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रविवार, अप्रैल 17

धरती अंबर मिल लुटा रहे



धरती अंबर मिल लुटा रहे
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जो कुछ भी हमने बाँटा है 
वह द्विगुणित होकर हमें मिला, 
यदि प्रेम किया अणु मात्र यहाँ 
अस्तित्त्व ने सहज भिगो दिया !
 
शुभता को भेजें जब जग में 
वह घेर हमें भी लेती है, 
धारा शिखरों से उतर चली 
पुनः बदली बन छा जाती है !
 
देते रहना ही पाना  है 
ख़ाली दामन ही  भरता है, 
धरती अंबर मिल लुटा रहे 
‘वह’ परिग्रही पर  हँसता है !
 
जब बदल रहे पल-पल किस्से 
कोई न सच कभी जान सका, 
हर बांध टूट ही  जाता है 
कब तक धाराएँ थाम सका !