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शुक्रवार, मार्च 7

इतना ही तो कृत्य शेष है

इतना ही तो कृत्य शेष है


‘मैं’ बनकर जो मुझमें बसता 

‘तू’ बनकर तुझमें वह सजता, 

मेघा बन नभ में रहता जो, 

धारा बन नदिया में बहता !


चुन शब्दों को गीत बनाना 

अपनी धुन में उसे बिठाना, 

इतना ही तो कृत्य शेष है 

सुनना तुमको और सुनाना !


अब न कोई सीमा रोके 

नील गगन में किया ठिकाना, 

खुला द्वार, है खुला झरोखा 

सहज हो रहा आना जाना !


शुक्रवार, अप्रैल 15

निरभ्र गगन खुलता जाता

निरभ्र गगन खुलता जाता 

नील वितान धरा को थामे 

मन मेघ देख क्यों कँप जाता, 

पल भर में छँट जाते बादल 

नीरव अंबर खुलता जाता !

 

काले धूसर घनघोर मेघ 

कहाँ कभी ढक पाये नभ को 

बना वही है आश्रय स्थल फिर

 अकुलाहट क्यों हो अंतर को !

 

ज़रा खोल दें खिड़की मन की 

या गवाक्ष की ओट गिरा दें,

खुला-खुला सा नभ दिख जाए 

नज़र उठा भर उधर देख लें !

 

चाहे मीलों दौड़ लगाए 

या पंछी सा तिरता जाए, 

वही विस्तीर्ण अनंत प्रदेश 

हर सीमा से मुक्त कराए !