन-अंतर में , 
परम सत्य तब प्रकट हुआ
ओंउम्.. ओंउम्... ओंउम्.. में !


बुधवार, अप्रैल 19

श्वास-श्वास में सिमरन हो जब

श्वास-श्वास में सिमरन हो जब


श्वासों में मत भरें सिसकियाँ 

हैं सीमित उपहार किसी का, 

दीर्घ, अकंपित अविरत  गति हो 

इनमें कोई राज है छुपा !


श्वास-श्वास में सिमरन हो जब

वाणी में इक दिन छलकेगा, 

मन को बाँधे ऐसी डोरी 

श्वासों से ही मधु बरसेगा !


श्वासों का आयाम बढ़े जब 

सारा विश्व समाता इनमें, 

एक ऊर्जा है अनंत जो 

ज्योति वह प्रदाता जिसमें !


श्वासों की माला पहनी है 

भरे सुगंधि मधुराधिपति की, 

इनकी गहराई में जाकर 

द्युति निहारें हृदय  मोती की !



शुक्रवार, नवंबर 11

अब तो इक ही धुन बजती है

अब तो इक ही धुन बजती है


अब जब तुम हो साथ हमारे 

 खोज रहे तब भला किसे हम, 

श्वासों में हो,  प्राणों  में तुम 

ढूँढे भला किसे नादां मन !


वाणी मुखर नहीं अब रहती 

सिमट शब्द ज्यों  भीतर सोए, 

 निशदिन उस का साथ मिला है 

जिसे पुकारा करते थे वे  !


यूँही समय बिताने ख़ातिर 

आँख मिचौली खेल रहे थे, 

ढूँढने का बहाना करते

तुम तो सारा वक्त यहीं थे  !


कैसे कहें तुम्हारी  बातें 

बढ़ा गयी थीं दिल की धड़कन,

जब आँखों में फूल खिले थे 

कैसे दें उस पल का विवरण!


कोई बोध नहीं पाया है 

 किया न कोई कर्म अनूठा,

 कैसे साधें भक्ति भला जब 

पृथक नहीं तुमको जाना है !


दुःख बिसराया सुख भी छूटा 

अब तो इक ही धुन बजती है, 

तुम हो, जग है, नयन देखते 

पल-पल यह धरती सजती है !


एक लगन भीतर जागी थी 

जिसने अब अधिकार किया है, 

उसे छुड़ाया जो पकड़ा था 

केवल अजर दुलार दिया है !


मंगलवार, अक्टूबर 11

यज्ञ भीतर चल रहा है

यज्ञ भीतर चल रहा है



श्वास समिधा बन सँवरती

प्रीत जगती की सुलगती,

मोह कितना छल रहा था

सहज सुख अब पल रहा है !


मंत्र भी गूजें अहर्निश

ज्योति माला है समर्पित,

कामना ज्वर जल रहा था

अहम मिथ्या गल रहा है !


अनवरत यह यज्ञ चलता

प्राण दीपक नित्य जलता,

पास न कुछ हल रहा था

उम्र सूरज ढल रहा है !


खोजता था मन युगों से

छला गया स्वर्ण मृगों से,

व्यर्थ भीतर मल रहा था

परम सत्य पल रहा है !


चाह थी नीले गगन की

मृत्यू देखी हर सपन की,

स्नेह घृत भी डल रहा था

द्वैत अब तो खल रहा है !


सोमवार, अप्रैल 18

चाँद बनकर

 चाँद बनकर 

मैंने चाँद बनकर धरा को देखा 

लहू से सराबोर 

लोगों को झूमते गाते देखा 

संग बहते हुए हवाओं के 

इक बूँद श्वास के लिए तरसते देखा 

अनंत रिक्तता में छा गया था वजूद मेरा 

चंद चीजों के लिए बिलखते देखा 

वह जो उड़ सकता था पल में  

जमीं से फलक तक 

धीमे-धीमे से उसे सरकते देखा 

मैं ही मालिक था चाँद तारों का 

चंद सिक्कों के लिए झगड़ते देखा 

जला सूरज सा कोई दिन-रात सदा 

भय से अंधेरों में किसी को सिसकते देखा !


बुधवार, मार्च 30

जीवन मधुरिम काव्य परम का

जीवन मधुरिम काव्य परम का

फिरे सहज श्वासों की माला

हम भाव सुगंध बनें,

जीवन मधुरिम काव्य परम का

इक सरस प्रबंध बनें !

 

जगती के इस महायज्ञ में

आहुतियाँ अपनी हों,

निशदिन बंटता परम उजास

मेधा शक्ति ज्योति हो !

 

शब्द गूँजते कण-कण में नित

बाँचें ज्ञान ऋचाएं,

चेतन हो हर मन सुन जिसको

गीत वही गुंजायें !

 

शुभता का ही वरण सदा हो

सतत जागरण ऐसा,

अधरों पर मुस्कान खिला दें

हटें आवरण मिथ्या !

 

उसकी क्षमता है अपार फिर

क्यों संदेह जगाएं,

त्याग अहंता उन हाथों की

कठपुतली बन जाएँ !


सोमवार, जनवरी 24

श्वासों की माला जपनी थी

श्वासों की माला जपनी थी


जो हीरे तूने सौंपे थे 

पत्थर सम हमने गँवा दिए, 

अमृत की खानें छिपी भीतर 

भयभीत गरल से कंपा किए !


शीतलता भरता था सुमिरन 

जग की आँधी में उड़ा दिया, 

श्वासों की माला जपनी थी 

सपनों, नींदों में भुला दिया !


तू रहबर बनकर बैठा था 

आवाज़ लगाते हम रोए, 

कब तूने त्यागा था हमको 

रस्तों पर हम ही खोए थे !


रंगीनी, दुनिया की माया 

कुछ और नहीं मन है छाया, 

तू था प्रकाश का स्रोत खड़ा 

हम पीछा करते थे मन का !


जिसका ना रूप कभी ठहरे 

उस दुनिया के पीछे भागे, 

कब सपने झूठे छोड़े थे 

कब तेरी करुणा लख जागे !


तुझको पाया कोई कहता 

तू मुँह फेर हंसता होगा, 

पाना उसका जो खोया हो 

तू कण-कण में रमता होगा !


हम अनजाने से बन जाते 

तू कदम-कदम पर बिखरा है, 

तेरी आभा से रवि दमके 

चंदा रूप भी संवरा है !


सोमवार, मई 3

टूटते ख्वाब


टूटते ख्वाब


महसूस करें तो दुख बहुत है बाहर 

भीतर कुछ और क्यों बनाया जाए 


गुजर जाएगा वक्त ही है आखिर यह 

बुरा कहकर क्यों खुद को सताया जाए 


लगा हुआ है हर शख्स अपनी कुव्वत से 

कैसे वायरस को जिस्म से भगाया जाए 


दम तोड़तीं श्वासें कभी जलती हुईं देहें 

किस-किस मंजर से ध्यान अपना हटाया जाए 


बहुत बेमुरव्वत है जिंदगी सुना तो था 

छोटे बच्चों को कैसे यकीं दिलाया जाए 


टूटते ख्वाबों  को देखा है हर किसी  ने  

टूटती साँसों को किस तरह बचाया जाए 


खत्म होगी दुनिया कभी किताबों में पढ़ा था 

कतरा-कतरा क्यों इसका वजूद मिटाया जाए