मन पाए विश्राम जहाँ

नए वर्ष में नए नाम के साथ प्रस्तुत है यह ब्लॉग !

मंगलवार, जनवरी 31

मन भी किसी और की माया

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मन भी किसी और की माया ​​माटी से निर्मित यह भूमा माटी से ही चोला तन का,  माटी का भी स्रोत कहीं है  ढूँढे वही यात्री मन का ! हर पदार्थ मन की छ...
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रविवार, जनवरी 29

गुंजार

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 गुंजार  तू भेज रहा है प्रेम पाती  हर क्षण  मेरे प्रभु ! हम पढ़ते ही नहीं  क्योंकि संसार की उलझनों में खोए हैं  तू जगा रहा है निज गुंजार से ...
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शनिवार, जनवरी 28

कहना - सुनना

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कहना - सुनना  वह जो मेरे भीतर बोलता है  वही तुम्हारे भीतर सुनता है  कहा था आँखों में आखें डाल के किसी ने  फिर भी नहीं समझ पाते  लोग एक-दूसरे...
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गुरुवार, जनवरी 26

समता की इक ढाल बना लें

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समता की इक ढाल बना लें   पुष्पों का मृदु हार बनें हम   काँटों का चुभता ताज नहीं, प्रीत सुरभि  हर सूं  बिखरायें   उर बजे शोक का साज नहीं ! दु...
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मंगलवार, जनवरी 24

गणतंत्र दिवस पर शुभकामनाओं सहित

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एक ऊर्जा परम लहर बन  विश्व आज देखे भारत को  ​​एक नवल इतिहास बन रहा,  युगों-युगों से जो नायक था  पुनः समर्थ सुयोग्य सज रहा  ! भारत की परिभाषा...
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रविवार, जनवरी 22

सच में

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सच में  हम सच को स्वीकार नहीं करते  वरना साफ़-साफ़ कह देते  हम मंदिर आते हैं खुद के लिए  हे ईश्वर ! हम तुमसे प्रेम नहीं करते  शब्दों को एक-द...
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शनिवार, जनवरी 21

वही मार्ग में संबल बनती

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वही मार्ग में संबल बनती मुख मोड़ा जब-जब प्रकाश से  हर दुःख इक छाया सा मिलता, परछाई इक सँग हो लेती  तज खुद को जब जग को देखा ! बाधा जो सम्मुख ...
गुरुवार, जनवरी 19

कुछ छुपाने को न कुछ बताने को

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कुछ छुपाने को न कुछ बताने को  खुली किताब सा जब बन जाता है  साथ कुदरत का उसे मिल जाता है  कुछ छुपाने को न कुछ बताने को  राहे इश्क़ पर दिल नि...
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सोमवार, जनवरी 16

इक विश्वास हृदय में अनुपम

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इक विश्वास हृदय में अनुपम   जीवन इक उपहार उसी का  जो सदा निकट, है सुदूर अति,  जिससे यह श्वासें चलती हैं  प्राणों में बल, तन-मन में गति ! जीव...
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शनिवार, जनवरी 14

भारत का हर पर्व अनोखा

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भारत का हर पर्व अनोखा  लोहरी की पावन अग्नि  में  सपनों के शुभ  रंग बिखरते,  देश तरक़्क़ी करे विश्व सँग  भारतवासी यही माँगते ! सबको साथ लिए च...
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शुक्रवार, जनवरी 13

कविता

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कविता  कोई एक भाव  एक शब्द, एक विचार  उतर आता है न जाने कहाँ से  और पीछे एक धारा बही आती है  अक्सर कविता ऐसे ही कही जाती है अनायास, अप्रयास ...
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बुधवार, जनवरी 11

कोई कोई ही पहुँचे घर

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कोई कोई ही पहुँचे घर हर सुख की छाया दुःख ही है  जो संग चली आती उसके,  हर चाह अचाह छुपाए है  देखेगा, होश जगे जिसके ! चाहों से यह जग चलता है  ...
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शनिवार, जनवरी 7

प्रेम स्वप्न बन कर पलता है

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प्रेम स्वप्न बन कर पलता है एक बार फिर देखें मुड़कर कितनी राह चले आये हम, कब थामा था हाथ हाथ में  कितनी चाह भरे भीतर मन ! छोटा सा संसार  बसाया...
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Anita
यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे! लिखना मेरे लिये सत्य के निकट आने का प्रयास है.
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