धरती अंबर मिल लुटा रहे
जो कुछ भी हमने बाँटा है
वह द्विगुणित होकर हमें मिला,
यदि प्रेम किया अणु मात्र यहाँ
अस्तित्त्व ने सहज भिगो दिया !
शुभता को भेजें जब जग में
वह घेर हमें भी लेती है,
धारा शिखरों से उतर चली
पुनः बदली बन छा जाती है !
देते रहना ही पाना है
ख़ाली दामन ही भरता है,
धरती अंबर मिल लुटा रहे
‘वह’ परिग्रही पर हँसता है !
जब बदल रहे पल-पल किस्से
कोई न सच कभी जान सका,
हर बांध टूट ही जाता है
कब तक धाराएँ थाम सका !
