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शनिवार, दिसंबर 4

सेहत का है राज यही, नहीं भूलना इन्हें कभी


सेहत का है राज यही, नहीं भूलना इन्हें कभी 


समय पे सोना औ' जागना 

बात-बात पर दुखी न होना, 

थोड़ा सा ही पौष्टिक भोजन 

आसन, प्राणायाम साधना !


दर्द कभी हो कहीं देह में 

यह तन की पुकार है सुनना,  

उलझे से हों ग़र विचार तो 

यह मन का विकार है गुनना !


क्रोध जगे तो ज़रा ठहरना 

वातावरण प्रदूषित करता, 

गहरी चंद सहज श्वासें ले

अंतर्मन को ख़ाली करना !


जीवन एक उपहार प्रभु का 

सत्यम शिव सुंदर जब होगा, 

मन उत्साहित शरीर ऊर्जित 

हर पल तब ही सुखद बनेगा !





गुरुवार, मार्च 11

होगा ही कोई हाथ

होगा ही कोई हाथ


सूर्य नहीं कहता वह सूर्य है 

उसकी किरणें ही बताती हैं 

चाँद अपना नाम नहीं लिखता आसमान पर 

चाँदनी बयान करती है उसका हाल 

परमात्मा फिर क्यों कहे वह भगवान है 

हवाएं देती हैं उसका पैगाम 

दिल में उमड़ता हुआ प्रेम 

ही खबर देता है 

उसके होने की 

ऐसे ही अज्ञान नहीं लेता अपना नाम खुद 

क्रोध और ईर्ष्या की आग ही बताती है 

अभी ज्ञान सोया है मन में 

जगत है तो जगतपति की खबर मिल ही जाती है 

जैसे नौका तैरती आती हो दूर से सागर में 

तो नाविक होगा ही 

उड़ती हो आकाश में कोई पतंग 

तो होगा ही कोई हाथ 

थामे हुए डोर को 

फिर क्यों नहीं देख पाते हम उसे 

जो छुपा है जर्रे-जर्रे में !

देवत्व महान स्वतंत्रता है 

नहीं है उसे कोई बंधन 

हजार-हजार रूपों में प्रकट होता है 

वह संकल्प मात्र से 

धैर्य, सहिष्णुता और प्रेम की मूरत 

वह सिखाता है मानव को सच की राह 

दिखाता है सदा 

दिलों में अपनेपन की भावना जगाकर 

समाज को एक उद्देश्य में बांधता है 

पतित को पावन बनाता है 

अपवित्र और पवित्र के भेद को बताने वाला 

संबंधों के जाल से निकाल 

पंछी को उन्मुक्त आकाश में

उड़ने की शक्ति भरने वाला

अनंत  हर घड़ी निमंत्रण देता है

वह सर्व समर्थ शक्ति का स्वामी है !


 

मंगलवार, जुलाई 21

चाहे जो भी रूप धरा हो


चाहे जो भी रूप धरा हो 


जल ही लहर लहर से सागर 
जल ही बूंद भरा जल गागर, 
फेन बना कभी हिम् चट्टान 
वाष्प बना फिर उड़ा गगन पर !

चाहे जो भी रूप धरा हो 
जल तो आखिर जल ही रहता,
मानव मन भी इक नदिया सा 
अविरल अविरत  बहता रहता !

करुणामय बोल कभी बोले 
कभी क्रोध के भाव जगाये, 
कभी मधुर गीतों में डूबा 
लोभ की फिर छलाँग लगाए !

स्वयं नए संकल्प जगाता
खुद ही उनको काट गिराता,
खुद ही निज को कमतर आँकें 
तुलना कर निज को फँसवाता !

अपने ही सिद्धांत बनाये 
टूटें तो रह रह पछताए, 
सहता है उन पीड़ाओं को 
जिनके बिरवे स्वयं लगाए !

शुक्रवार, जनवरी 24

ज्ञान और अज्ञान


ज्ञान और अज्ञान



असीम है ज्ञान और अज्ञान की भी सीमा नहीं है मानव के सह लेता है जन्म और मृत्यु का दुःख काट लेता है वृद्धावस्था भी रो-झींक कर सामना करता है रोग का पर क्या कहें दुःख के उस भंडार का जो लिए फिरता है अपने कांधों पर उस क्रोध का, जो जलाता है खुद को और झुलसाती है जिसको आंच दूसरों को भी ईर्ष्या की लपटें जो खुद ही सुलगाता है भीतर जब चीजें जुडी हैं आपस में इस तरह कि एक चींटी भी दे रही है योगदान इस सृष्टि में तो वह अहंकार के हाथी पर चढ़ा गिर कर धूल फांकता है न जाने किस अज्ञात भय से कँपता है उसका मन घृणा का बीज डालता है स्वयं ही फिर प्रेम के फलों की उम्मीद बाँधता है समझदारी की आशा कौन करे विवेक को सुलाकर मदहोश हुआ चंद घड़ियाँ चैन से बिताता है पाना चाहता है सारा संसार बिना श्रम लेकर असत्य का सहारा भी ...