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शुक्रवार, अप्रैल 2

तू ही वहाँ नजर आया था


जहां कुछ भी नहीं था 

वहीं सब कुछ हुआ है, 

जहां इक सोच भर थी 

 वहाँ जग ये बना है ! 

तू ही वहाँ नजर आया था

जिसकी आँखों में भी झाँका 

तू ही वहाँ नजर आया था, 

बता, उस घड़ी क्या तूने भी

मुझमें खुद को ही पाया था ?


जो करना चाहा है दिल ने 

सदा कहाँ कर पाए हैं हम, 

ना करने की जिसे कसम ली 

वहीं खड़ा खुद को पाया थम !


इससे अच्छा यह ही होता 

जो सहज घटे घटने देते, 

हम जीवन को, अपनी लय में 

अपनी धुन में बहने देते !

 

सोमवार, मई 21

अब सहज उड़ान भरेगा मन



अब सहज उड़ान भरेगा मन


अब वह भी याद नहीं आता
अब मस्ती को ही ओढ़ा है,
अब सहज उड़ान भरेगा मन
जब से इसने घर छोड़ा है !

वह घर जो बना था चाहों से
कुछ दर्दों से, कुछ आहों से,
अब नया-नया सा हर पल है
अब रस्तों को ही मोड़ा है !

हर क्षण मरना ही जीवन है
गिन ली दिल की हर धड़कन है,
पल में ही पाया है अनंत
अब हर बंधन को तोड़ा है !

अब कदमों में नव जोश भरा
अब स्वप्नों में भी होश भरा,
अंतर से अलस, प्रमाद झरा
अब मंजिल को मुख मोड़ा है !