इतना ही तो कृत्य शेष है
‘मैं’ बनकर जो मुझमें बसता
‘तू’ बनकर तुझमें वह सजता,
मेघा बन नभ में रहता जो,
धारा बन नदिया में बहता !
चुन शब्दों को गीत बनाना
अपनी धुन में उसे बिठाना,
इतना ही तो कृत्य शेष है
सुनना तुमको और सुनाना !
अब न कोई सीमा रोके
नील गगन में किया ठिकाना,
खुला द्वार, है खुला झरोखा
सहज हो रहा आना जाना !

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