बुधवार, अप्रैल 9

मिला वही उजियारा बनकर

मिला वही उजियारा बनकर


अँधियारा छंट गया उसी पल
बन याद इक बसी हृदय में
 एक गीत की कड़ी सुमधुर !

नयन भिगोये कसक घनी थी
राह नजर नहीं आती थी
 मिला वही उजियारा बनकर !

हारा तम हुई विजय उषा की
 टूटे बंधन मुक्त हुआ मन
स्वप्नों को भी लगे नये पर ! 

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह हमेशा की तरह अत्यंत सुन्दर |

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  2. सपनो को लगे पंख उड़ चला मन पाखी मुक्त गगन में बढ़िया पोस्ट

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  3. मिला वही उजियारा बनकर -
    - यही है सार्थकता !

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  4. अन्तःप्रेरणा ही हमें अँधेरे व उलझनों से बाहर लाती है । सुन्दर

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  5. जिस दिन अंतस में प्रकाश जग जाता है, तम को तो दूर होना ही है..बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति...

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