वह
कभी भोर होकर भी
भोर नहीं होती
घटटोप बादलों से
आवृत हो जाता है नील नभ
अंशुमान मेघों की अनेक परतों के पीछे
पंछी देर तक दुबके रहते हैं कोटरों में
रात भर बरस कर भी
बदलियाँ थकी नहीं होतीं
टप टप झरती हैं
पेड़ों की डालियों से बूँदे रह रह कर
मंदिरों के द्वार खुल जाते हैं
पर भक्त गण नहीं आते
ऐसे में यदि कोई
परमात्मा को घर बैठे आवाज़ लगाए
तो क्या उससे दूर रह पाएगा वह
पल भर में पानी से भरे सारे रास्तों को पार करके
प्रकट हो जाएगा न
सम्मुख उसके
पूछा मुन्नी ने दादी से !
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